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Bhojpuri Spl: बनारसी कचउड़ी-जलेबी क जुगलबंदी, जब भी जाईं त जरूर खाईं

बनारस में मिठाई-नाश्ता क कवनों अइसन दुकान न होई, जहां सबेरे कचउड़ी-जलेबी क जुगलबंदी न होत होय. अउर एही जुगलबंदी से बनारस के लोगन के दिन क शुरुआत होला. जुगलबंदी के बीचे तीसरका समान सब्जी भी होला.

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कवनो भी स्थान अनोखा तब बनयला, जब उहां क हर चीज चोखा होय. बनारस अइसय एक अनोखा शहर हौ. एकरे पहिले के आलेख में हम बनारस के सुबह क नजारा रहल. एह आलेख में बनारसी कलेवा क स्वाद ल. बनारसी कलेवा या नाश्ता क नाव लेतय आंखी के सामने कड़ाहा में तैरत लाल-लाल करारा कचउड़ी अउर रसभरी जलेबी नाचि उठयला. बनारस में मिठाई-नाश्ता क कवनों अइसन दुकान न होई, जहां सबेरे कचउड़ी-जलेबी क जुगलबंदी न होत होय. अउर एही जुगलबंदी से बनारस के लोगन के दिन क शुरुआत होला. जुगलबंदी के बीचे तीसरका समान सब्जी भी होला. लेकिन सब्जी क गिनती एह के नाते नाहीं होत कि इ कचउड़ी के साथ फ्री मिलयला. त्रिपुरारी के नगरी में मस्त मलंग सबेरे-सबेरे जब इ तीनों तत्व के उदरस्थ कइ लेलन त पूरे दिनभर बदे चैतन्य होइ जालन.

बनारसी कचउड़ी क मतलब दिल्ली वाली कचउड़ी नाहीं. जेतना दूरी दिल्ली अउर बनारस में हौ, ओहसे कम दूरी दिल्ली वाली कचउड़ी अउर बनारसी कचउड़ी में नाहीं हौ. बनारसी कचउड़ी देखय में पूड़ी लगी, लेकिन उ आपन असली परिचय मुंहे में गइले के बाद देई. जे एक बार बनारसी कचउड़ी क परिचय पाइ जाला, उ जिनगी भर भूलात नाहीं. बनारसी कचउड़ी क रुतबा क अंदाजा एतनय से लगाइल कि नायाब व्यंजन क आकांक्षी, दर्शनाभिलाषी लोग मुंहे से लार टपकावत सबेरे-सबेरे दुकानी के सामने लाइन में लगि जालन. बनारस में सुबह क नाश्ता यानी कचउड़ी-जलेबी. बहुत कम लोग होइहय, जेकरे घरे सबेरे नाश्ता रसोई में बनत होई.

आखिर इ कचउड़ी हौ का, एकर केमिस्ट्री अउर विकासक्रम का हौ? बनारसी कचउड़ी देखि के तमाम लोग भ्रम में पड़ि जालन. देखय में पूड़ी, अउर नाम कचउड़ी. इ कवन बीज गणित हौ भाई? दरअसल, कचउड़ी शब्द कचपूरिका से पैदा भयल हौ. प्राचीन काल में एकर नाम कचपूरिका रहल, फिर इ बिगड़ि के कचपूरिआ होेइ गयल अउर ओकरे बाद कचउरिआ अउर आज कचैरी, जवने के कचैड़ी या कचउड़ी कहल जाला. संस्कृत में कच क अर्थ बंधन होला. प्राचीन काल में कचउड़ी क अकार गणेश भगवान के चढ़ावय वाला मोदक जइसन रहय. आटा के लोई में ढेर क मसाला भरि के ऊपर से लोई उमेठि देहल जाय. एही के नाते इ कचपूरिका रहल. इ कचपूरिका बनारस में कब बनय शुरू भयल अउर कब इ कचपूरिका से कचउड़ी होइ गयल, एकर कवनों सही जानकारी उपलब्ध नाही हौ. लेकिन बनारस के लोगन क कहना हौ कि इ व्यंजन भगवान शिव अउर पार्बती क लइका भगवान गणेश बदे तइयार कयल गयल रहल. आज इ कचउड़ी के रूप में बनारसी नाश्ता क शान हौ. मोदक भगवान गणेश के आज भी चढ़ाइ जाला.
जब पूरी दुनिया बेड-टी क इंतजार करयला, बनारसी लोग सबेरे छह-सात बजे तक गरम-गरम कचउड़ी अउर रसभरी जलेबी क कलेवा भिड़ाइ के टंच होइ जालन. भोर में चार बजे ही बनारस क हर गली-महल्ला गरम मसाला के भुनले से निकलय वाली सोंधी सुगंध से गमकि उठयला. सरसों के तेल क बघार अउर पंचफोरन, अदरक क छौंक, आलू-कोहड़ा क तरकारी क झाक, खमीर क खटास अउर गुलाबजल मिलावल शीरा में डूबल-उतिरायल करारी जलेबी क सुगंध भोर होतय बनारस के हवा में स्वाद क जादू जगाइ देला. इ जादू अइसन होला कि सूतल मनई क भी नथुना फड़कि उठयला अउर उ बिस्तर छोड़ि के दतुइन कइके कचउड़ी-जलेबी के लाइन में लगि जाला.

जलेबी असल में अरबी भाषा क शब्द हौ, अउर एह मिठाई क असली नाम जलाबिया हौ. लेकिन तमाम लोग जलेबी के भारतीय मिठाई मानयलन. जलेबी के भारतीय मूल क मिठाई मानय वाले एके ’जल-वल्लिका’ कहयलन. इहय जल-वल्लिका फारसी अउर अरबी में बदलि के जलाबिया होइ गयल हौ. आज इ जलेबी के नाम से सरनाम हौ. जलेबी देश भर में बनयला, लेकिन बनारस के जलेबी क कवनो सानी नाहीं हौ. एकर अनुभव खइले के बादय होला. बनारस में पुराने जमाने से ही सबेरे क नाश्ता घरे करय क परंपरा नाहीं रहल हौ. इहय कारण हौ कि हर गली, महल्ला, नुक्कड़, चैराहा पर सबेरे-सबेरे मिठाई-नाश्ता के दुकानी पर, ठेला पर कचउड़ी-जलेबी छनत मिलि जाई, अउर साथ में खाए वालन क लाइन भी. इ सिलसिला 11 बजे तक चलयला. ओकरे बाद लौंगलता-समोसा क समय शुरू होइ जाला.

बनारस में कचउड़ी क केतना रुतबा रहल हौ, एकर अंदाजा एही बाते से लगावल जाइ सकयला कि मेन शहर में पूरी एक गली ही कचउड़ी के नाम पर समर्पित हौ. नाम हौ कचउड़ी गली. कचउड़ी गली कवनो जमाने में बनारसी नाश्ता क केंद्र रहल. हलांकि आज भी पूरी गली में कचउड़ी, मिठाई, नाश्ता क दुकान जीवंत हइन. खास बात इ कि गली क दुकान 24 घंटा खुलल रहयलिन. मनिकनिका घाट पर मुर्दा फूंकय आवय वाले मुर्दहरू दाह संस्कार के बाद कचउड़ी गली आवयलन, अउर इहां चांपि के कचउड़ी, मिठाई भिड़ावयलन. इ दृश्य देखि के अइसन लगयला जइसे बनारसी कचउड़ी मोक्ष क प्रसाद हौ.

आम कचउड़ी से उलट बनारसी कचउड़ी मैदा के बदले साधारण आटा से बनयला. उरदी के दाली के पिट्ठी में हींग, मसाला मिलाइके आटा के लोई में भरल जाला. लोई के पूड़ी की नाही बेलिके फिर करारा तलल जाला. पहिले इ कचउड़ी देशी घी में तलाय, लेकिन अब जमाना रिफाइन क आइ गयल हौ.

बनारस में कचउड़ी के साथ सब्जी फ्री में मिलयला. दुबारा, तिबारा मंगले पर भी दुकानदार इंकार न करी, पइसा न मांगी. सब्जी आमतौर पर आलू-कोहड़ा क रहयला, लेकिन मौसम के अनुसार सब्जी क भी रंग बदलि जाला. ठंढी के मौसम में आलू-गोभी अउर पालक-भंटा कचउड़ी क साथ देलन, कभी आलू-चना, या दूसर भी कवनो सब्जी होइ सकयला. लेकिन कचउड़ी के तासीर में कवनो बदलाव न होई. हर मौसम में एक जइसन. बनारस में सबेरे क इ नाश्ता आज भी पत्तल अउर पत्तल के दोना में ही परोसल जाला, स्वाद अउर बढ़ि जाला. पहिले सब्जी-कचउड़ी, फिर जलेबी. कचउड़ी अउर जलेबी क जुगलबंदी ठीक ओइसय हौ, जइसे बर्गर, चिप्स के बाद कोक, पेप्सी. जलेबी-कचउड़ी अब हर जगह बनत हौ, लेकिन बनारस में सुबह-सुबह एकर जेतना स्वागत होला, दूसरे जगह नाहीं. हलांकि आबोहवा बदलले से स्वास्थ्य क समस्या भी बढ़ल जात हौ, अउर बनारस में भी लोगन के घरे में सबेरे के नाश्ता में दलिया, आमलेट घुसपैठ बनउले जात हौ. लेकिन कचउड़ी-जलेबी के बादशाहत के आज भी कवनो खतरा नाहीं हौ, काहे से कि इ बनारसी जीवनशैली क हिस्सा बनि चुकल हौ. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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