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Bhojpuri Spl: बनारसी पान के गजबे बा लीला.. अइसही ना कहल जाला, 'खाइके पान बनारस वाला'

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बनारस में कवनों अइसन गली, कोना न होई जहां पान क दुकान न होय. इहां पान स्वागत के परंपरा में शामिल हौ. पान क बीड़ा बनारसी लोगन क लाली-लिपस्टिक भी हौ.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 28, 2021, 4:15 PM IST
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बनारस में न त पान खायल जाला अउर न चबायल जाला, बल्कि घुलावल जाला. खांटी बनारसी मुंहे में घंटन पान घुलउले आपन सारा काम निपटाइ लेलन. लेकिन जब गीतकार लालजी पांडेय उर्फ अनजान फिल्म डॉन में गाना लिखलन त उ मीटर बइठावय बदे ’खाइके पान’ लिखि देहलन. अनजान बनारस क ही रहलन अउर पान बदे ’खाइके’ शब्द क इस्तेमाल कइले पर बनारसी लोग ओनसे आपत्ति भी जतउले रहलन. बनारसी लोग एह प्रयोग के बनारसी पान क एक तरह से तौहीनी के रूप में लेहले रहलन.

पान बनारस क मान अउर शान हौ. बनारस में पान क खेती नाही होत, लेकिन दुनिया में पान के कारोबार क सबसे बड़ा केंद्र बनारस हौ. बनारस में हर किस्म क पान जगन्नाथ जी, गया, कलकत्ता अउर अन्य स्थानन से आवयलन. बनारस में कवनों अइसन गली, कोना न होई जहां पान क दुकान न होय. इहां पान स्वागत के परंपरा में शामिल हौ. पान क बीड़ा बनारसी लोगन क लाली-लिपस्टिक भी हौ. पान खाए क तमीज अउर खियावय क तहजीब से इहां केहूं के भीतर बनारसीपन क अंदाजा लगावल जाइ सकयला.

दुनिया में हर जगह पान के लोग नाश्ता की नाही चबाइ जालन. लेकिन बनारसी बड़े अदा अउर तहजीब के साथ पान के घुलावयलन. पान घुलाइब अपने आप में एक यौगिक क्रिया हौ, अउर खांटी बनारसी इ क्रिया में माहिर हयन. पान क बीड़ा मुहे में लेइके पहिली पीक थूंकि देलन, ताकि सुर्ती, सुपारी क निकोटीन, गंदगी निकलि जाय. ओकरे बाद मुहे में लार भरयलन अउर ओही लार में पान घुलयला. कवनों भी बनारसी क मुह अगर फूलल देखाइ जाय त समझि ल कि उ पान घुलउले हौ. बनारसी जब मुहे में पान घुलाइ लेलन तब बात करब पसंद नाही करतन. बहुत जरूरी भइले पर असमान की तरफ मुंह कइके बतियाइ लेलन, ताकि चैचक जमल पान क मजा किरकिरा न होइ जाय.



खांटी बनारसी क इ भी पहिचान हौ कि ओकर रूमाल से लेइके कपड़ा तक पान के पीक से रंगल रही. बनारस के गलिन में मकानन क दीवार कमर तक पान के पीक से रंगल रहयलन. इ एह बात क गवाही हौै कि बनारसी लोग पान से केतना मोहब्बत करयलन. भोजन कइले के बाद त सब पान खालन, लेकिन कुछ बनारसी पान जमाइके निपटय भी जालन. साहित्य से जुड़ल केतना बनारसी पान जमाइके लिखय बइठयलन. कुछ अइसन भी हयन, जवन दिन-रात गाले में पान दबउले रहयलन.
पान मुख्य रूप से बिहार, बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश अउर उत्तर प्रदेश में पैैदा होला, लेकिन पान क कारोबार बनारस से होला. देश भर से पान बनारस में आवयलन अउर बनारस में पान के पकाइ के ओकर गड्डी बनाइ के तमाम शहरन में भेजल जाला. पान पकावय के क्रिया के ’कमाना’ भी कहल जाला. कमइले क ही नतीजा होला कि हरी पत्ती पान जवन बजार में बिचाला उ साल-साल भर तक ताजा बनल रहयला. पान के कमाए क क्रिया काफी श्रमसाध्य हौ अउर इहय बनारसी पान क खासियत भी हौ. एही खासियत के नाते बनारसी पान पूरी दुुनिया में परसिद्ध हौ. एही पाने के मगही कहल जाला. आज के तारीख में बनारस में 15 हजार से अधिक लोग पान कमाए के काम से जुड़ल हउअन.

बनारस क प्रसिद्ध अउर पसंदीदा पान मगही ही हौ. बनारस क लोग मगही पान के ही महत्व देलन. बनारस क लोग मगही के आगे दूसरे पाने के घास-पात समझयलन. लेकिन मगही पान न रहले पर जगन्नाथी पान से भी काम चलाइ लेलन. एकरे अलावा सांची-कपूरी या बंगला पान क खपत इहां नाम मात्र क होला. बंगला पान बंगाली अउर मुसलमान ही जादातर खालन. बनारसी लोग मगही पान के एह बदे पसंद करयलन कि इ मुंहे में जातय घुलि जाला. मगही पान हल्का पियरई लेहले सफेद रंग क होला. मगही पान बिहार के गया से आवयला.

बनारस में पान दरीबा पान कारोबार क केंद्र हयन. पान क कारोबार दुइ महल्ला में होला -ईश्वरगंगी अउर औरंगाबाद. सबेरे सात बजे से लेइके रात 11 बजे तक दूनों बाजार में चहल-पहल रहयला. सिर्फ शहर क विक्रेता ही नाही, बल्कि दूसरे शहर क विक्रेता भी इहां पान अउर पान क सामग्री खरीदय आवयलन.

बनारसी पान खाली कमइले के नाते खास नाही हौ, बल्कि पान क बीड़ा बनावय में इस्तेमाल होवय वाली सामग्री के कारण भी खास हौ. पान में इस्तेमाल होवय वाला कत्था, चूना, सुपारी अउर सुर्ती इहां खास तरह से तइयार कयल जालन. बनारसी पान बदे कत्था तइयार करय क लंबी विधि हौ. पहिले कत्था के पानी में भेइ दिहल जाला. कत्था अगर ढेर करिया रही त ओके दूधे में भेइ जाई. फिर ओके पकाइके एक चैड़ा बरतन में फइलाइ जाला. कुछ घंटा बाद जब कत्था जमि जाई तब ओके एक मोटा कपड़ा में बांधि के सिल या जाता जइसन वजनी पथरे के नीचे दबाइ जाई. एतना कइले से कत्था क कसैलापन अउर गरमी निकलि जाला. एकरे बाद ओके गरम राखी में दबाइ देहल जाला, ताकि बचल-खुचल कसैलापन भी निकलि जाय अउर सोंधापन आइ जाय. एतना कइले के बाद कत्था थक्का की नाही होइ जाला. ओकर रंग भी काफी सफेद होइ जाला. फिर थक्का में पानी मिलाइके खूब घोंटल जाला अउर इत्र, गुलाबजल मिलाइके तब पाने में लगाइ जाला. एह तरह क बनावल कत्था पान के पूरी तरह बनारसी बनाइ देला.

बनारस में चूना भी तइयार करय का आपन अलग तरीका हौ. चूना के पहिले पानी में बुझाइ जाला. तीन-चार दिन बाद ओके पानी में खूब घोंटि जाला. फिर ओके कपड़ा से छानि के कंकड़-पत्थर अलग कयल जाला. छानल चूना के कुछ समय तक बरतन में रखि देहल जाला. जब चूना नीचे बइठि जाला तब ऊपर क पानी निकालि देहल जाला. चूना क तेजाई कम करय बदे ओहमें दूध या दही मिलावल जाला. तब जाइके इ चूना पान क बीड़ा में इस्तेमाल होला. एही तरह सुपारी के भी पहिले पानी में भेवल जाला, ताकि ओकर निकोटीन निकलि जाय अउर नरम होइ जाय. सुपारी जब पानी में फूलि जाला तब ओके पथरे पर रगड़ल जाला, ताकि ओकर नुकीलापन खतम होइ जाय अउर आसानी से पाने के साथ घुलि जाय. बनारसी बीड़ा में जर्दा क इस्तेमाल कम होला. बनारसी लोग जर्दा पसंद नाही करतन. जर्दा में तेजाब क मात्रा रहयला, जवन बहुत नुकसान करयला. बनारस में पान दुकानदार कच्ची सुर्ती क इस्तेमाल करयलन. कच्ची सुर्ती भी बनावल जाला. पहिले पानी से अच्छी तरह धोवल जाला, ताकि निकोटीन अउर गर्दा साफ होइ जाय. ओकरे बाद ओहमें बराश, छोटी इलायची, पिपरमिंट क चूरा अउर गुलाबजल मिलावल जाला. इहय सुर्ती पान में इस्तेमाल कयल जाला. सुर्ती क खासियत इ होला कि अधिक मात्रा में खइले पर भी चक्कर नाहीं आवत.

बनारस में पान के बीड़ा क अलग-अलग कीमत हौ. सादा पान छह रुपिया, सुर्ती वाला आठ से 10 रुपिया अउर मीठा पान 15 रुपिया क बिचाला. बनारस क स्पेशल गिलौरी पान क कीमत 25 से 50 रुपिया तक हौ. पान क कई दुकान इहां 100 साल से भी अधिक पुरानी हइन. विश्वनाथ गली में दीपक तांबूल भंडार 150 साल पुरानी दुकान हौ. इ दुकान मोहनलाल पान वाले के नाम से परसिद्ध हौ. नदेसर महल्ला में मौजूद कृष्णा पान भंडार 100 साल पुरानी दुकान हौ. गोदौलिया पर मशहूर गामा पान भंडार लगभग 70 साल पुरानी हौ. लंका चैराहा पर केशव तांबूल भंडार लगभग 60 साल पुरानी दुकान हौ. बनारस के इ दुकानन से पान अब विदेश तक जाए लगल हयन. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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