कोरोना संकट के बीच निगेटिव सेंटिमेंट से भारत में चीन की ऑटो कंपनियों के लिए और बढ़ीं मुश्किलें

कोरोना संकट के बीच निगेटिव सेंटिमेंट से भारत में चीन की ऑटो कंपनियों के लिए और बढ़ीं मुश्किलें
कोरोना वायरस के कारण दुनिया के ज्‍यादातर देश चीन के खिलाफ हो गए हैं. ऐसे में भारत को नए कारोबारी अवसर नजर आ रहे हैं.

कोरोना वायरस को लेकर दुनिया चीन (China) के खिलाफ हो गई है. वहीं, सीमा पर तनाव के कारण भारत में चीन विरोधी भावना बढ़ी है. इसके अलावा भारत (India) ने एचडीएफसी बैंक में चीन के हिस्‍सेदारी बढ़ाने के बाद एफडीआई नियमों (FDI Rules) में बदलाव कर दिया है. इससे भारत में निवेश की योजना बना रही चीनी कंपनियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं.

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कोरोना वायरस के कारण ज्‍यादातर देश चीन (China) की कंपनियों और उत्‍पादों के खिलाफ हो गए हैं. वहीं, भारत में कोविड-19 के अलावा लद्दाख सीमा पर तनाव के कारण भी लोगों की भावनाएं चीन के खिलाफ (Anti-China Sentiments) हो गई हैं. देश में चीन के उत्‍पादों के खिलाफ एक के बाद एक कई अभियान शुरू हो चुके हैं. सोशल मीडिया पर लोग चीन के उत्‍पादों का बहिष्‍कार करने की अपील कर रहे हैं. ऐसे में भारत में मौजूद चीन की ऑटो कंपनियों के सामने नई चुनौतियां पेश आ रही हैं. इस समय ऐसा लग रहा है कि दो साल पहले अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) की चीन के साथ शुरू की गई ट्रेड वार (Trade War) में अब कई देश जुड़ते जा रहे हैं. जापान, भारत और अमेरिका ने चीन के खिलाफ कई कदम उठाए हैं. इनमें चीन से अपना निवेश वापस खींचने जैसे कदम भी शामिल हैं.

भारत सरकार ने एचडीएफसी बैंक (HDFC Bank) में पीपुल्‍स बैंक ऑफ चाइना के हिस्‍सेदारी बढ़ाने के बाद अपनी प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की नीतियों में संशोधन कर दिया. इन नई नीतियों के कारण भारत में निवेश करने की योजना बना रही चीन की ऑटो कंपनियों पर भी असर पड़ा है. नए एफडीआई नियम लागू होने के बाद चीन की चौथी सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी चांगआन (Changan Automobiles) को भारत में 2022 में अपने वाहन लॉन्‍च करने की योजना पर विचार करने को मजबूर होना पड़ा है. ऑटो इंडस्‍ट्री के सूत्रों के मुताबिक, कंपनी ने फिलहाल भारत को लेकर अपनी सभी योजनाओं को अस्‍थायी तौर पर रोक दिया है. कंपनी अब माहौल में बदलाव होने का इंतजार करेगी. ऐसे में दूसरे देशों की कंपनियों का भी चीन से हटकर भारत में आना थोड़ा मुश्किल नजर आ रहा है.

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चीन की एक और कंपनी ग्रेट वाल मोटर्स महाराष्‍ट्र के तालेगांव में जनरल मोटर्स का प्‍लांट अधिग्रहण करने के आखिरी चरण में थी, लेकिन एफडीआई पॉलिसी में संशोधन के कारण उसके सामने भी कई तरह की मुश्किलें पेश आ रही हैं. इसके अलावा दोपहिया वाहन के मामले में चीन की कई इलेक्ट्रिक टू-व्‍हीलर मैन्‍युफैक्‍चरर्स ने भी भारत में अपने वाहनों की लॉन्चिंग को फिलहाल टाल दिया है. वहीं, कई वैश्विक और भारतीय कंपनियों के सामने कंपोनेंट्स को लेकर चीन पर निर्भरता के कारण मुश्किल हो रही है. टाटा मोटर्स, महिंद्रा एंड महिंद्रा, अशोका लेलैंड, टीवीएस मोटर कंपनी और हीरो मोटोकॉर्प जैसी भारतीय ऑटो कंपनियां काफी समय से मेकिंग-इन-इंडिया की वकालत करती आ रही हैं. फाइनेंशियल एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक महामारी के इस दौर में सभी देशों को सप्‍लाई चेन को चीन से बाहर निकलने की जरूरत महसूस होने लगी है.



ऑटो सेक्‍टर के विशेष मोहित अरोड़ा का कहना है कि सप्‍लाई चेन को चीन से हटाकर भारत लाने में कई तरह की चुनौतियां पेश आएंगी. वह कहते हैं कि इस बारे में अभी कुछ भी कहना बहुत जल्‍दबाजी होगी क्‍योंकि चीन एडवांस्‍ड टेक्‍नोलॉजी डेवलपमेंट के मामले में सबसे आगे है. चीन इलेक्ट्रिक वाहन, खनिज और सेमीकंडक्‍टर बनाने के मामले में दुनिया का नेतृत्‍व करता है. इन सभी चीजों को किसी भी दूसरे देश में ले जाने में बहुत बड़ा निवेश करना होगा. हालांकि, मौजूदा समय में कोई भी देश चीन पर भरोसा करने को तैयार नहीं है. इससे भारत सरकार और कंपनियों का अर्थव्‍यवस्‍था को पटरी पर लौटाने तथा दुनियाभर की कंपनियों के लिए देश में अवसर मुहैया कराने की ओर ध्‍यान गया.

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भारत सरकार लोकलाइजेशन को लेकर काफी मुखर है, लेकिन अब तक इस बारे में किसी ठोस पॉलिसी की घोषणा नहीं की गई है. यहां तक कि वित्‍त मंद्धी निर्मला सीतारमण ने वैश्विक महामारी के दौर में ऑटो कंपनियों को सीधे राहत पहुंचाने वाली एक भी घोषणा नहीं की है. हालांकि, चीन के खिलाफ बने माहौल से भारत को स्‍वदेशी अभियान को लंबी अवधि के लिए लागू करने का अच्‍छा मौका मिल गया है. चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग के रवैये के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रणाली में अवरोध पैदा हो गए हैं. इससे भारत को दुनियाभर की कंपनियों को लुभाने का शानदार अवसर मिला है. ऐसे में अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मेक-इन-इंडिया और आत्‍मनिर्भर अभियान सफल हो जाता है तो कोविड-19 के बाद भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के उबरने में बहुुत आसानी हो जाएगी.

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