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Bhojpuri Special: जवन काशी म स्वीकार भइल, उ जगत क भइले... संगे पढ़ीं का होला बनारसी ठसक!

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श्रुति-स्मृति क बिसय में बतियावै लागि तो काशी अर्थात बनारस से बड़का अनुभव अऊर अस्तित्व त नईखे बानी. बनारस जवन एक ठो बार जइहें, ऊ एकरा भली-भांति अनुभव कर सकेला.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 25, 2021, 6:11 PM IST
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श्रुति-स्मृति क बिसय में बतियावै लागि तो काशी अर्थात बनारस से बड़का अनुभव अऊर अस्तित्व त नईखे बानी. बनारस जवन एक ठो बार जइहें, ऊ एकरा भली-भांति अनुभव कर सकेला. काशी बिस्व की सबसे पुरातन नगरी तो बटबै करी, किन्तु बनारस क अनुभव हृदय क बिसय बा, मस्तिष्क क नाहीं. दिल म आ सकेला, समझ म नाहीं. जइसन गंगाजल; जेतना चाहे अंजुलि में भर लिहअ, लेकिन अंजुलिए भर क मिली. बनारस धार्मिक अऊर आध्यात्मिक नगरी बा. इहां जीवन अऊर मृत्यु साथ चलत हईं. “उठा हो भोले. इतना भोर हो गईल, अबहीं तक सुतले हउअ” के भोर-निनाद क साथ त्रिलोक के नाथ बाबा विश्वनाथ के जगावे की परम्परा त बनारसै म दिखाई-सुनाई पड़ेला.

बनारस अउर बनारसी सीधे और सहज होत बानी, परन्तु ठसक भरपूर बा. सन्तोषी जीव देखे क चाही त बनारसी मनुष्य देखल जाई. बनारस क सम्मान करअ त आप राजा, लेकिन नखरे दिखइब त आपन अस्तित्वे समाप्त. अब जवन जीव बाबा के साध लिहेन, उ काहे जग की चिन्ता करै लगिहैं! बनारस में सब गुरु, केहू नाहीं चेला. दुकान के बाहर डंटे साण्ड देखल जाई, यातायात के चौचक जाम से निकले बदे जनसमुदाय म बहस करेवाला अउर घाट पर मालिसिये से सेवा करवावत बनारसी देखअ. जवन बतियन के साधारण समझे जात हौव्वअ, ऊमन बनारसी जीवन का मर्म निहित बा. आपन अकड़ धरा क धरा रह जाई. “जा बेटा, तोहरे जइसन छप्पन ठे के रोज चराइला” बनारसी स्वाभिमान अउर व्यवहार क प्रतीक बानी.

ठेठ बनरसीपने से तनिक अलगहु बिस्लेसण किहल जाई त पइहैं कि जुगीन बिस्व साहित्य अ वर्णनहु म बनारस की महिमा उन्नईस नईखे. प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक, व्यंग्यकार अउर वक्ता मार्क ट्वेन, जिनकर “अमेरिकी साहित्य क पिता” कहल जात हईं, बनारस क “इतिहासहु से प्राचीन, परम्परौ से प्राचीन, किंवदन्त्यौ से प्राचीन” बतवलस. दूसर पाश्चात्य इतिहासविद अ पुरातत्वविद काशी की प्राचीनता “बैबीलॉन, एथेन्स, रॉम, दमिश्क, काहिरा अऊर अन्य प्राचीन क संयुक्त कालखण्डौ से अधिक”, बल्कि “काशी कालौ से प्राचीन बा” बतावत हईं. शाश्वत नगर त काशी बटबै करी. बनारस और बनारसी कवनौ परिभाषा से परे हईं.



प्रगति अउर प्रौद्योगिकी क प्रभावो बनारस पर पड़ेला. सिगरा, महमूरगंज जईसन इलाका म बहुमंजिला इमारत अ दिल्ली, लखनऊ क कल्चर देखल जा सकत हईं. पर बनारस देखे क ह तो घाट पर आवा नाहीं त ठेठ बाबाजी क दर्सन कियल जाई. गाइड संगे घूमेवाला शहर त बनारस नईखे. बनारस की वास्तविक यात्रा खातिर त एक जन्मौ कम बा! बनारस क आपन विशिष्ट परिचय बटबै करी, किन्तु ई नगर बड़ा ग्रहणशील बा. प्रत्येक प्रदेश अ इहाँ तक कि दूसर देश की बोली-भासौ से कुछ न कुछ सीखत किन्तु आपन फक्कड़पन और मस्ती क रंग न भूलिहैं. ऊसे त कवनो समझौता त नइखे हो सकेला. जाति-धर्म क भाव त बनारस म भरपूर बा लेकिन पूरे आनन्द अउर गूढ़ता संगे.
स्वाभिमान अउर वैशिष्ट्य बनारस की बोली म भरपूर झलकत-छलकत बा. बनारसी साहित्य सर्जन पर तनिक नजर डाल लिह. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र “सेवक गुनीजन के, नगद दामाद अभिमानी के...” में मान-स्वाभिमान साफ दिखाई पड़त हईं. बनारस आवे क पश्चात गोस्वामी तुलसीदासौ एकर रंग स अप्रभावित न रहलन; लांछन अउर टीका-टिप्पणी पर कवितावली में उनकर पंक्ति पढ़े क चाही “धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूत कहौ, जोलहा कहौ कोउ. काहु की बेटी से बेटा न ब्याहब, काहु की जात बिगाड़बै न कोउ. मांगि के खइबो, मसीति में सोउबो, लेइबेको एक न देइबे को कोउ....” प्रसाद, प्रेमचंद, धूमिल...साहित्य में परम्परा क इतिहास काशी म सुदीर्घ बा. आधुनिक हिन्दी गद्य का स्वरूपौ बनारसे म अस्तित्व म अइलन, ई कहे में कवनो अतिसयोक्ति नइखे. हिन्दी गद्य क गाम्भीर्य अउर सुदृढ़ता क निर्माता आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हईं. आचार्य शुक्ल आलोचक, निबन्धकार, साहित्येतिहासकार, कोशकार, अनुवादक, कथाकार और कवि रहेन. हिन्दी साहित्य का इतिहास उनकर अतिविशिष्ट रचना बा. साहित्य कालखण्ड क निर्धारक, हिन्दी निबन्ध क बिस्वस्तरीय बानवे म अउर भासा की गद्यशक्ति की प्रस्थापना म शुक्लजी अनन्य बाटे. वइसे शुक्लजी क जन्म बस्ती में भईल रहा और प्रारम्भिक जीवन मिर्जापुर में बीतलस, किन्तु साहित्य कर्तृत्व त बनारसे म रहा. नागरी प्रचारिणी सभा म हिन्दी शब्दसागर क सहायक सम्पादक अउर प्रचारिणी की पत्रिका के सम्पादक रहेन. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय म विभागाध्यक्षौ रहेन.

बोलियों का इतिहास हजार वर्ष से अधिक क नाहीं. बनारस में ही बनारसी भोजपुरी क आपन वैशिष्ट्य त बटबै करे, पर नगर क विभिन्न भागौ म जइसन गोदौलिया, कबीरचौरा, गायघाट, बड़ी बाजार और लंका में ओकर अलग-अलग पुट बा. जॉर्ज एब्राहम ग्रियर्सन, जेकर आग्रह पर जनगणना भईल रहल, लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया के प्रणेता रहलेन. उनकर कार्यकाल के दौरान बोलियों पर भी कार्य भइले रहा. ई सोध म बनारसी सहित अन्य बोलियों का स्वरूप प्रकट भईल.
गमछा उठाए, लंगोट पहने और अखाड़े म जाए बदे, यानी पहलवानी करै बदे बनारसी जीवन. लंगोट की मजबूती इहाँ क बिसेश मुहावरा प्रसिद्ध बा. पहलवानी काशी की प्रतिष्ठा क प्रतीक पहिले खूब रहली, अबहुं तनिक तनिक बा. पहिले त काव्य-संगीत संगे पहलवानी की गणना प्रतिष्ठित म होत रहल. अखाड़ों की संख्या ओकर प्रमाण बा, लोकप्रियता त आजौ बा. पहिले हर मोहल्ले में अखाड़े रहेन, आज अधिकतर के नाम शेस बाटे, जैसे, पण्डाजी क अखाड़ा, राज मन्दिर अखाड़ा, अधीन सिंह अखाड़ा, स्वामीनाथ अखाड़ा आदि.

हर युग म काशी अध्यात्म, संस्कृति और शिक्षा का केन्द्र रहीन ह. धर्म रक्षण म आद्य वेदान्त के सबसे महान प्रवर्तक दक्षिण से आवेवाले शंकराचार्य क कर्मभूमि अउर विजय-भूमि बनारस रही, जिनकर माध्यम से आपन मत क प्रवर्तन अउर विमत क खण्डन भईल रहा. सब काशिये म आकर होत रहल. बनारस प्रयोग भूमि प्रतिष्ठित अउर बिस्वविख्यात बा. गौतम बुद्ध ज्ञानबोध गया म प्राप्त कइलस किन्तु धर्म चक्र प्रवर्तन बदे ऋषि पत्तन यानी सारनाथ, वाराणसी आए. ऋषि-मुनि, साधु सन्त त पुण्यसलिला गंगा क सान्निध्य में तप करे बदे मोक्षदायनी काशी अवते बाटे. सगुण क सौष्ठव अथवा निर्गुण क नाद, सब काशी म विद्यमान हईं. छत्रपति शिवाजी महाराज क राज्याभिषेक बदे गागाभट्ट काशी से पुणे गईलेन. महान विचारक, स्वतन्त्रता सेनानी, कर्मयोगी भारतरत्न पण्डित मदन मोहन मालवीय क अनन्य योगदान काशी हिन्दू विश्वविद्यालय त प्रसिद्ध बाटे. जवन काशी म स्वीकार भए, उ जग क भइलन.
(लेखक दक्षिण भारत मूल के हैं लेकिन वाराणसी में निवास करने के कारण भोजपुरी प्रेमी हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
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