Bhojpuri: 18वीं सदी तक देसी चिकित्सा जानत रहे सर्जरी, जानीं पूरा डिटेल

आयुर्वेद याने खरबिरउआ आ एलोपैथ माने अंगरेजी के बीच विवाद काहें भइल, एह बारे में सभे जानि गइल बा. मीडिया के बहुमुखी उभार के दौर में सायदे केहू बा, जे एह बारे में नइखे जानत. त ओह बात के दोहरवला के इहवां कवनो माने नइखे.

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कोरोना से अभी देस जूझिए रहल बा कि इहवां एगो विवाद खड़ा हो गइल बा. आयुर्वेद बनाम एलोपैथ के विवाद आताना गहरा गइल बा कि एक तरफ देस के अंगरेजी डॉक्टर लोग काला पट्टी बान्हिं के विरोध कर ता त दूसरका ओरि देसी परंपरा आ लोक में भरोसा करे वाला लोग आयुर्वेद के खारिज कइला के खिलाफ उठिके खड़ा हो गइल बा.

आयुर्वेद याने खरबिरउआ आ एलोपैथ माने अंगरेजी के बीच विवाद काहें भइल, एह बारे में सभे जानि गइल बा. मीडिया के बहुमुखी उभार के दौर में सायदे केहू बा, जे एह बारे में नइखे जानत. त ओह बात के दोहरवला के इहवां कवनो माने नइखे.

एह विवाद में एगो खास तर्क लउकता. खरबिरउवा के भारी से भारी समर्थक भी दूगो बाति बिना कवनो हील-हुज्जत के मानि लेता. पहिलका ई कि आयुर्वेद में शल्य यानी सर्जरी के विधान ना रहे आ तात्कालिक राहत दियावे में अंगरेजी दवाई आ चिकित्सा पद्धति के कवनो तोड़ नइखे.

बाकिर ईहो अर्धे सत्य बा.
भारत विद्या के आधुनिक दौर में एगो बड़का अध्यवसायी भइल बाड़े. संजोग देखीं कि अगिला साल उनुकर जन्मशती ह. कवनो बुझउअल ना बुझावत सीधे-सीधे जानि लीं कि उहां के नांव रहे धर्मपाल.

गांधीवादी धर्मपाल जी के भारतीय संस्कृति आ परंपरा में गहरा दिलचस्पी रहे. उहां के लंदन जाइके अंग्रेजन के दस्तावेजन के गहराई से पढ़ाई कइले रहलीं. ओह पढ़ाई के बाद उहां के कई को बेहद अहम किताब लिखले बानीं. ओही में एगो किताब बिया, ‘भारत का स्वधर्म’. एह किताबि के पहिलका संस्करण 1994 में छपल रहे.

तीन अध्याय वाली एह किताब के दोसरका अध्याय के शीर्षक बा , ‘यूरोप से टकराव के पूर्व’.



ई किताबि में दिहल तथ्य एह मान्यता के सहजे खारिज करतारे कि भारतीय चिकित्सा व्यवस्था में सर्जरी ना रहे. आउर त आउर, इहवां महामारी टाइप वाली बेमारिन के टीका लगावे के देसी सिस्टम भी विकसित रहे.

अपना किताबि ‘भारत के स्वधर्म’ में धर्मपाल जी अंग्रेजन के दस्तावेज के हवाला से लिखले बाड़े कि बीसवीं सदी में भारत में महामारी के जवन चेचक वजहि रहे, जवना का खात्मा 1977 के आसपास जाके भइल, ओह चेचक के रोकथाम खातिर भारत में टीका लगावे के देसी पद्धति ईहां रहे. 1720 के दस्तावेजन के मोताबिक ई बात साबित होता.

धर्मपाल जी जवन लिखले बानीं, भोजपुरी में ओकर अनुवाद अक्षरश: प्रस्तुत बा. उहां के मोताबिक, “चरक आ सुश्रुत के एह देस में 18वीं सदी में भी आयुर्वेद के पर्याप्त प्रभाव रहे. चेचक के टीका लगावे के देसी प्रथा भारत के कई हिस्सन में चलन में रहे. जबकि इंगलैंड में चेचक के टीका 1720 ईस्वी के बाद आइल. शल्य चिकित्सा में भी भारत के गंवई वैद्य लोग 18वीं सदी तक एतना उन्नत रहलन कि इंगलैंड के स्थिति के उनुका लोगन से तुलने ना हो सकत रहे.”

अब सवाल ई बा कि आखिर जब भारत में आताना कौशल रहे त ओकर लोप कइसे हो गइल?

एकरो जवाब धर्मपाल जी देले बानीं. उहां के लिखले बानीं, “जवना तरी अंगरेज लोग सोच-समझि के देसी कपड़ा कारोबार आउर कारीगरी के खतम कइले, ओही तरी टीका लगावे आ देसी इलाज के तरीका के भी खतम कइले.”

धर्मपाल जी के अनुसार, “1802 ई. के करीब बंगाल प्रेसिडेंसी में देसी तरीका से टीका लगावला पर पाबंदी लगा दिहल गइल. एह वजहि से जबरदस्त महामारी फइलल. भारत में पुरान समय से रोग के रोके वाला गंभीर और व्यापक उपाय रहे. बाकिर अंगरेज ओके जानि-बूझि के दबवलसि आ आपन विकसित कइल तकनीक के पक्ष में हवा बनावे खातिर देसी तरीका पर पाबंदी लगा दिहलसि.”

धर्मपाल जी लिखले बानीं कि अंगरेज आपन तकनीक के प्रचार खातिर भारतीय टीका पद्धति पर रोक त लगा दिहलसि, बाकिर ऊ भारत में सभखा खातिर टीका मुहैया ना करा पवलसि. एह वजह से उन्नीसवीं सदी आ बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में भारत में चेचक के महामारी कई बेरि फइलल आ ओह में बहुते लोगन के जान गंवावे के परल.

धर्मपाल जी सबूत आ ब्रिटिश अभिलेखागार में रखल दस्तावेजन के आधार पर एह सोच के भी खारिज कइले बाड़े कि आयुर्वेद में सर्जरी ना रहे. उ लिखले बाड़े कि अंगरेजन के जब ताकत बढ़ि गइल त 1795 से 1815 के बीच ऊ भारतीय सल्य चिकित्सा पद्धति के अवैज्ञानिक बतावे खातिर बार-बार परचार कइलेस आ ओकरा खारिज करत रहले स. जबकि उहनियें किहां राखल दस्तावेजन में लिखल बा कि अठारहवीं सदी तक भारतीय वैद्य लोगन के सल्य चिकित्सा ज्ञान आ ओकर इलाज में चलन खूब रहे.

बाकिर बार-बार के प्रचार से देसीयो लोग माने लागल कि ई खराब बा, आ अंगरेजन के इलाज आ सल्य चिकित्सा ठीक बा. जइसे-जइसे अंगरेजी शिक्षा बढ़त चलि गइल, ओइसे-ओइसे एह सोच के विस्तार होत चलि गइल.

बनारस के हिंदू विश्वविद्यालय में आयुर्वेद के पढ़ाई त पहिले से होत रहे, एमबीबीएस यानी एलोपैथी के पढ़ाई बाद में सुरू भइल. आयुर्वेदाचार्य रंजीत शर्मा जी के कहनाम बा कि बीएचयू के एमबीबीएस के पहिलका बैच के विद्यार्थीयन के सल्य चिकित्सा बीएचयू के आयुर्वेद विभाग के वैद्य लोग सिखवले रहले.

ओइसे पश्चिमी मेडिकलो साइंस मानेला कि दुनिया के सबसे पुरान सर्जन सुश्रुत ऋषि रहले. इहे वजहि बा कि ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न विश्व विद्यालय के मेडिकल कॉलेज के मुख्य दुआर पर वैद्यराज सुश्रुत के मूर्ति लगावल गइल बा.

ई सभ जानकारी आ उदाहरण से साफ बा कि आयुर्वेदो एह सभ जानकारी आ निपुणता से लैस रहे. बाकिर हमनीं के ओह सभ के भुला गइल बानीं जा. (लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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