Bhojpuri Spl: ठंडा मतलब होखेला बनारसी ठंडई, गरमी भगावय क अचूक फारमूला

बनारसी ठंडई मतलब बनारसी ठंडई ही होला अउर बनारसी ठंडई के रसानुभूति बदे बनारस ही जाए के पड़ी. केतना लोग ठंडई के भांग से जोड़ि के देखयलन, लेकिन इ सरासर गलत हौ. भांग अपने जगह हौ अउर ठंडई क जगह आपन अलग हौ. इ अलग बात हौ कि केतना लोग ठंडई में भांग मिलाइके छानयलन.

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फगुनहट धीरे-धीरे बहय लगल हौ. वातावरण में गरमी भी बढ़य लगल हौ. एही के साथ बनारस में ढंडई क सुरूर भी चढ़य लगल हौ. इहां ठंडई एक अइसन शरबत हौ, जवने क तरकीब अउर तासीर शुद्ध बनारसी हौ. बनारसी ठंडई क क्लोन दूसरे जगह नाहीं मिली. बनारसी ठंडई क बड़ी खासियत इ हौ कि इ तन-मन के तर ही नाहीं करत, ताजगी अउर तंदुरुस्ती भी प्रदान करयला. गरमी भगावय क इ अचूक बनारसी फारमूला हौ. आजकल बनारसी ठंडई क बोतलबंद संस्करण भी बजार में उपलब्ध हौ, लेकिन बनारसी ठंडई मतलब बनारसी ठंडई ही होला अउर बनारसी ठंडई के रसानुभूति बदे बनारस ही जाए के पड़ी. केतना लोग ठंडई के भांग से जोड़ि के देखयलन, लेकिन इ सरासर गलत हौ. भांग अपने जगह हौ अउर ठंडई क जगह आपन अलग हौ. इ अलग बात हौ कि केतना लोग ठंडई में भांग मिलाइके छानयलन.

ठंडई क नाम बाबा भोलेनाथ अउर होली के त्योहार से जुड़ल हौ. ठंडई क इ नातेदारी भी इ गलतफहमी बढ़ावय में मदद कइले हौ कि बिना बूटी यानी भांग के ठंडई घोटल-छानल नाहीं जाइ सकत. लेकिन कुछ सुरूर क शौकीनन के छोड़ि के बाकी लोग ठंडई के सात्विक रूप क ही सेवन करयलन. ठंडई क इ सात्विक रूप बदाम, मगज, इलायची, गुलाब क पंखुड़ी, काली मिर्च, मुनक्का अउर सौंफ के संगम से तइयार होला. मौसम के अनुसार एहमें कई सारा फल क सत्व मिलावल जाला अउर बेला, खस, रातरानी, रजनीगंधा अउर हर सिंगार जइसल फूलन के सुगंध क तड़का भी देहल जाला. साथ में मिलावल जाला अवटि के गाढ़ा कयल सढ़ियारय दूध मिश्री मिलाइके. मट्टी के पुरवा में जब इ दिव्य शरबत परोसल जाला त मट्टी क सोंधी सुगंध भी एहमें घुलि जाला. एकरे बाद तइयार होला औषधीय बनारसी ठंडई, जवन बच्चन से लेइके बुढ़वन तक बदे मुफीद होला. गरमी से पैदा होवय वाली कई बीमारी के ठीक करयला इ ठंडई.

ठंडई बनारस क पारंपरिक शीतल पेय हौ. बाबा भोलेनाथ क इ प्रसाद शरीर अउर आत्मा क ताप अउर संताप सब हरि लेला. इ खाली पियास अउर तास ही नाहीं बुझावत, बल्कि भीतर से शरीर में ताजगी भी पैदा करयला. दूसरे देसी शरबतन से अलग इ अपने अनूठे यौगिक के कारण पौष्टिक भी होला. जवने तरह से पंजाब में अमृतसर अउर पटियाला क लस्सी प्रसिद्ध हौ, ओही तरह बनारस क ठंडई सरनाम हौ. इ पूरब क एक अनोखी कृति, कलाकारी हौ. देखय में इ कलाकारी जेतना आसान हौ, व्यवहार में ओतनय कठिन हौ. ठंडई बनावय में जेतना मसाला लगयला, ओकर अनुपात अगर जरा भी गड़बड़ायल त कुल मेहनत पानी में. अउर हां, बनारसी ठंडई बिजली क बटन दबाइ के चलय वाली मिक्सी के भरोसे न बनी. ठंडई क मसाला पीसय बदे सिल-बट्टा चाही अउर घंटन पीसय-छानय बदे मजबूत गट्टा चाही. चन्नन की नाईं पीसले के बाद भी बारीक मलमल से पूरा माल छानि जाई. छानल एह बदे जाला कि जरा भी खुरदुरा पदार्थ ठंडई केे साथे मुंहे में न जाइ पावय, नाहीं त मजा किरकिरा होइ जाई.



1960 के दशक में हिप्पी लोग जब बनारसी ठंडई क चुस्की लेेहलन त ओनके मुंहे से निकसल -ओह! अॅलमंड-ग्रास ड्रिंक. एकरे बाद से अंगरेजन के साथ ही हिंदुस्तानिन के नजर में भी इ ठंडई नशीला पदार्थ बनि गइल. बचल-खुचल कसर चलताऊ फिल्मी गाना से पूरा होइ गयल. ’आप की कसम’(1974) फिलिम क एक गाना रहल- ’जय जय शिव शंकर, कांटा लगे न कंकड़, कि प्याला तेरे नाम का पिया.’ इ गाना सुनतय आंखी के सामनेे पितरी क भरल लोटा एक घूंट में गटकि के भांग के रंग में बहकि जाए वाले बनारसी क रूप आइ जाला. लेकिन वास्तव में इ गाना बनारसी ठंडई क एक तरह से तौहीनी हौ. भांग अउर ठंडई के अलग कइ के न देखले से सात्विक दिमाग वालन बदे बड़ा खतरा इ हौ कि उ बनारस के इ जीवन अमृत से पूरे जीवन भर वंचित रहि सकयलन.
बनारस में ठंडई पूरे साल छनयला, लेकिन एकर असली मौसम फागुन से शुरू होला, अउर पूरी गरमी भर बनारस में ठंडई क बहार रहयला. होली के दिना त बनारस में शायदय कवनो घर होई जहां ठंडई न छनत होई. ठंडई के कुल मसाला क तासीर ठंडा होला, जवने के नाते होली के दिना हर बनारसी ठंडई से ठंडा होला. भांग अउर अबीर-गुलाल क गरमी ठंडई के तासीर से उतरि जाला. बनारस में ठंडई क अच्छा-खासा धंधा हौ. जवने रूप में चाहा, तवने रूप में ठंडई मिलि जाई. अगर मसाला क अनुपात पता हौ त पनसारी के दुकानी पर अलग-अलग तउलाइ ल. अनुपात नाहीं पता हौ त खाली ठंडई मांगि ल, दुकानदार मसाला क अनुपातिक मिक्चर थमाइ देई. घरे लेइ जाइ के ठंडई क सूखा मसाला पानी में भेइ द, अच्छे से फूलि गइले के बाद पीसा अउर छाना.

बनारस में गली-चैराहा पर तइयार ठंडई क भी दुकान मौजूद हइन. खासतौर से गोदौलिया चैराहा बनारसी ठंडई बदे प्रसिद्ध हौ. मैदागिन चैराहा पर बाबा ठंडई क क भी नाम हौ. इ कुल दुकानिन पर कारखाना में तइयार बोतलबंद ठंडई क शरबत भी मलाई मारि के मिलि जाई. लेकिन असली बनारसी शुद्ध ताजा ठंडई क मजा लेवय के होय त बांस-फाटक पर कन्हैया चित्र मंदिर के आगे वाली गली में जा. भांग-ठंडई के छान-घोंट पर्व क तीर्थ हौ इ गली. बाबा भोले नाथ के सच्चे भक्तन क दिव्य दर्शन इहां सबेरे से संझा तक होला. बनारस अगर जा त बनारसी ठंडई क रसानुभूति जरूर करा अउर तब समझ में आई कि असल में ’ठंडा मतलब बनारसी ठंडई’ ही होला. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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