अजब-गजब: बच्चों का अखबार है 'बालकनामा'

News18Hindi
Updated: February 15, 2018, 2:20 PM IST
अजब-गजब: बच्चों का अखबार है 'बालकनामा'
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Updated: February 15, 2018, 2:20 PM IST
“ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो. भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन. वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी”. सुदर्शन फ़ाकिर की लिखी इन लाइनों से बीते हुए बचपन को बखूबी समझा जा सकता है. बचपन यानी बच्चों की अपनी दुनिया. बच्चों की दुनिया में उनकी सोच हर पल उड़ान भरती रहती है.

उनकी नजर में क्या खास है और क्या बेकार, इसका अंदाजा लगाना बड़ा ही मुश्किल होता है. बच्चे कहना तो बहुत कुछ चाहते हैं, पर वो उसे अपनी जुबान, अपनी भाषा में बयां करना चाहते हैं. ऐसे ही प्रयास का नाम है बालकनामा.

8 पन्नों का यह अखबार गरीब बच्चों द्वारा संचालित होती है. यह अखबार बच्चों से जुड़े मुद्दों को बड़ी संजीदगी से उठाता है और समाज के सामने रखता है. बालकनामा की खासियत ये है कि इससे जुड़ने वाले सारे बच्चों की उम्र 14 से 18 तक है.

बालकनामा अखबार बढ़ते कदम नाम का संगठन चला रही है, जिसमें देश भर में 10 हजार से ज्यादा गरीब बच्चे जुड़े हैं. इसके अलावा भी बढ़ते कदम गरीब बच्चों के उत्थान के लिए कई और कार्यक्रम चलाता है. यह संगठन पूरी तरह से बच्चों द्वारा संचालित किया जाता है.

बालकनामा अखबार की शुरूआत साल 2003 में दिल्ली के गौतम नगर में कुछ बच्चे ने की थी, उस समय संगठन में केवल 35 बच्चे थे और यह दिल्ली में ही काम करता था लेकिन उसके बाद संगठन का विस्तार हुआ और उसके बाद संगठन से जुडे बच्चों की संख्या लगातार बढ़ने लगी और अब बच्चों की संख्या 10 हजार तक हो गई.

बालकनामा का नेटवर्क दिल्ली के अलावा मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश हरियाणा में फैला हुआ है. वर्तमान में इस अखबार की 5 हजार से ज्यादा प्रतियां छापी जाती हैं. यही नहीं बालकनामा का साल 2015 से अंग्रेजी में भी अनुवाद किया गया और अब इसे अब विदेशों में भी भेजा जाता है.

बालकनामा से एक लंबे असरे से जुड़ी शानू ने योरस्टोरी को बताया, “हम बालकनामा के जरिए गरीब बच्चों से जुड़े मुद्दे बड़ी संजीदगी से उठाते हैं और उन्हें लोगों के सामने रखते हैं. चूंकि मैं अब 18 वर्ष से ज्यादा की हो चुकी हैं इसलिए अब मैं अखबार के लिए नहीं लिखतीं, लेकिन बतौर एडवाइजर अखबार से जुड़ी हुई हूं और बच्चों की मदद करती हूं. इससे पहले मैं अखबार की कई वर्षों तक संपादक रह चुकी हूं.”

शानू बताती हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ देखा है जब वे 11 साल की थी तो घर के तंग आर्थिक हालात के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़कर कारखाने में काम करने जाना पड़ा लेकिन बढ़ते कदम और फिर बालकनामा से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी बदल गई. उन्होंने अपनी पढ़ाई फिर शुरू की और अब वे बैचलर ऑफ सोशल वर्क के प्रथम वर्ष में हैं. शानू के अलावा भी बढ़ते कदम के माध्यम से कई बच्चों की जिंदगी में काफी बदलाव आया है.

बालकनामा का नेटवर्क बड़ा जबर्दस्त है इन्होंने अपने नेटवर्क को इस तरह तैयार किया है कि हर डिस्ट्रिक्ट में बालकनामा के रिपोर्टर फैले हुए हैं. इनमें लड़के और लड़कियां दोनो शामिल हैं. सभी रिपोर्टर्स की उम्र 18 साल से कम होती है. ये रिपोर्टर्स अपने एरिया में देखते हैं कि बच्चों की क्या दिक्कते हैं. ये लोग मीटिंग्स करते हैं, बच्चों से मिलते हैं.

बालकनामा में दो तरह के रिपोर्टर्स हैं. पहला वो जो खोजी पत्रकार होते हैं और बच्चों की खबरें अलग-अलग जगहों से खोज कर लाते हैं. दूसरे वो जो उन खबरों की जांच करते हैं और उन्हें लिखते हैं. अभी बालकनामा से जुडे रिपोर्टर्स की संख्या 14 हैं, जो कहानी लिखते हैं.

इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में अखबार के रिपोर्टर्स सक्रिय हैं, जो खबरें भेजते हैं. ये सभी समय-समय पर मिलते रहते हैं. बालकनामा में काफी जांच पड़ताल और सहमती के साथ ही खबरों को छापा जाता हैं. हर महीने की 25 तारीख को एडिटोरियल मीटिंग होती है. जहां खबरों का विश्लेषण किया जाता है और अगले महीने के बारे में चीज़ें तय की जाती हैं.

बालकनामा स्ट्रीट किड्स की परेशानियों, उनके दिक्कतों की बात करता है. ये अखबार पूरी तरह से बच्चों के सरोकार से वास्ता रखता है. इसका मिशन है बच्चों के द्वारा-बच्चों के लिए. उनके हक और अधिकार की लड़ाई है बालकनामा. साधारण बच्चों के इस असाधारण प्रयास को देखकर हर किसी के मुंह से बस यही निकलता है OMG! अजब-गजब है मेरा इंडिया.
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