Home /News /bhojpuri-news /

banaras budhwa mangal interesting story mohan singh bhojpuri

Bhojpuri में पढ़ें-काशी के अद्भुत व्यवहार, सात वार नौ त्योहार- दिव्य आयोजन होला बुढ़वा मंगल के

.

.

खास तरह के पहिनावा, गले में गुलाबी गमछा, झक सफेद कुर्ता-पजामा, सिर पर दो पलिया टोपी मुँह में गिलौरी पान, शिवप्रसाद के रूप में तैयार ठंढई अउर औरतन खातिर गुलाबी साड़ी अउर खास तरह के खानपान के चौचक व्यवस्था विशेष तरह से सजावल नाव में नीलाम्बर के नीचे कलकल निनाद करत गंगा के धारा के बीचोबीच चलायमान नाव में ही मौजूद रहेला.

अधिक पढ़ें ...

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी अपना एगो निबन्ध ‘वसन्त के अन्य उत्सव’ में लिखले बानी- मनुष्य ही प्रधान है, प्रकृति का उत्सव उसकी अपेक्षा में होता है. किन्तु अगर मनुष्य ही जड़ीभूत बना रहा तो उत्सव कहाँ हुआ? पर द्विवेदी जी के ई शिकायत कभी काशी के लोगन से ना रहल. वजह काशीवासी प्रकृति के हर मौसम के अकवारी में भरी के स्वागत करके खातिर अवसर के ताक में रहेला. एह से रंगभरी एकादशी से लेकर महाश्मशान के होली खेलले के बाद होली के विदाई अउर नवसंवत्सर के आगमन के तैयारी के भी ओतने जोश खरोश के साथ स्वागत करेके तैयारी में जुट जाला. कहल भी गईल बा- काशी के अद्भुत व्यवहार/ सात वार नौ त्योहार. पौराणिक मान्यता ई बा कि नववर्ष के आगमन के पूर्व अउर नववर्ष के सफलता खातिर अपना बड़-बुजुर्गन के आशीर्वाद के कामना से होली के पहिला मंगलवार के ‘बुढ़वा मंगल’ के आयोजन के परंपरा चलल आवत बा. मोतीचंद्र जी के ‘काशी के इतिहास’ पुस्तक में भी बतावल बा कि सन् 1735 काशी नरेश के सिपहसालार मीर रुस्तम अली ‘बुढ़वा मंगल’ के आयोजन करवले रहलन. बनारस गजेटियर के मुताबिक नवाब असिफजुदौला के पुत्र वजीर अली ‘बुढ़वा मंगल’ के शुरुआत कइलन. इतिहासकार अउर बनारस के कलेक्टर जॉन प्रिंसेप भी बुढ़वा मंगल के आयोजन के चर्चा कइलें बाड़न.वायसराय डफरिन की पत्नी भी ‘बुढ़वा मंगल’ के भव्य आयोजन के चर्चा कइलें बाड़ी. बुढ़वा मंगल के ऐतिहासिक महत्व के ध्यान में राखिके ही तीसरी बार ई प्रयास होत बा कि एह आयोजन के ‘यूनेस्को’ के हेरिटेज सूची में शामिल करा दिहल जाय.

एह आयोजन के खासियत बा-खास तरह के पहिनावा, गले में गुलाबी गमछा, झक सफेद कुर्ता-पजामा, सिर पर दो पलिया टोपी मुँह में गिलौरी पान, शिवप्रसाद के रूप में तैयार ठंढई अउर औरतन खातिर गुलाबी साड़ी अउर खास तरह के खानपान के चौचक व्यवस्था विशेष तरह से सजावल नाव में नीलाम्बर के नीचे कलकल निनाद करत गंगा के धारा के बीचोबीच चलायमान नाव में ही मौजूद रहेला. बीच-बीच में इत्र के फुहार.एह आयोजन में शहर के हर वर्ग के रसिकजन, बुद्धिजीवी, साहित्यकार, संगीत के गवैया-गवनहर के खास उपस्थित रहेला. ई आयोजन चूंकि होली के त्योहार के बाद होला,एह से होली के बारह बजे रात से रामनवमी तक चैता-चैती -घाटो के गायन भी शुरू हो जाला. पूर्वी अंग के एगो चैती की बानगी -फ़िल्म अभिनेता गोविंदा की माँ निर्मला देवी के सुरीली कंठ से जरूर सुनना चाहिए.

एही ठइयां मोतिया हेराइल हो रामा
कहवाँ मैं ढुढ़ूँ
कोठवां पे ढ़ूढ़ली,अटरिया में ढ़ुढ़ली
ढू़ढ़ि अइली सइयां सेजरिया हो रामा
कहवाँ मैं ढ़ुढ़ूँ ….

बुढ़वा मंगल का अवसर एक तरह से संगीत कलावन्तों के लिए स्वरांजलि अर्पित कर संगीत रसिकजन के सामने अपने संगीत साधना के प्रदर्शन के भी अवसर होला. बुढ़वा मंगल के महफ़िल कभी काशी के सिद्धस्थ गायिकाओं- बड़ी मोती, सिधेश्वरी देवी, गिरजादेवी, बड़ी मोती, हुस्नाबाई से गुलजार होत रहल. ओहि महफिल में कभी सुनाई देत रहल….
फुलगेंदवा ना मार मोरी राजा….
तो कभी कोयल की कूक की आधी रात में पिया के नींद से जगवला के बेधक बरनन भी मिलीं जाई.
सुतल सइयां के जगावें हो रामा
कोयलि तोरी बोलियां… सुतल सइयां
रोज त बोले कोइलि सझवां बिहानवाँ
आजु काहे बोले आधी रतिया हो रामा
कोयलि तोरी बोलिया…

बसंत ऋतु के ऋतुराज के नाम से भी नवाजल जाला. एह ऋतु में प्रकृति अपना सम्पूर्ण सौंदर्य के आभा जड़-जंगम के कण-कण बिखेर देलिन. आम के पेड़ पर मोजर के श्रृंगार. भंवरन के गुनगुनाते स्वर, खेतन में पकल अन्न के भार से झुकल फसल, एह बीच कभी तेज कभी मद्धिम बयार के सरसराहट से निकल धुन जइसे अपना किसान के प्रकृति के अनमोल भेंट देबे खातिर आकुल-व्याकुल बिया. ई महीना जहां एक ओर जड़ प्रकृति अउर चेतन प्राणियन में रस के संचार करेला, वइसे ही बिरहन के मन में वियोग-दुख-हुक के संचार भी करेला. एगो अइसने बिरह के बरनन भोलानाथ गहमरी जी के एगो चैता में देखल जाय…
बीत गइले असो के फगुनवां हो रामा तोरे बिना बालम
चढ़त चइत जइसे लागे मन अगिया
बेरि-बेरि केतना बुझावै दूनो अखियाँ
बैरी पापी भइलै पवनवाँ हो रामा… तोरे बिन
मंह मंह महकेला खेत खरिहनवाँ
हरियर लागै पिया काल्हि के सपनवाँ
अँचरा भरल मोरे सोनवाँ हो रामा
तोरे बिनु बालम

भारतीय शास्त्रीय संगीत के ई विशेषता कि हर ऋतु आ समय के हिसाब से राग-रागिनियन के रचना भईल बा. काशी के चूंकि देश के सांस्कृतिक राजधानी मानल बा-एह से कइगो रागन के रचना भी यहां भइल बा. गीत-वादन अउर नृत्य के जरिये ओकर प्रदर्शन ‘बुढ़वा मंगल’ के आयोजन के अलावा अब कइगो मंच आ मौका-कुछ अपवादन खासकर कोरोना काल के छोड़िके के अब कलाकारन के मौजूद बा. एह में संकट मोचन संगीत समारोह, गंगा महोत्सव, अउर सुबहे बनारस जइसन मंच अब हर विधा के अउर हर उम्र के कलाकारन खातिर मंच मुहैया करावत बा.

बुढ़वा मंगल के आयोजन के खास स्वरूप देबे में काशी नरेश ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह के विशेष योगदान रहल बा. एक बार जलियांवाला बाग हत्याकांड के वजह से अउर एक बार सन् 1927 में कुछ यदुवंशी लोगन के आपन नाव बांधे हठ के वजह से विवाद के छोड़ि के – ‘बुढ़वा मंगल’के आयोजन, जवना से कुछ समय खातिर रोक दिहल गइल रहें. बाकि सैकड़ों साल से ‘ बुढ़वा मंगल’ के आयोजन काशी के सांस्कृतिक विरासत के समेटले बा. एह आयोजन के शुरुआत अब काशी के अस्सी घाट से होत बा. पहिले काशी नरेश के रामनगर किला से राजघाट तक रात भर रंग-बिरंगे नौकाओं पर सवार रसिकजन गंगा के बीच लहरों में गीत -संगीत-नृत्य के आनंद लेत रहल. नाव पर ही खानेपीने के खातिर पूरी -कचौड़ी, ठंडई-गिलौरी पान के इंतजाम रहत रहेला. एह वजह से खानपान- पहिनावा, गीत-संगीत-नृत्य के आनन्द खातिर काशी के लोगन के होली के बाद शिद्दत से ‘बुढ़वा मंगल’ के हर साल इंतजार रहेला.

(मोहन सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri, Bhojpuri News

विज्ञापन

राशिभविष्य

मेष

वृषभ

मिथुन

कर्क

सिंह

कन्या

तुला

वृश्चिक

धनु

मकर

कुंभ

मीन

प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
और भी पढ़ें
विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें

अगली ख़बर