Bhojpuri: 1857 की क्रांति का 80 साल का जवान योद्धा जिससे थर-थर काँपते थे अंगरेज

कुँवर बाबू 23 तारीख के अपना कटल हाथ पर पट्टी बान्ह के युद्द मैदान में कूद गइलें, 80 बरिस के बूढ़ शरीर रहे बाकिर जोश अइसन कि अंग्रेज के एगो जाँबाज कर्नल ली ग्रांड के सेना समेत भुजरी-भुजरी काट देहलें आ जगदीशपुर के अपना कब्जा में कर के आजाद करा देहलें.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 22, 2021, 6:45 PM IST
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23 अप्रैल – विजय दिवस विशेष: 1857 के क्रांति के बारे में सभे पढ़ले बा, सुनले बा, जनले बा. अंग्रेज आ ओकनी से प्रभावित अधिकतर इतिहासकार एह महान क्रांति के सैनिक विद्रोह के नाम दे के भुलवावे के कोशिश कइलें बाकिर भारत के लोग एकरा के पहिला स्वतंत्रता संग्राम कहल. एह संग्राम में अइसे त एक से एक लड़ाका लोग रहे बाकिर एगो योद्धा जे अपना बुढ़ापा में भी जवान लेखां लड़ल आ अंतिम सांस तक अंग्रेजन के ग़ुलामी ना मनलस, ओकरा जीवन के आखिरी लड़ाई के जीत के उपलक्ष्य में आज के दिन (23 अप्रैल) विजय दिवस के रूप में मनावल जाला. ओह योद्धा के नाम रहे वीर बांकुड़ा बाबू कुँवर सिंह.

कुँवर बाबू 23 तारीख के अपना कटल हाथ पर पट्टी बान्ह के युद्द मैदान में कूद गइलें, 80 बरिस के बूढ़ शरीर रहे बाकिर जोश अइसन कि अंग्रेज के एगो जाँबाज कर्नल ली ग्रांड के सेना समेत भुजरी-भुजरी काट देहलें आ जगदीशपुर के अपना कब्जा में कर के आजाद करा देहलें. कुँवर बाबू के वीरता के इतिहासकार अनदेखी कइलें, लोग उनके भुला देहलस. बाकिर, उनके शौर्य गाथा के सुनला के बाद रोआँ रोआँ फड़फड़ा जाला आ यकीन हो जाला कि उनके समकालीन आ उनका से कई बार आमना सामना के युद्ध करे वाला एगो अंग्रेज अफसर डगलस उनका बारे में साँचे लिखले बा कि “कुँवर अगर जवान होता तो उसने कब का अंग्रेजों को भारत से बाहर खदेड़ दिया होता”.

कंपनी सरकार भारत व्यापार करे के बहाने आइल आ इहाँ अधिकार जमा लेहलस. देश के अधिकतर रियासत अंग्रेजी हुकूमत के अधीन रहे बाकिर कुछ रियासत अइसन भी रहे जवन अंग्रेजन के लगान देव बाकिर अपना मर्जी से राज पाट चलावे आ बाहरी हस्तक्षेप कम होखे देव. अइसने एगो रियासत रहे जगदीशपुर. जगदीशपुर के एगो जमींदार रहलें साहिबज़ादा सिंह आ उनके चार गो बेटा रहलें, कुँवर सिंह, दयाल सिंह, राजपति सिंह, अमर सिंह. साहिबज़ादा सिंह के चाचा आ चचेरा भाई लोग उनसे जगदीशपुर धोखाधड़ी से हड़प लेले रहे जवन उ बाद में अदालती लड़ाई लड़ के हासिल कइलें. ई सब घटना ह 18वीं शताब्दी के सातवाँ दशक से लेके 19वीं शताब्दी के पहिला दशक के बीच के. साहिबज़ादा सिंह के जब जगदीशपुर मिलल त उ कर्जा में नाक तक डूबल रहे. उ कर्जा भरे खातिर खूब कोशिश कइलें बाकिर ना भर पवलें. उनका मृत्यु के बाद सन 1826 ईसवी में जगदीशपुर के हुकूमत उनके सबसे बड़ बेटा कुँवर सिंह के मिलल आ फेर जगदीशपुर के भाग्य चमकल.

कुँवर सिंह व्यवहार कुशल रहलें, मृदुभाषी रहलें अउरी बहादुर रहलें जेकरा चलते अंग्रेज अफसर उनके मुरीद रहलें आ ओकर फायदा उनके ई मिलल कि कुँवर सिंह के राज के शुरुआती समय में अंग्रेज जगदीशपुर के आंतरिक मामला में कम दखल देहलsसन. पटना के कमिश्नर विलियम टेलर के साथे त उनके मित्रता भी चलल. कुँवर बाबू बड़ा परोपकारी रहलें. उ अपना जीवन में एतना दान पुण्य कइलें, सदाव्रत चलवलें कि उनके रियासत के लोग हमेशा कुँवर सिंह के आपन प्यार आ समर्थन देहलस. उनके शासन बेवस्था एह बेरा के लोकतांत्रिक शासन के जइसन रहे. सभके समान अधिकार रहे, सभके बोले के आजादी रहे, सभे खुश आ संतुष्ट रहे. कुँवर के राज से पहिले जगदीशपुर के दिन-दशा बड़ा खराब रहे, रियासत पर लगभग 18 लाख के कर्ज लदाइल रहे, सालाना मालगुजारी से कमाई होखे 6 लाख रुपया के आस पास. कुँवर अइलें, नहर तालाब, बांध के निर्माण करवलें, कृषि के सुधार भइल, लोग में जगदीशपुर के विकास खातिर उम्मीद जागल, जंगल बसावल गइल, सड़क बनल, पाठशाला बनल, पढ़ाई-लिखाई में लोग होशियार होखे लागल आ मेन बात कि अंग्रेजन के हस्तक्षेप कम रहे, एह के परिणति ई भइल कि उहे जगदीशपुर जवन बेहाली में रहे, तरक्की के राहे चले लागल. सालाना मालगुजारी से कमाई सीधे 8-9 लाख के लगे पहुँच गइल आ आज से दू-सवा दू सौ बरिस पहिले एकर मोल अरबों में रहे.
कुँवर सिंह के लोकप्रियता अइसन कि आस पास के जमींदार जरे लगलें, अंग्रेज उल्टा उनके सलामी दागे लगलें. ओह बेरा कंपनी सरकार के अत्याचार चरम सीमा पर रहे, देश भर में विद्रोह के आगि सुनुगत रहे. कुँवर बाबू भी विद्रोहियन के संपर्क में रहलें, 1845 में सोनपुर मेला में एगो बड़हन गुप्त बैठक भी कइले रहलें. जब विद्रोह के आग धीरे-धीरे उपरियाइल त ओकर गर्मी अंग्रेजन तक पहुंचल, ओकनी का चिहुंक गइलन सन. ओहू ओर से तैयारी होखे लागल. जब दक्षिण के दक्कन से लेके उत्तर के दिल्ली, पच्छिम के मराठा से लेके पुरुब के सभ क्रांतिकारी राजा, महाराज, जमींदार, देशी सैनिक में गँठजोड़ भइल कि सुराज पा लेबे के बा त एगो दिन तय भइल. 1 जून 1858 के पूरा देश में अंग्रेजन के खिलाफ जंग होई आ ओकनी के कहीं बाहर से मदद ना लेबे दिहल जाई, सभके एही भारत भूमि में गाड़ दिआई. बाकिर एगो घटना 1857 में बैरकपुर छावनी में घटल. सूअर आ गाय के चर्बी से बनल कारतूस के विरोध में मंगल पांडे नाम के सैनिक के अगुआई में ब्रिटिश आर्मी के देसी पटलन गोरन पर गोली चला देहलस. विद्रोह के ई चिंगारी रहे जवन आग बनल जब मंगल पांडे के फांसी दिआ गइल आ फेर एकाएक चारों ओर क्रान्तिकारियन के मारल जाए लागल.

एने कुँवर बाबू भी तैयारी में रहलन. उ एगो दूरदर्शी सोच के जमींदार रहन. भले उनका लगे छोट रियासत रहे बाकिर उ आपन सेना के गठन कइलें, सेना के ट्रेनिंग खातिर बाहर से ट्रेनर मंगवलें, हथियार के गुपचुप निर्माण खातिर कारखाना बनवलें. दानापुर छावनी में भी विद्रोह भइल आ 25 जुलाई 1857 के तीन गो बटालियन 7वीं, 8वीं अउरी 40वीं बटालियन कुँवर सिंह से मिल गइल. कुँवर सिंह के आपन लड़ाका दल रहबे कइल, बाकी जगदीशपुर रियासत के किसान, मजदूर, सवर्ण जाति के लोग सभ उनसे मिल गइल आ उनके लगभग 5000-8000 के संख्या में सेना बल हो गइल. कुँवर बाबू के नेतृत्व में आरा पर चढ़ाई भइल आ जेलखाना, खजाना, कलक्टर ऑफिस आ थाना सभ पर कब्जा हो गइल. उहाँ के सगरो अंग्रेज अफसर जाके बॉयल हाउस (आरा हाउस) में लुका गइलें आ 6-7 दिन से बंद रहलें. ई कुँवर सिंह के जंग में पहिला लड़ाई रहे. ओकरा बाद कुँवर सिंह डनबर के हरवलें. बाकिर हथियारन के कमी अउरी अत्याधुनिक तोप आ बंदूक के सामने उनकर सेना तितर-बितर हो गइल अउरी एगो अंग्रेज कमांडर विन्सेंट आयर से हार गइलें आ आपन युद्ध रणनीति बदल देहलें. उ बाकी क्रान्तिकारियन से मिले आ अंग्रेजन के खिलाफ लड़ाई करे खातिर दोसरा रास्ता चल देहलें.

2 अगस्त के बाद कुँवर सिंह के अपना सेना के साथे जवन मार्च निकलल त सासाराम, रॉबर्ट्सगंज, रीवा, कलिंजर, बांदा, काल्पी होत कानपुर, लखनऊ, गाजीपुर, आजमगढ़, बलिया, अतरवलिया होत फेर 21 अप्रैल के जगदीशपुर लवटल. एह बीच कुँवर सिंह लगभग 20 गो से अधिका अंग्रेज कमांडर, योद्धा आ अफसरन के नाक से चना चबववलें, कईगो के मउगत के घाट उतरलें, कईगो के जीवन दान देहलें. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अइसन कवनो बीर बलवान ना भइल जे 80 बरिस के उमिर में 9 महीना के लमहर संग्राम-यात्रा पर निकलल होखे आ एतना क्रांति के आग सभमें भड़कवले होखे. उ अइसन समय रहे कि बड़ बड़ लड़ाका लोग खाली अपने किला आ रियासत खातिर लड़ल. बाकिर एगो भोजपुरिया योद्धा जहां गइल ओकरा खातिर लड़ल. एह क्रम में उनका आँखी के सामने आपन पोता, बेटा, मित्र के जान गइल बाकिर उ लड़त रहलें एह भारत के माटी खातिर, अंग्रेजन के जुल्म मिटावे खातिर. एह लड़ाई में आरा के मशहूर नर्तकी धर्मन बाई भी उनका साथे रहली. कुँवर आ धर्मन के केमेस्ट्री अलग से फेर कबो.



21 अप्रैल के गंगा नदी पार करत बेरा डगलस नाम के एगो अंग्रेज सेना अफसर उनके दाहिना बांह में गोली मार देहलस. कुँवर बाबू बिना हिचक के उ बाँहिए काट के गंगा मइया में दहवा देहले. अगिला दिने उनके घाव पर मरहम पट्टी भइल. तले एगो स्थानीय अंग्रेज अफसर ली ग्रांड के जगदीशपुर पर चढ़ाई करे के खबर आइल. ई घायल बूढ़ शेर फेर दहड़लस आ 23 अप्रैल के अपना प्रिय भाई अमर सिंह, सेनापति हरीकिशन सिंह आ कुछ और योद्धा के लेके ली ग्रांड के मटिया मेट क देहलें. ई उनकर आखिरी लड़ाई रहे, ओह दिन ब्रिटिश झण्डा यूनियन जैक उतरल, परमार वंश के झण्डा लहराइल आ अमर सिंह नया जमींदार बनलें अउरी उनके लइका उत्तराधिकारी. कुँवर बाबू के कटल हाथ के घाव में संक्रमण बढ़ल, बूढ़ शरीर रहे, उनके तबीयत बिगड़े लागल आ ऊ 26 अप्रैल के स्वर्ग के अनंत यात्रा पर चल गइलें. बाकिर, आपन प्रण निभा गइलें कि ना अंग्रेजन के गुलामी स्वीकार करब ना ओकनी के हाथे मरब. बारम्बार नमन बा माँ भारती के सच्चा सपूत वीर बाँकुड़ा कुँवर सिंह के. ( लेखक मनोज भावुक भोजपुरी साहित्य और सिनेमा के जानकार हैं. )


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