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Bhojpuri: भादो महीना में अनंत चतुर्दशी के सबका इंतजार रहेला, ता जानी एकर शास्त्रीय महत्व

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Anant Chaturdashi 2021: भादो महीना में शुक्ल पक्ष चतुर्दशी के दिने अनंत चतुर्दशी के पर्व मनावें के विधान बा। वइसे पूर्णमासी संयुक्त चतुदर्शी में भी ई पर्व करें के बारे में लिखल बा। बाकि शास्त्रीय विधान ई बा कि यदि चतुर्दशी के दिन पूर्णिमा योग होत बा, तब अनंत चतुर्दशी के व्रत कइल जा सकेला। यदि पूर्णिमा उदया तिथि में पड़त होखें, तब पूर्णिमा के दिने ही व्रत करें के चाहीं। भादो चतुर्दशी के दिने ही गणेश जी के पार्थिव प्रतिमा के विसर्जन होला।

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गणेशोत्सव त्योहार के खासकर महाराष्ट्र में “लोकोत्सव ” रूप देबे में महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक जी के बड़ी भूमिका रहल। अनंत चौदस, जैन धर्म के माने वाला खातिर भी खास दिन होला। जैन धर्म में एह दिन के “ संवत्सरी ” के नाम से जानल जाला। जैन धर्म में चतुर्दशी का दिन “पर्यूषण पर्व” के आखिरी दिन भइला के वजह से भी खासा महत्वपूर्ण हो जाला। एह दिन के ‘क्षमावाणी’ भी कहल जाला।

ऋग्वेद के पुरूष सूक्त में अनंत के कल्पना मिलेला।अनंत ब्रम्ह अउर एह ब्रह्मांड के संबंध बतावें खातिर आपन ऋषि लोग शेषशायी भगवान विष्णु के कल्पना कइल। वेद के एह गूढ़ रहस्य के पौराणिक कथा में विस्तार दिहल गईल। पौराणिक कथाओं के जरिये ई बात बतावल गईल कि “ ई पृथ्वी शेषनाग के फ़न पर स्थित बा। विष्णु जी शेषशायी हई ।” सृष्टि के पहिले एह ब्रह्मरूप पुरुष के चर्चा ‘पुरूष सूक्त’ में “ सहस्रशीर्षा पुरूष: सहस्राक्ष, सहस्रपात” के रूप में भईल बा। यहां सहस्र शब्द संख्या के ना अनंत के सूचित करें वाला शब्द बा। इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल जी बतावत बानी कि “ जगत की उत्क्रांति से ब्रम्हा के दो नाम प्राप्त हुए – उच्छिष्ट अउर उच्छेष। बिना सृष्टि के ब्रम्हा की उच्छिष्ट उपाधि नहीं हो सकती। सृष्टि के साथ ब्रह्म की विष्णु संज्ञा हो जाती है। यहीं ब्रम्हा के सृष्टि के संबंध में दूसरा नाम है। यह सृष्टि विष्णु है। इसको अनंत का आधार बताया गया है। यह अनंत शेष का ही दूसरा नाम है।” विष्णु के नारायण अउर केशव नाम से भी जानल जाला। विष्णु के शेष के आधार पर रहला के कारण शेषशायी कहल जाला। शास्त्रन में बतावल गईल बा कि “ विष्णु नामक ब्रह्मांड उसी क्षीर सागर के अंदर शयन करता रहता है,उसका आधार शेष या अनंत ब्रम्ह है।” इस अनंत रूप को प्रकट करने के लिए ही नाग आकृति का आश्रय लिया गया है, जो कुंडली मारकर बैठा है।( बकौल वासुदेव शरण अग्रवाल ) महाभारत के आदि पर्व में भी शेष के नागराज कहल गईल बा, अउर उनकर संज्ञा अनंत भी दिहल गईल बा।

ब्रह्म के एह अनंत रूप के याद करें खातिर भादो महीना में चतुर्दशी के एक दिन व्रत के परम्परा बा। त्रयोदशी के दिन एक वक्त भोजन कर के अनंत चतुर्दशी व्रत रखल जाला। यह व्रत चौदह वर्ष में पूरा होला। अनंत चतुर्दशी के दिन कवनों विद्वान पंडित के पास जाके वेद के ‘पुरूष सूक्त’ पर विचार करें आ अनन्त के माहात्म्य के बारे में कथा सनें के बतावल गईल बा। एकरा बाद पुरुष सूक्त के सोलह मंत्रों से षोड़शोपचार से पूजा के विधि भी बतावल गईल बा। फिर अनंत सूत्र के पुरुष दाहिने हाथ में अउर स्त्री बायें हाथ में बांधे के विधान बतावल बा। ई चौदह सूत्रीय अनंत- विष्णु, अग्नि, सूर्य,सहस्राक्ष, ब्रम्हा , इंद्र , शिव, गणपति, कुमार, चंद्र, वरुण,वायु, पृथ्वी अउर वसु- ये चौदह ग्रन्थि देवता ब्रम्हा के नामान्तर रूप हैं। अनंत सूत्र के चौदहों गांठ अंदर की ओर गूथल होला। ठीक से देखला पर अइसन लागि कि सर्प कुंडली मार के बइठल बा। अनंत सूत्र के गांठ अउर यज्ञोपवीत के गाँठन में फर्क के भी देखल जा सकेला। एह अनंत सूत्र के गांठ के “ अनंत संसार महासमुद्रे मग्नं समुभ्युद्धर वासुदेव अनंतरुपे। विनियोजस्व हयनंत सूत्राय नमो नमस्ते। मंत्र बोलकर धारण करें के विधान बतावल बा। एह दिन विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र पढ़ले से हर तरह के मनोकामना पूरा होला। पौराणिक कथा में बतावल गईल बा कि राजा हरिश्चन्द्र अनंत चतुर्दशी के व्रत कइलें रहीं, एह व्रत के कइला के वजह से ऊहां के राजपाठ दुबारा मिलीं गईल।

अनंत चतुर्दशी कथा के माहात्म्य महाभारत में भी बतावल गईल बा। एह कथा में युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ कइले का चर्चा बा। यज्ञ में भब्य लक्षागृह के निर्माण भईल। एह में अइसन खूबी रहें कि जहाँ सूखा दिखाई दें वहां पानी रहें, अउर जहां पानी दिखाई दें वहां सूखा रहें। एह दुविधा में जब दुर्योधन पड़ी गइलें, तब उनका के लजावें खातिर द्रौपदी के हंसी आ गईल। कहली कि “ आखिर अंधा के पुत्र अंधे नु होई। ई बात दुर्योधन के अंदर तक साल दिहलस। एह अपमान के बदला लेबे खातिर ऊँ अपना मामा शकुनि के पास गइलें। शकुनि उनका के घुत्तक्रीड़ा के उपाय सुझवलन। एह जुआ में पाण्डव आपन राजपाठ समेत पत्नी द्रौपदी के भी हार गइलें।

पांडवन के ना सिर्फ राजपाठ के त्यागे के पड़ल, बल्कि अज्ञातवास के सजा भी भुगते के पड़ल। जब पांडवन के अज्ञातवास में कई तरह के कष्ट उठावें के पड़ल,तब युधिष्ठिर जी एह दुख से उबर के उपाय कृष्ण जी से पूछली। भगवान कृष्ण जी अनंत चतुर्दशी व्रत के उपाय बतवलीं। एह व्रत के परताप से पाण्डवन के आपन अज्ञातवास खत्म हो गईल, अउर राजपाठ भी प्राप्त हो गइल। तब से एह पौराणिक कथा के लोकजीवन में महत्व आज तक बरकरार बा। एक तरह से देखल जाय त ब्रम्हा सृष्टि रूप में विष्णु के जरिये प्रकट भइलें। ब्रम्हा जी के प्रति कृतज्ञता निवेदित करें खातिर आपन ऋषि लोग साल में एक दिन व्रत-कथा अउर ध्यान के विधान कईल। चौदह गांठ वाला अनंत सूत्र के जरिये ब्रम्ह के याद के भी विधान भईल।

बचपन में दुगो पर्व करें खातिर लड़कन के खूब इंतजार रहें-कृष्ण जन्माष्टमी अउर अनंत चतुर्दशी। एह दुनो परबन में ढेर कवनों तूल तवालत भी ना रहें। कृष्ण जन्माष्टमी के दिने बग़ीचा में खूब अमरूद खाएं के मिलें। आधी रात्रि में सिंघाड़ा के हलुआ मिलीं जाय, आ ओकरा संगवे सोनह धनिया के पंजीरी पा के लड़िकन के मन जुड़ा जाएं। एगो बगल के गांव के चाचा कहिहें कि ई पंजीरी खाएं खातिर हमारा गांव के पहिले कतना लोग साधु हो जाए। भर भादो बगल के गांव के कवनों मठिया पर डेरा डाल दें। अनंत के बिहान भईल से गोबर के गोइठा/ चिपरी/ गोहरी पाथे के शुरुआत भी हो जाएं। अब नु सबके घर गैस के चूल्हा पहुँचल बा। पहिले खाना गोइठे/ गोहरी पर बनें। मतलब कि अनंत के बाद एक तरह से वर्षा ऋतु के अंत मानल जाय। खेत- मेढ़ पर कांस दिखाई दे तब वर्षा ऋतु के अंत हो जाएं। अब मौसम के बारे में कवनों निश्चित भविष्यवाणी भले नइखे हो पावत, बाकि गांव के किसान अनंत पूजा के बाद अगला फसल के बारे में सोचे शुरू करीं दिहे। काहे कि अनंत तक भदई के मक्का के फसल तैयार हो जाई। तब अनंत चतुर्दशी के वैदिक, पौराणिक महत्व के बारे में अतना जानकारी ना रहें। बाकी इहो कम महत्वपूर्ण बात नइखे कि वैदिक सूत्र के गूढ़ रहस्य के पौराणिक कथा के जरिये लोक जीवन में आज भी खूब श्रद्धा के साथ मनावल जात बा।

(मोहन सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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