देवी के पुत्र हैं यहां के चूहे, इनके जूठे फल को माना जाता है प्रसाद!

आधी हकीकत आधा फसाना. उस धाम की यात्रा जो महजत्र एक एक मंदिर नहीं है, एक खास समुदाय के लिए यहां जीवन से लेकर मृत्यु और मृत्यु से लेकर पुनर्जन्म का पूरा चक्र चलता है, वह भी चूहों के ज़रिये! दूसरा भाग.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 26, 2019, 6:13 AM IST
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आधी हकीकत आधा फसाना. इस बार एक हम ऐसे धाम की यात्रा करेंगे जो महज एक एक मंदिर नहीं है, एक खास समुदाय के लिए यहां जीवन से लेकर मृत्यु और मृत्यु से लेकर पुनर्जन्म का एक पूरा चक्र चलता है, जिसके वाहक चूहे हैं. चूहे इस धाम की देवी के संतान माने जाते हैं. यही वजह है कि इस धाम से जुड़े लोग चूहों को अपना वंशज मानते हैं. वहां इंसान और चूहों के बीच एक दैवीय रिश्ता है. चूहों की भरमार रहने के बावजूद उस जगह कोई बीमारी नहीं फैलती. लोगों के मुताबिक वो चूहे हैं ही नहीं, वो इंसान हैं, जो अपने अगले जन्म का इंतजार कर रहे हैं और सबसे बड़ा दावा वो सफेद चूहे जो देवी के रूप माने जाते हैं.

फिर हमने चारण समुदाय के कुछ लोगों से बात की जो करणी माता के परिवार के माने जाते हैं. इस धाम की देखभाल करने का जिम्मा भी इसी चारण समुदाय का है जो इन चूहों को काबा कहकर पुकारते हैं. तभी चारण समुदाय से एक चेतावनी भी मिल गई हमसे मंदिर में बहुत ही संभलकर चलने के लिए कहा गया ताकि कोई काबा यानी चूहा पैरों के नीचे न आए अगर ऐसा हुआ तो इसकी एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी. मान्यता ये है कि मंदिर में चलते वक्त काबा एक पैर के उपर चढ़ जाए तो माता की कृपा होगी. अगर गलती से काबा पैरों के नीचे दब जाए तो माना जाता है कि माता नाराज है. न केवल माफी मांगनी पड़ती है बल्कि चांदी का काबा भेंट करना पड़ता है.

अंदर का हर एक नजारा चौंकाने वाला था लेकिन एक बात गौर करने लायक थी, हजारों की संख्या में होने के बावजूद, ये चूहे न किसी को काट रहे थे और न ही किसी चीज को कुतर रहे थे. यहां के लोगों के लिए ये बात सामान्य होगी लेकिन हमारी तरह बाहर से यहां आने वाला हर शख्स ये देखकर हैरान था. धाम में देवी के सामने रखे फल और मिठाई तभी प्रसाद माने जाते हैं जब ये चूहे उन्हें जूठा कर दें. घर के अंदर चूहा अगर पानी या दूध को जूठा कर दे अक्सर ये देखा जाता है कि दूध और पानी को फेंक दिया जाता है. कहा जाता है कि उसे पीने से बीमार पड़ जाएंगे, लेकिन करणी माता मंदिर के अंदर कहा जाता है कि जिस बर्तन में चूहे दूध पी रहे हैं उसे पीने से लोग बीमार नहीं पड़ते हैं. ये परंपरा यहां सालों से निभाई जा रही है लेकिन दावा है कि आज तक कोई बीमारी नहीं फैली जबकि बाकी जगहों पर चूहों को बीमारी फैलाने वाला माना जाता है.



ये सब देखते, जानते और समझते कई घंटे गुजर गए फिर हमें देवी, चूहे और चारण समुदाय से जुड़ी एक आलौकिक दुनिया के बारे में पता चला जिस पर विश्वास करना मुश्किल था लेकिन धाम से जुड़े लोग इस कहानी पर शिद्दत से यकीन करते हैं. कहते हैं करणी माता चारण समुदाय की ही थीं और इस धाम में पाए जाने वाले चूहे देवी के पुत्र माने जाते हैं. इस लिहाज ये लोग इन चूहों को अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं और एक परिवार की तरह ही रहते हैं.
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आप और हम भले ही चूहे के जूठे करने पर खाना नहीं खाते हों लेकिन कारणी माता से जुड़े कुल के चारण समुदाय के लोग काबा के साथ खाना खाते हैं. काबा का जूठा पानी पीते हैं साथ में सोते हैं. काबा और खुद में भेद नहीं करते. ये मानते हैं कि ये चूहे उनके परिवार के सदस्य हैं उनके वंशज हैं. इन तस्वीरों पर विश्वास करना मुश्किल है लेकिन चारण समुदाय के लोगों के लिए ये रोज की बात है जिनके लिए ये एक धाम नहीं बल्कि एक लोक है जिसका बाहरी दुनिया से दूर, अपना एक अलग ही जीवन चक्र है. लोग यहीं मरते हैं और जन्म लेते हैं. एक बार इंसान बन कर और दूसरी बार काबा यानी चूहा बनकर.

पुरी संसार में और 8वां पुरी ये है. जैसे यम पुरी है शिव पुरी है ब्रह्मा पुरी है वैसे ही ये एक पुरी है. 7 पुरी है वैसे ही ये एक पुरी है जो अपने हाथों से रची है. पूरे विश्व में प्रसिद्ध है.

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अब कोई विश्वास करे या ना करे, इस धाम की हकीकत यही है. इस धाम से जुड़े लोग पुनर्जन्म के इस चक्र में यकीन रखते हैं और यही वजह है कि मंदिर के चूहों का इंसानों की तरह ख्याल रखा जाता है. लेकिन पुनर्जन्म का दावा कहां तक सही है. इस बात की पड़ताल अभी बाकी थी. क्या ये बात भी सही है कि, हजारों की तादाद में होने के बावजूद एक भी चूहा धाम से बाहर नहीं जाता. चूहों का जूठा खाने के बावजूद बीमारी का खतरा क्यों नहीं है. और सबसे बड़ी बात, क्या वाकई इस धाम में सफेद चूहे भी हैं, जो देवी का रुप माने जाते हैं. जब हम इन सवालों का जवाब तलाशने निकले तो एक ऐसे हकीकत से सामना हुआ, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी.

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