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यहां लगती है दूल्हों की बोली

News18Hindi
Updated: September 28, 2017, 1:17 PM IST
यहां लगती है दूल्हों की बोली
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Updated: September 28, 2017, 1:17 PM IST
साल 1982 में फिल्म निर्माता ताहिक हुसैन ने एक फिल्म बनाई, जिसका नाम था “दूल्हा बिकता है”. ये फिल्म जब सिनेमाघर में पहुंची तो लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ कि भारत में ऐसा भी होता है.

इसी तरह कालांतर में दूल्हों के बिकने पर कई फिल्में बनीं, लेकिन क्या आपको पता है कि भारत में दूल्हे बिकते हैं.

जी हां, ये बात सौ फीसदी सही है. दूल्हों की सौदेबाजी होती है बिहार के मिथिलांचल यानी मधुबनी जिले में. यहां दूल्हों की मंडी ऐसे लगती है, जैसे कोई सब्जी, फल या राशन मंडी होती है.

दूल्हों की इस मंडी को कहा जाता है सौराठ सभा यानी दूल्हों का मेला. लोग इसे सभागाछी के नाम से भी जानते हैं.

मैथिल ब्राह्मणों के इस मेले में देश-विदेश से कन्याओं के पिता योग्य वर का चयन करके विवाह करते हैं. इतना ही नहीं यहां योग्यता के हिसाब से दूल्हों की सौदेबाजी भी होती है.

9 दिनों तक चलने वाले इस मेले में पंजिकारों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है. यहां जो संबंध तय होते हैं, उसे मान्यता पंजिकार ही देते हैं.

पंजीकरण में पिता पक्ष और ननिहाल पक्ष के 7 पीढ़ी तक के संबंधों को देखा जाता है. किसी तरह का संबंध रहने पर वर-कन्या का विवाह नहीं होता है, क्योंकि पडितों के हिसाब से उनकी नाड़ी समान होती है.

इस मामले में पंजिकार वीएन झा बताते हैं कि यह मेला लगभग 700 साल पहले शुरू हुआ था. साल 1971 में यहां लगभग 1.5 लाख लोग विवाह के समंबंध में आए थे लेकिन वर्तमान में आने वालों की संख्या काफी कम हो गई है.

इस मेले के बारे में लोग बताते हैं कि राजा हरि सिंह देव ने दहेज प्रथा को रोकने के लिए इस मेले की शुरुआत की थी, लेकिन बाद में इस मेले में लड़की पक्ष वाले वर की योग्यता के हिसाब से मूल्य निर्धारित करने लगे. इस वजह से इसका महत्व कम होने लगा है और आज ये मेला अपनी आखिरी सांसे गिन रहा है.
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