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Bhojpuri Spl: काशी में आज बाबा विश्वनाथ क तिलक, शिवरात्रि के होई बियाह

पांच वैदिक ब्राह्मण बाबा के पंचबदन चांदी के प्रतिमा के पंचामृत में स्नान करइहय अउर विशेष पूजा-पाठ करिहय. बाबा के नया कपड़ा अउर गहना से सजाइ जाई. बाबा चांदी के पालकी में सवार होइहय. बाबा के पंचमेवा, फल, मिठाई क भोग लगाइ जाई अउर ओनकर आरती कइ जाई.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 18, 2021, 12:37 PM IST
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धर्म नगरी काशी में हर साल की नाईं एह साल भी बसंत पंचमी के दिन बाबा विश्वनाथ क तिलक चढ़ावय क पूरी तइयारी हौ. पूरा शहर बाबा के तिलकोत्सव बदे सजि गयल हौ. दशाश्वमेध के टेढ़ी नीम इलाके में काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत के अस्थाई निवास पर बसंत पंचमी के दिना यानी आज मंगलवार शाम चार बजे बाबा क तिलक चढ़इले हउवन. महंत क स्थाई निवास बाबा धाम के निर्माण में ध्वस्त होइ गयल. तबय से एक गेस्ट हाउस में महंत क अस्थाई निवास हौ. पिछले साल भी बसंत पंचमी के बाबा क तिलक एही गेस्ट हाउस में चढ़ल रहल. पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी तिलक क रस्म निभइहय. काशी क लोग तिलकहरू अउर घराती दूनो क भूमिका निभइहय. पांच वैदिक ब्राह्मण बाबा के पंचबदन चांदी के प्रतिमा के पंचामृत में स्नान करइहय अउर विशेष पूजा-पाठ करिहय. बाबा के नया कपड़ा अउर गहना से सजाइ जाई. बाबा चांदी के पालकी में सवार होइहय. बाबा के पंचमेवा, फल, मिठाई क भोग लगाइ जाई अउर ओनकर आरती कइ जाई. ओकरे बाद संझा के भजन-कीर्तन अउर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होई.

पुराण के अनुसार, बसंत पंचमी के ही दिना राजा दक्ष बाबा भोलेनाथ क तिलक चढ़उले रहलन. ओकरे बाद महाशिवरात्रि के दिन बाबा बरात लेइके दक्ष के इहां गयल रहलन अउर ओनके बिटिया पार्बती से ओनकर बियाह भयल रहल. महाशिवरात्रि 11 मार्च के हौ. रंगभरी एकादसी के दिना बाबा पार्बती क बिदाई कराइ के अपने घरे लियायल रहलन. एही उपलक्ष्य में इ कुल परंपरा आज भी हर साल निभावल जाला. काशी में एह परंपरा क इ 357वां साल हौ. बाबा क तिलक चढ़ले के साथ ही काशी होली के पूरे मूड में आइ जाला. भांग-ठंढई के साथ काशी क लोग बाबा के भक्ति में झूमय लगयलन. बसंत पंचमी से लेइके महाशिवरात्रि तक काशी में हर दिन विशेष पूजा अउर कार्यक्रम होला. महाशिवरात्रि क शिव बरात त अद्भुत होला. पूरी काशी शिव बरात में उमड़ि पड़यला. कहल जाला कि 33 करोड़ देवता भी बाबा के तिलक से लेइके बियाह तक काशी में आपन विशेष उपस्थिति दर्ज करावयलन.

बसंत पंचमी के दिन काशी में एक अउर परंपरा पिछले 1300 साल से चलल आवत हौ. काशी में सरस्वती फाटक पर सरस्वती माई क प्राचीन मंदिर रहल, जहां वसंत पंचमी के दिन काशी क लोग दर्शन करत रहलन. बाबा विश्वनाथ धाम क निर्माण करय बदे मंदिर तोड़ि देहल गयल. मंदिर से माई क विग्रह हटाइ के सुरक्षित रखि देहल गयल. सरस्वती माई क इ विग्रह 1300 साल पुराना हौ. इ विग्रह आदि शंकराचार्य स्थापित कइले रहलन. प्रशासन के तरफ से कहल गयल रहल कि ओही स्थान पर दोबारा सरस्वती मंदिर बनाइके विग्रह स्थापित कइ देहल जाई, लेकिन अबही तक मंदिर क कवनों खाका तइयार नाहीं होइ पउले हौ. काशी क लोग एके लेइके काफी दुखी हयन. फिलहाल बाबा के धाम क काम तेजी से चलत हौ.



बसंत पंचमी यानी माघ शुक्ल पक्ष क पंचमी. पौराणिक मान्यता हौ कि एही दिन सरस्वती माई क जनम भयल रहल. भगवान ब्रह्मा एही दिन सरस्वती माई क रचना कइले रहलन. पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु के आज्ञा से ब्रह्मा मनुष्य योनि क रचना कइलन. लेकिन शुरुआत में मनुष्य गूंगा रहल, जवने के नाते धरती पर पूरी तरह से सन्नाटा रहल. ब्रह्मा अपने एह रचना से तनिखौ संतुष्ट नाहीं रहलन. फिर उ अपने कमंडल से जल लेइके आदि शक्ति दुर्गा माई क अराधना कइलन. दुर्गा माई प्रकट भइलिन अउर उ ब्रह्मा क समस्या सुनले के बाद अपने तेज से एक दिव्य नारी क रचना कइलिन. चार भुजा वाली दिव्य नारी के एक हाथ में वीणा, अउर दूसरे हाथे में वर मुद्रा रहल. बाकी दूनों हाथे में किताब अउर माला रहल. दुर्गा माई ब्रह्मा से कहलिन कि इ दिव्य नारी सरस्वती अब तोहार पत्नी के रूप में रही, ठीक ओही तरह से जइसे लक्ष्मी विष्णु क अउर पार्बती शिव क शक्ति हइन. एकरे बाद माई दुर्गा अंतरधान होइ गइलिन.
माई सरस्वती जइसय वीणा क तार छेड़लिन तीनों लोक में स्वर गूंजि उठल. हर जीव के शब्द अउर वाणी मिलि गयल. हवा चलय लगल. तब देवता लोग रस अउर शब्द क संचार करय वाली इ देवी क नाम सरस्वती रखि देहलन. इ घटना बसंत पंचमी के दिन ही भयल रहल, अउर एही के नाते बसंत पंचमी केे दिन सरस्वती माई प्रकटोत्सव मनावय क परंपरा शुरू भयल. बसंत पंचमी के दिन वातावरण में मौजूद उल्लास देखि के पुराण क इ कथा सही प्रतीत होला. माई सरस्वती के वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी अउर वाग्देवी के नाम से भी जानल जाला. विद्या अउर बुद्धि देेवय वाली माई सरस्वती संगीत क भी देवी हइन. ऋग्वेद में सरस्वती माई क वर्णन कुछ एह तरह से कयल गयल हौ. -

प्रणो देवी सरस्वती
वाजेभिर्वजिनीवति धीनामणित्रयवतु.

कहय क मतलब कि सरस्वती माई परम चेतना हइन. सरस्वती के रूप में इ हमरे बुद्धि, प्रज्ञा अउर मनोवृत्ति क संरक्षण करयलिन. मनुष्य के भीतर जवन गतिविधि अउर प्रतिभा हौ ओकर आधार माई सरस्वती ही हईन. पुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण सरस्वती से खुश होइके ओन्हय वरदान देहले रहलन कि बसंत पंचमी के दिना तोहार पूजा-आराधना कयल जाई. भगवान श्रृकृष्ण के वरदान के कारण ही माई सरस्वती क बसंत पंचमी के पूजा होवय लगल, जवन आजतक जारी हौै. इहय कारण हौ मथुरा अउर वृंदावन में बसंत पंचमी के दिन सरस्वती माई क खास तरह से पूजा होला अउर होली यानी बसंत क उत्सव शुरू होइ जाला अउर होली तक चलयला.
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