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Bhojpuri Spl: जब माट्साब पूछलीं- बनवारी हो रहरी में बोलता हुआंड़, त लागल सभे हंसे!

बलिया जिला (Balia, UP) के मुख्यालय के एलडी कॉलेज (LD College, Balia) में ओह घरी हामार इंटर कालेज में हिंदी के एगो लेक्च ...अधिक पढ़ें

पिछिलिका सदी के अस्सी से लेके एह सदी के सुरूआत के दिन भोजपुरिया समाज गजबे अराजक दौर से गुजरल बा. मिडिल स्कूल तक के पढ़ाई के छोड़ि दीं, चाहें हाई स्कूल-इंटर के पढ़ाई होखे भा, बीए-एमए के, मास्टर लोगन के काम कॉलेज में पढ़ावल कम आ आपाना घरे टिशनी (ट्यूशन) पढ़ावल, आपन खेती-बारी करावल, ठीकेदारी करावल भा एलआईसी के एजेंटी कइल ज्यादे रहे. ओह घरी एगो पीयरलेस नाम के भी कंपनी आइल रहे, ओकरो इंश्योरेंसे बेचे में बेरोजगार ले ज्यादा मास्टरे लोग रहे.

बलिया जिला के मुख्यालय के एलडी कॉलेज में ओह घरी हामार इंटर कालेज में हिंदी के एगो लेक्चरर साहेब रहले. दूइ साल में ऊ खूब क्लास लेले होइहें त दस गो भा बारह गो. उनुकर एगो क्लास आजु ले यादि बा..ओइसे त उ जब क्लास में आवसु त अल-बल्ल कुछुओ बोलसु. अलबलाह सवाल पूछसु. विद्यार्थी लोग उहनीं के जवाब दिहला ले ज्यादा मजा लेत रहे लोग..ओइसे विद्यार्थियन के भी पढ़े में ओह घरी दिलचस्पी कमे रहे, पाता रहे कि नकल होई आ ऊ तगमा जीतिए लीहें.
बहरहाल एक दिन हिंदी वाला मास्टर साहेब एगो लइका के क्लास में खाड़ा कइ के सवाल पूछले,

ए फलाना, ई बताव, हई के केकरा से कहता?
बनवारी हो रहरी में बोलता हुआंड़.

ई सवाले अइसन रहे कि क्लास में बइठल करीब साठि को विद्यार्थियन के हंसी छूटि गइल. जेकरा से सवाल पूछाइल रहे, उ हो आपन हंसी ना रोकि पवले.
क्लास हंसते रहे त गुरूजी के अगिलका सवाल रहे,
बताव लोग, के केकरा से कहता.
अब केहू जानत होई तब नू बताई.
मास्टर साहेब के विद्यार्थियन के अज्ञान पर लेक्चर झारे के मौका मिलि गइल.
लंबा लेक्चर सुनवला के बाद बतवले कि ई राधा जी कान्हा के डेरवावतारी.

मास्टर साहेब के मुताबिक, किशन जी से राधा जी उमिर में बड़ रहली. एगो राति खा ऊ राधा जी के तंग करे लगले त उनुका के डेरवावे खातिर उ बोललि, बनवारी माने किशन, रहरी के खेत में हुआंड़ बोलता.
मास्टर साहेब के कहानी छोड़िं सभे. तकनीकी क्रांति, बिजुली के चकमक आवे से पहिले, सांझि होते घर के बाल-बुतरू लगिहें स घर के जेठ-बड़ के तंग करे. ओह घरी घरे-घरे पैखाना ना रहे, त दिशा-फरागत खातिर बचवन के माई के अन्हार होते खेत में जाए के परत रहे. जइसहिं माई खेत खातिर जइहें स कि ओकर बच्चा रोवल सुरू कइ दिहें स.

तब घर के जेठ-बड़ बचवन के डेरवावे लागी, चुप रह, ना त भकउंआ आ जाई.

हमरो मइया हमनी के बचपन में अइसहीं डेरवइले बाड़ी. हमनी के पीढ़ी के आजु ले ना बुझाइल कि भकाऊं का होला. बस भकाऊं के नाम सुनलीं त लागि कि जइसे कवनो भयानक जनावर ह, जवन आन्हारा में से अचानक आई, आ हमनी के धई ले जाई.

ओहि तरी हुआंड़ से बच्चन के डेरवावल जात रहल हा. भोजपुरी लोक रचनाकार राधा-किशन के प्यार में भी एह हुआंड़ के प्रसंग ले आ दिहलसि. आ बनि गइल एगो प्यारा लोकगीत.

भोजपुरिया समाज में बचवन के अनुशासित करे खातिर अइसन काताना अनजान, अनदेखा जानवरन के खोज कइले रहल हा..

एही तरी एगो आउर खोज रहल हा बुड़ुआ के.

भकाऊं त फेंड़ पर रहे वाला भयानक जानवर रहल हा त हुआंड़ रहरि आ उखि के गझिन खेत में रहे वाला. भोजपुरी समाज में पानियो में रहे वाला जनावर के खोज कइ लेले रहल हा. बुड़ुआ पानिये के जानवर रहे.

हमनी के गांव के प्राइमरी स्कूल पोखरा के किनारे बा. ऊ स्कूल अभियो ठाढ़ बा, ओकर नाया अलबल बिल्डिंगो बनि गइल बा, ओह में तैनात मास्टर लोग के तनखाह हमनी के मास्टर लोगन के तुलना में कम से दू सौ गुना ज्यादा हो गइल बा. बाकिर ओह में ना त विद्यार्थी बाड़े ना पढ़ाई. पढ़े वाला प्राइवेट स्कूल में जा तारे, जवना के मास्टर लोगन के केहू तरी पेट जियावे लायक तनखाह मिलेला.
बहरहाल हमनीं के लरिकाईं में रोजाना ताकीद कइल जाई, पढ़े जइह त पोखरा के भीटा से नीचे उतरबो मति करिह. काहे कि पानी में बुड़ुआ बा, ऊ धइ लिही आ डुबा दीही. इहां तकले डेरवावल जाइ कि बुड़ुआ का करेला कि गहिर पानी में ले जाके नाक, कान, मुंह में माटी ठूंसि देला.

भोजपुरिया समाज सैकड़ों साल से परेशानी, दुख आ दलिदर झेलत आइल बा. ओहसे मुकाबला आपाना ढंग से कइले बा. ओकरा सामने जिनगी जिए के झंझट से मुक्तिए ना रहे त बाचा कहां से संभालि पाई त उ बचवन के अनुशासित करे खातिर कबो हुआंड़, त कबो भकाऊं त कबो बुड़ुआ के कल्पना करत रहल हा. ओहि बहाना आपाना नवका पीढ़ि के ऊ अनुशासित करत रहल हा.

एही तरी हू राकस, भूत, चुरइल, बर्हम आदि के भी कल्पना कइले रहल हा. एह शब्दन के गूंजे अइसन रहल हा कि राति खा इहनी के चर्चा करते बड़-बड़ दिलेर लोगन के हवा सटकि जात रहल हा. उनुका जुबान से हनुमान चालीसा अपने आप फूटि परत रहल हा. चालीसा यादि नइखे त बजरंग बली के नाम बा नूं, ओहि से काम चली. संचार क्रांति आ विकास के दौर के भोजपुरिया पीढ़ी के सायदे पता होई कि बुड़ुआ का होला, हुआंड़ कइसे डेरवावे ला आ भकाऊं कइसे लोगन के हवा टाइट कइ देत रहल हा. (लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

Tags: Bhojpuri, Bhojpuri News, भोजपुरी

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