अंधेरी गुफा में चमगादड़ों का खतरा, एक नैचुरल कुंड और शिवलिंग!

आधी हकीकत आधा फसाना के इस एपिसोड के पहले भाग में देखिए एक रहस्यमयी गुफा का रोमांचक सफर. इस गुफा के अंदर कुदरती शिवलिंग के साथ ही शिव परिवार की कई निशानियों का होना बताया जाता है, लेकिन क्या है सच्चाई?

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 20, 2019, 7:42 AM IST
  • Share this:
आधी हकीकत आधा फसाना. इस बार एक ऐसी रहस्यमयी गुफा की यात्रा जिसके बारे में गिने-चुने लोग ही जानते हैं. हज़ारों साल पहले के स्कंदपुराण में इस गुफा का ज़िक्र है, लेकिन हैरत की बात यह है कि इसे कुछ 4 साल पहले ही खोजा जा सका है. यह गुफा उत्तराखंड के किस कोने में है? वहां पहुंचना कैसे है? उसके अंदर कितने रहस्य हैं और क्या वो सभी सच हैं? चलिए इस रोमांचक यात्रा पर.

READ: कहानी का भाग-1 : स्कंदपुराण की उस गुफा की यात्रा

तीसरी मंजिल का रास्ता बेहद तंग और अंधेरे से भरा था. जहां हमारे सिर पर एक बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा था. गुफा की दीवारों पर सैकड़ों चमगादड़ थे, जो लाइट देखकर हमला कर सकते थे. लिहाज़ा एक पल भी गंवाए बगैर हम चौथे तल की तरफ रवाना हो गए.



चौथी मंज़िल का रास्ता खतरों से खेलने के बराबर था. कड़ी मशक्कत के बाद हम गुफा की चौथी फिर पांचवी मंज़िल पर पहुंचे, लेकिन चमगादड़ के खतरे ने कहीं भी रुकने नहीं दिया. कुछ देर बाद हम गुफा के छठे तल पर थे जहां एक प्राकृतिक कुंड था. बताया जाता है कि एक पानी के इस कुंड में लोग हाथ मुंह धोते हैं और शक्ति की ओर जाते हैं. वहां पूजा अर्चना करते हैं.
छठी मंज़िल के बाद अब हम सातवीं मंजिल की तरफ जा रहे थे. सातवें तल की हालत बहुत खस्ता थी. लिहाज़ा हमने अपनी चढ़ाई जारी रखी. कहते हैं कि गुफा की सबसे आखिरी यानी नौवीं मंजिल पर एक अद्भुत शिवलिंग है जो अपने आप प्रकट हुआ था. हम सीढ़ी दर सीढ़ी उस तरफ बढ़ते जा रहे थे.

गुफा की आठवीं मंजिल तक आते आते रास्ता तंग हो चुका था. जहां इतनी ऊंचाई पर आकर अब डर लगने लगा था. अब हम गुफा के नौवें तल के काफी करीब थे लेकिन अब हर कदम संभाल कर रखना पड़ रहा था. आठवें और नौवें तल के बीच फासला बहुत ज्यादा था. चढ़ाई के साथ खतरा बढ़ता जा रहा था.

फिर भी हम किसी तरह गुफा के सबसे उपरी हिस्से तक पहुंचने में कामयाब रहे. नौवीं मंज़िल की हालत देखकर शरीर में खौफ की लहर दौड़ गई. नौवीं मंजिल पर यहां एक पटरा रखा था. इस पर चलने में बहुत डर लग रहा था. ये जो लकड़ियां थीं, ये कच्ची थीं और टूट गई थीं तो यहां से गिरकर बचना मुश्किल है.

नौवें तल पर एक शिवलिंग था जिसकी आकृति अपने आप उभरी बताई जाती है. गांववालों को इसमें महादेव का अक्स नजर आता है. शिवलिंग के ऊपर पहाड़ों का पानी लगातार टपक रहा था. ये सब प्रकृति की एक खास बनावट है, जिसे गांववाले चमत्कार से जोड़कर देखते हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि ये गुफा युगों पुरानी है. ऐसी बंद गुफाओं में हवा-पानी और पत्थरों में जमा कैल्शियम की आपसी रासायनिक क्रियाओं से इस तरह की आकृतियां उभर जाती हैं. शिव खोड़ी और पाताल भुवनेश्वर में भी हमने कुछ ऐसा ही देखा था लेकिन आस्था में डूबे दिमाग को इसमें भगवान नजर आते हैं. इस गुफा को लेकर भी वही बात दिखी.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज