BACKSTORY: आखिर किस वजह से Tata Nano का सिंगुर की जगह साणंद में हुआ प्रोडक्शन? यहां पढ़ें पूरी स्टोरी

टाटा नैनो की कहानी.

BACKSTORY : 3 अक्टूबर 2008 को टाटा ने घोषणा की कि वे सिंगूर में अपनी परियोजना को रोक रहे हैं और इस परियोजना को साणंद में स्थानांतरित कर रहे है. इसके बाद बंगाल में वाम मोर्चे के दिन भी गिने जाने लगे थे और 2011 में तृणमूल और उसके सहयोगियों ने 294 सीटों में से 227 सीटें जीती.

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    नई दिल्ली. रतन टाटा ने नैनो को आम आदमी की कार के तौर पर लॉन्च किया था. लेकिन ये कार देश में कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर सकी. लेकिन इससे जुड़ी एक घटना आज भी प्रासंगिक बनी हुई है. जो आपके लिए जानाना जरूरी है. दरअसल नैनो का उत्पादन गुजरात के साणंद में होता था. लेकिन इससे पहले इस कार का प्रोडक्शन कोलकाता से कुछ किमी की दूरी पर सिंगूर में होने वाला था. जहां एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के इसके प्लांट को साणंद में शिफ्ट करना पड़ा. आइए जानते इस किस्से के बारे में...

    ये थी नैनो के साणंद पहुचने की वजह - जिस समय बंगाल के सिंगूर में नैनो का प्लांट लगाया जा रहा था. तब राज्य में CPI की सरकार थी. जो वर्षो की कोशिश के बाद प्रदेश में कोई बड़ा औद्योगिक निवेश लेकर आई थी. लेकिन उस समय तृणमूल कांग्रेस की तेजतर्रार नेता और तत्कालीन बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राजनीतिक गतिरोध के चलते इस निवेश को खारिज कर दिया. जो कि उस समय CPI ने प्रदेश का ऑटो हब बनाने का वादा किया था.

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    रतन टाटा का ड्रीम प्रोजेक्ट था नैनो- सीएनबीसी 18 में छपी खबर के अनुसार नैनो टाटा समूह के सुप्रीमो रतन टाटा का ड्रीम प्रोजेक्ट था. इसके लिए वो जमीन की तलाश कर रहे थे. जबकि पश्चिम बंगाल सरकार एक ऐसी परियोजना की तलाश कर रही थी जो प्रदेश को औद्योगिक गति दे सके.

    बंगाल सरकार ने इसके लिए टाटा को सिंगूर की जमीन ऑफर की. जो कि देश के सबसे प्रसिद्ध इंजीनियरिंग संस्थानों खड़गपुर शहर के ठीक बगल में थी. वहीं सिंगूर कोलकाता से केवल 90 मिनट की ड्राइव की दूरी पर था और यहां से हल्दिया पोर्ट केवल 100 किमी की दूरी पर था. ऐसे में सिंगूर की ये जमीन नैनो के प्लांट के लिहाज से बेहतरीन थी. लेकिन इस जमीन के लिए सिर्फ एक ही परेशानी थी. जो था इसका अधिग्रहण जिसमें कुछ किसानों ने अपनी जमीन को खुशी-खुशी बेचा. लेकिन कुछ लोग नाराज थे जैसा कि मिंट में छपे सुदीप चक्रवर्ती के कॉलम से पता चलता है. जिसमें उन्होंने कहा था कि, 'कंपनी ने इसके लिए सरकार पर दांव लगाया, सरकार ने कंपनी पर दांव लगाया है और दोनों हार गए'

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    नैनो से जुड़ा पूरा घटनाक्रम - मई 2006 में वाम मोर्चा बंगाल में प्रंचड मतों से जीता था. जिसके बाद टाटा मोटर्स के कारखाने के लिए 997 एकड़ का अधिग्रहण करने का फैसला किया गया. जमीन खरीदने की प्रक्रिया सरकार की अपेक्षा से कहीं अधिक जटिल साबित हुई और जल्द ही यह जमींदारों और सरकार के वार्ताकारों के बीच एक कड़वा संघर्ष बन गया. मई 2007 तक, मामले में उबाल आ गया था और उस महीने संयंत्र स्थल पर हिंसा भड़क उठी थी, जिसमें पुलिस ने रबर की गोलियां और आंसू गैस के गोले दागे थे, और उधर से आंदोलनकारियों ने बम और ईंट-पत्थर फेंके. इसी बीच इस आंदोलन में ममता बनर्जी एंट्री होती है और उग्र राजनेता ने रैलियां और विरोध मार्च निकालना शुरू किया. इस मुद्दे को लेकर उन्होंने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल भी की थी. अगले कुछ वर्षों में मामले घिसिटता रहा लेकिन भूमि अधिग्रहण पूरा नहीं हो सका. जिसके चलते टाटा मोटर्स ने विकल्प तलाशना शुरू कर दिया. इसी दौरान गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिसे टाटा मना नहीं कर सकते थे.

    2008 में नैनो साणंद पहुंची - 3 अक्टूबर 2008 को टाटा ने घोषणा की कि वे सिंगूर में अपनी परियोजना को रोक रहे हैं और इस परियोजना को साणंद में स्थानांतरित कर रहे है. इसके बाद बंगाल में वाम मोर्चे के दिन भी गिने जाने लगे थे और 2011 में तृणमूल और उसके सहयोगियों ने 294 सीटों में से 227 सीटें जीती. ममता ने अपना वादा निभाया और मई 2011 में मुख्यमंत्री बनने के एक महीने से भी कम समय के बाद, सिंगूर भूमि पुनर्वास और विकास विधेयक को पश्चिम बंगाल विधानसभा में पारित किया गया, जिससे 400 एकड़ कृषि भूमि वापस हो गई, जिसे किसानों ने पहले छोड़ दिया था.

    नोट लेखक - सुदीप खन्ना पूर्व संपादक और हाल ही में रिलीज़ हुई अजीम प्रेमजी: द मैन बियॉन्ड द बिलियन्स के सह-लेखक हैं. ये विचार उनके व्यक्तिगत हैं

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