Bhojpuri: बिरहा गायक बलेस्सर, जे मायावती से लेके आडवाणी तक पर गइलें गाना

बलेस्सर बिरहा में अईसन नाम रहलन जेकर गायन सूने खातिन शौखीन लोग बीस कोस पैदल चल जाय. ओकर कारन इ रहे की उ कवनो बात के बहुत चुटीला तरीके से कहें. उनके गवले क शुरुआते रहे----अई रई रई रई रई.....राजनीति से लेके सामाजिक बदलाव तक की विषय पर गवले हवें. मायावती के लेके कुछ अईसन गा दिहले रहलन की बहुत बवाल हो गईल रहे.

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हमहन जब होश सभालल गयल त सनीमा क बोल बाला आज मतीन ना रहे. दू-चार गो नवछेड़ीया लईका लईकीन के छोड़ के केहू फिलिम क नाव ना लेवे. केहू ढेर लेवे लागे त लोग ओकरा के लुक्खा समझें. अब रउआ सोची की अपनी घरे-दुआरे ´लुक्खा’ जईसन पदवी के पावल चाही. लिहाजा इ होखे कि केहू अईसन कामे ना करे जेकरा खातिन ओके केहू लुक्खा कहे.

येह पदवी से ओकरा के छूट रहे जे बहरा कमाए जाय. ओकर पहिरल-ओढल तनी अलगा रहे. जईसे की दिन भर बबरी झार के घूमे. नीमन खाना खाय. कपड़ा झार के किलीच लगा के पहिरे. चट्टी पर जब मर्जी पान खाए चल जाय. जब जाय त ओकरा संग्हे दू-चार गो हमजोली साथ जाय. जईसे लईकी के अपनी भाई-बाप क गुमान रहेला वोयिसे दोस्तन के अपनी कमाए वाला दोस्त पर रहे. त मूल बात इ की सिनेमा क गाना लोग गावे लेकिन चोरी से. नवछेड़ीया लईका गावें त परेम क इजहार करे खातिन. कई बार लईकी वोयिसने गीत में जवाब दे देवे त चुपा जाय. ढेर लोगन क परेम त देखेके मिलबे ना करें. दू-चार लंगोटिया जाने त जाने, न त अपने आप ख़तम हो जाय.

समाज विज्ञानी मानेलन जा कि मनई क इहे खासियत हिय कि हर समय में आपन बात कहे खातिन कुछ न कुछ रचनात्मक खोज लेला. जब आज मतीन सनीमा ना रहे तबो लोग परेम करें आउर बात कहें. समाज में जवन अच्छा-बुरा देखें, उहे कह देवें. कवनो कहानी बना देवें. कवनो गीत-कविता लिख देवें. भोजपुरी पट्टी में भिखारी ठाकुर के पढ़ब त इ बात ठीक से समझ आई. उ अपना आसपास-गाँव जवार में जवन देखलन उहे लिख दिहलन. ओह समय उनकी रचनात्मकता क इ सबसे बढ़िया बात रहल.

बात कहे खातिन गीत-गवनई बहुत पाहिले से बहुत बढ़िया तरीका मानल जात रहल हिय. ओह समय में गा के कहले क एगो तरीका रहे बिरहा. जब टीबी एतना जोर ना पकड़ले रहे. फोन की जगह लोगन के घरे में तार वाला रिसीवर रहे. लोग समय देके फोन करे. आज मतिन ना कि कब्बो बाज गईल. त वोह समय में मनोरंजन क जवन कला समाज में रहलीन सो ओकरा में बिरहा सबसे बढ़िया मानल जाय. अस्सी नब्बे में दुगो नाव बहुत प्रचलित रहे---बलेस्सर आउर रामदेव क. उनहन लोगन की बाद वोयिसन बिरहा क जोड़ी ना बनल. इ दूनो जाने में सामाजिक बदलाव क चुटकी लेत बात करे में ढेर नाम रहे बलेस्सर क.
बलेस्सर बिरहा में अईसन नाम रहलन जेकर गायन सूने खातिन शौखीन लोग बीस कोस पैदल चल जाय. ओकर कारन इ रहे की उ कवनो बात के बहुत चुटीला तरीके से कहें. उनके गवले क शुरुआते रहे----अई रई रई रई रई.....राजनीति से लेके सामाजिक बदलाव तक की विषय पर गवले हवें. मायावती के लेके कुछ अईसन गा दिहले रहलन की बहुत बवाल हो गईल रहे. बाबरी मस्जिद पर गवलन की- ‘फिरका परस्ती वाली बस्ती बसाई न जायेगी, मंदिर बनी लेकिन मस्जिद गिराई न जायेगी, आडवाणी वाली भाषा पढ़ाई न जायेगी’.

उ पहिले गांव की बियाह आउर बरत-उपवास क गीत गावें. फिर गाँव की घटना पर गावे लगलन. उनकर इ बात गांव के लोगन के जबुन लागे लागल. त उ उहाँ से निकल के थोड़ी दूर बस गईले. लेकिन गावल ना छोड़लन. जब उनकर गावल पहिचान पावे लागल त कुछ अपनी दोस्तन की कहले पर पहिले उ सोशलिस्ट पार्टी खातीन गवलन, फिर कवनो लाल सलाम वाला की चक्कर में पड़ के ओकरा संग्हे हो गईलन. फिर त उनकर कवनो दल ना बचल. कहीं भीड़ जुटावे क जरुरत रहे त नेता उनके बोलवा लेवें. इ कुल की बिच्चा में सबसे बड़हर काम उ इ कईलन की आपन लेखन चालू रखलन. अपना अनुभव से गउलन कि- ‘मोर पिया एम.पी.एमेले से बड़का, दिल्ली लखनउवा में ओही क डंका, अरे बोट बदल देला बोटर क बक्शा.’ एतना गवले की बाद उ अचानक से चुहल करे लगें- ‘समधिनिया क पेट जईसे इंडिया क गेट.../ समधिनिया क बेलना झूठ बोलेला....’

उ व्यंग में गवलन कि- ‘दुशमन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार ना मिलें, हिटलरशाही मिले मगर मिलीजुली सरकार ना मिले. मरदा एक ही मिले हिजड़ा कई हजार ना मिले.’ लोगबाग़ उनकर गाना सुन के ढेर गंभीर हो जाय, एकरा पहिले उ शुररु कय देवें- ‘अखिया बता रही हैं, लूटी कहीं गयी हैं.....’ उनकर इ गाना आर्केस्ट्रा की संग्हे खूब मशहूर भयल रहे.



बलेस्सर कवि आउर गायक दूनो रहलन. विद्वान लोग माने ला की भिखारी ठाकुर की बाद बलेस्सर अईसन लोक गायक रहलन जे भोजपुरी के चरचा में ला दिहलन. नहीं त बीच में भोजपुरी उभचुभ करे लागल रहे. लेकिन बलेशर गवले की संग्हे ओकरा बजार के साध दिहलन. उनकर केहू गुरु ना रहे. उ अपना गायिकी की बारे में कहें कि- ‘हमहू मजुरे हईं. केहू काम क के मजूरी लेत बा, हम गाना गा के लेत बानी. जेतना उनकरी पास रहे आउर जेतना उनकर मान जान रहे, ओकरी अनुसार उ कब्बो केहू पर रोब ना देखवलन.

उनकर एगो अईसन गाना रहे जवान सबसे ज्यादा गावल गईल होई.--‘जबसे लईकी लोग साईकिल चलावे लगलीं, तबसे आगे क डंडा ख़तम हो गईल.’ ओह सदी में भोजपुरी गाना सुने वाला लोगन के इ गाना खूब सुने के मिले. चट्टी-चौराहा से लेके सवारी गाड़ी तक में खूब बजे. तब हालत इ रहे की दस-बीस किलोमीटर में चले वाली जीप-मिनी बस में बलेस्सर क बिरहा बजे. चलावे वाला से लेके सवारी तक आनंद लेवें. तब बिरहा मनोरंजन की संग्हे रसूख क पहिचान रहे. जनता शादी/विवह/तिलक/ छठिहार मूर आदि में खूब गवावे.

बलेस्सर कवि आउर गायक की संग्हे भोजपुरी के बजार दिहलन. रेलवे स्टेशन, बसअड्डा से लेके छोट-मूट हाट-बजार तक में बलेस्सर क कैसेट बिकात दिख जाय. एक जमाना में जईसे कुशवाहाकांत और वेदप्रकाश शर्मा क उपन्यास लोकप्रिय रहे वोयिसे बलेस्सर क बिरहा रहे. बिरहा तनी ढेर लोकप्रिय रहे, एसे की एकरा सुने खातिन अक्षर गियान क जरुरत ना रहे. आज नई तकनीक के ईले से कैसेट बंद हो गईल. लेकिन बिरहा बंद ना ह. आजकाल्ह बलेस्सर यूट्यूब जईसन लोकप्रिय मंच पर आप के मी जयिहन. इतना जरुर है कि बिरहा क स्वाद लेवे वाला मनई अब कम बचल हवन. बिरहा बोलले पर लोग अईसे देखेला जईसे कवनो आदिम बात बा. हालांकि तनी फेर बदल की संग्हे आजो गवनई चलत हिय. एसे उम्मीद ह कि फिर से बिरहा क दिन बहुर सकेला. इ काम मतलबी यारन से ना होई. कवनो बलेस्सर क सकेलन. (लेखक रामाशंकर कुशवाहा वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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