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Bhojpuri: बाबा साहेब जमीन से असमान जइसन ऊंचाई पर कइसे पहुंचलन? जनम दिन पर जानीं

Bhojpuri: बाबा साहेब जमीन से असमान जइसन ऊंचाई पर कइसे पहुंचलन? जनम दिन पर जानीं

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धन-दौलत हमेशा से ऊंचाई क पैमाना रहल हौ, लेकिन इतिहास अउर वर्तमान में अइसन कई उदाहरण हयन, जहां ऊंचाई क पैमाना शिक्षा, संकल्प, समर्पण अउर मेहन रहल हौ. एक दबल-कुचलल, दलित, गरीब के ऊंचाई पर पहुंचय क इहय एक रस्ता हौ. संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव आंबेडर एही रस्ते जमीन से असमान तक क सफर तय कइलन.

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बाबा साहेब भीमराव के पास धन-दौलत नाहीं रहल. लेकिन ओनकर अछूत महार जाति रस्ता क सबसे बड़ा रोड़ा रहल. हर कदम ओन्हय जाति के नाते जलील होवय के पड़ल, वंचित होवय के पड़ल. लेकिन संकल्प क पक्का भीमराव पंगडंडी पगडंडी चलि के अपने मंजिल तक पहुंचलन. बाबा साहेब एह बाती क मजबूत उदाहरण हयन कि शिक्षा ही सबसे बड़ी दौलत हौ, जवने के आगे बड़ी-बड़ी दौलत के घुटना टेकय के पड़यला. बाबा साहेब अपने मेहनत, संकल्प अउर समर्पण से इ बात भी स्थापित कइलन कि शिक्षा अउर ज्ञान पर हर जाति, धर्म अउर समुदाय क समान अधिकार हौ.

बाबा साहेब क पिता रामजी मालोजी सकपाल कबीरपंथी रहलन. मध्य प्रदेश के महू छावनी में अंगरेजी सेना में तैनात रहलन. नोकरी के अंतिम साल में उ अपने महरारू भीमाबाई के साथे काली पलटन स्थित जवने बैरक में रहत रहलन, ओही में 14 अप्रैल, 1891 के 14वीं संतान के रूप में भीमराव क जनम भयल. आज ओही स्थान पर बाबा साहेब के याद में भव्य स्मारक बनल हौ. मालोजी सकपाल अपने लड़िकन के पढ़ाई-लिखाई पर बहुत ध्यान देयं. भीमराव के भी स्कूल भेजलन. ओह जमाने में छुआ-छूत एतना जादा रहल कि मास्टर लोग दलित लड़िकन क नोटबुक तक न हाथे से छूअय. दलित छात्रन के बइठय क अलग बंदोबस्त रहय. स्कूली में खुद से पानी पीयय क मनाही रहल. चपरासी उप्पर से अजुरी में पानी गिरावय. भीमराव के इ व्यवस्था परेशान करय. घरे आइ के शिकायत करयं. लेकिन बचय क कवनो रस्ता नाहीं रहल. भीमराव बहुत मेधावी, मेहनती अउर कुशाग्र बुद्धि क रहलन. उ हर बाधा के पार करत आगे निकलत गइलन. बाभन जाति के अपने अध्यापक कृष्ण महादेव आंबेडकर के कहले पर उ अपने नाव से सकपाल हटाइ के आंबेडकर जोड़ि लेहलन.

शुरुआती पढ़ाई के बाद भीमराव मुंबई के प्रतिष्ठित एलिफिस्टन स्कूल में दाखिला लेहलन. एलिफिस्टर स्कूल में पढ़य वाला उ पहिला दलित रहलन. इहां से उ 1907 में मैट्रिक क परीक्षा पास कइलन. बीए क पढ़ाई करय बदे ओन्हय बड़ौदा नरेश सयाजी राव गायवाड से फेलोशिप मिलि गयल. भीमराव संस्कृत पढ़य चाहत रहलन, लेकिन ओह जमाने में दलितन के संस्कृत तक पढ़य क अनुमति नाहीं रहल. भीमराव फारसी लेइ के मुंबई विश्वविद्यालय से बीए क परीक्षा पास कइलन. अब एमए क पढ़ाई विदेश में करय बदे सयाजी राव गायकवाड से फिर फेलोशिप मिलि गयल. भीमराव अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में दाखिला लेहलन. सन् 1915 में एमए क परीक्षा पास कइलन, अउर 2016 में कोलंबिया विश्वविद्यालय से ही पीएचडी क उपाधि हासिल कइलन. आंबेडकर के शोध क विषय रहल -’ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त का विकेंद्रीकरण’. बाबा साहेब क पढ़ाई क पियास एही ठिअन खतम नाहीं भयल. अमेरिका से पढ़ाई पूरी कइ के लउटत रहलन, अउर रस्ते में ब्रिटेन के ’लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस’ में एम.एससी, डी.एससी, अउर विधि संस्थान में बार-एट-लॉ के उपाधि बदे पंजीकरण कराइ लेहलन. बाद में कोलंबिया विश्वविद्यालय ओन्हय एल.एलडी अउर उस्मानिया विश्वविद्यालय डी.लिट के मानद उपाधि से सम्मानित कइलस. एह तरह से बाबा साहेब अपने जमाने में भारत क सबसे जादा पढ़ा-लिखा आदमी बनि गइलन, जेकरे पास बीए, एमए, एमएससी, पीएचडी, बैरिस्टर, डीएससी, डी.लिट सहित कुल 26 डिग्री रहल.

बाबा साहेब के इ बात समझ में आइ गइल रहल कि अपने जातीय कलंक के मिटाइ के आगे बढ़य क ओनकरे पास एकमात्र रस्ता शिक्षा अउर ज्ञान ही हौ. पढ़ाई क धुन ओनकरे उप्पर एतना सवार रहल कि उ जिनिगी के अंतिम समय तक पढ़त रहलन. दिन-रात पढ़ाई में डूबल रहयं. किताबी बदे दिल्ली में लाल किला के सामने लगय वाली पुरानी किताब के बजार में पहुंचि जायं, अउर उहां से छांटि-छांटि के किताब लियावयं. आंबेडकर क एक अनुयायी नामदेव निमगड़े अपने किताब ’इन द टाइगर्स शैडो: द ऑटोबायोग्राफी ऑफ एन आंबेटकराइट’ में लिखले हउअन, ’’रात में आंबेडकर किताब पढ़ने में इतना खो जाते थे कि उन्हें बाहरी दुनिया का कोई ध्यान ही नहीं रहता था. एक बार देर रात मैं उनके अध्ययन कक्ष में गया और उनके पैर छुए. किताबों में डूबे आंबेडकर बोले ’टामी ये मत करो’. मैं थोड़ा अचंभित हुआ. जब बाबा साहेब ने अपनी नजरें उठाई और मुझे देखा तो वह झेंप गए. वह पढ़ने में इतना ध्यानमग्न थे कि उन्होंने मेरे स्पर्श को कुत्ते का स्पर्श समझ लिया था.’’ निमगड़े एक दइयां ओनसे पूछलन कि आप किताब एतना पढ़यलन त फिर अराम या मनोरंजन कब अउर कइसे करयलन? बाबा साहेब क जवाब रहल, ’’मेरे लिए रिलैक्सेशन यानी मनोरंजन का मतलब एक विषय को छोड़ दूसरे विषय की किताब पढ़ना है.’’

आंबेडकर क जीवनी लिखय वाला धनंजय कीर लिखले हउअन, ’’आंबेडकर पूरी रात पढ़ने के बाद भोर में सोने के लिए जाते थे. सिर्फ दो घंटे सोने के बाद वह थोड़ी कसरत करते थे. उसके बाद नहाकर नाश्ता. अखबार पढ़ने के बाद वह अपनी कार से कोर्ट जाते थे. इस दौरान वह उन किताबों को पलट रहे होते थे जो उस दिन उनके पास डाक से आई होती थी. कोर्ट समाप्त होने के बाद वह किताब की दुकानों का चक्कर लगाया करते थे और जब शाम को घर लौटते थे तो उनके हाथ में नई किताबों का एक बंडल होता था.’’ किताबी से बाबा साहेब के एतनी मोहब्बत रहल कि उ आपन किताब केहूं के पढ़य बदे न देयं. ओनकर कहना रहय कि जेके भी किताब पढ़य क शौक होय, उ ओनकरे पुस्तकालय में आइ के पढ़य. बाबा साहेब के पास ओनकरे निधन के समय 35 हजार किताबिन क समृद्ध संग्रह रहल.

किताब अउर अध्ययन के बल पर बाबा साहेब समाज के गलत रीति-नीति के खिलाफ खड़ा होइ पइलन. समाज के वंचित वर्ग के ओकर हक देवावय बदे कुछ कइ पइलन. वरना छुआ-छूत क जवन माहौल ओह जमाने में रहल, एक दलित क जीवन-यात्रा बीच रस्ते कहा खतम होइ जात, कुछ पता नाहीं. भीमराव जब नौ साल क रहलन, अपने पिता से मिलय सतारा से कोरेगांव गइलन. स्टेशन से बैलगाड़ी वाला दलित के नाते ओन्हय लेइ जाए से मना कइ देहलस. दुगुना पइसा देहले पर एह शर्त पर तइयार भयल कि उ अउर ओनकर भाय बैलगाड़ी चलइहयं, अउर उ ओनकरे साथे पैदल चली. सन् 1945 में जब उ वायसराय काउंसिल के लेबर सदस्य के रूप में ओडिशा के पुरी जगन्नाथ मंदिर गइलन, तब ओन्हय मंदिर में प्रवेश नाहीं करय देहल गइल. ओही साल कलकत्ता में उ अपने एक परिचित के इहां मेहमान रहलन. लेकिन ओकर नौकर बाबा साहेब के जाति के नाते ओन्हय खाना परोसय से इनकार कइ देहलस. इहय कुल कारण रहल कि आंबेडकर जाति व्यवस्था क वकालत करय वाली किताब मनुस्मृति के सरेआम जरइले रहलन.

किताबी क कीड़ा भीमराव आंबेडकर देश के एक अइसन किताब बनाइ के देहलन, जवने के भारत क संविधान कहल जाला. ओही संविधान के अधार पर आपन देश चलि के आज इहां तक पहुंचल हौ. समाज में दलित, पिछड़ा, महिला, अल्पसंख्यक, हर दबल-कुचलल वर्ग के सम्मानजनक जीवन जीयय के अधिकार क विधान संविधान में आंबेडकर कइले हउअन. समाज के हर कमजोर आदमी क मसीहा बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर देश अजाद भइले के कुछ साल बाद छह दिसंबर, 1956 के दिना आपन दुनिया छोड़ि के चलि गइलन.

(सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Ambedkar Jayanti, Article in Bhojpuri, Bhojpuri

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