भोजपुरी विशेष: बरेली के झुमका से पहले भोजपुरी में झुलनी हेरइला के गीत आ गइल रहे

भोजपुरी विशेष: बरेली के झुमका से पहले भोजपुरी में झुलनी हेरइला के गीत आ गइल रहे
भोजपुरी बिरह गीत में भी सौंदर्य के हर तरह से ध्यान राखल बा.

बरेली के बाजार में झुमका गिरा से बहुत पहले एहि ठंइया झुलनी हेरानी हो रामा - भोजपुरी में रच दिया गया था. जीवन से कतना सरोबोर ह भोजपुरी गीत एहि पर एक गो लेख -

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  • Last Updated: September 7, 2020, 3:32 PM IST
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लोकसुर में समाइल दरदे रहे कि अंजोरिया राति में रामनरेश त्रिपाठी के मरम के बेधि दिहलसि. ऊ बेधले रहे कि देस में लोक साहित्य के पढ़ाई शुरू भइल. जौनपुर जिला के तिवारीपुर स्टेशन पर ओह राति एगो परिवार अपना बहरवांसु के राति के गाड़ी पर चढ़ावे आइल रहे. कमासुत बेटा कलकत्ता में नोकरी करत रहे. ओकरा के छोड़े घर भर के लोग आइल रहे. जब कलकता जाए वाली गाड़ी स्टेशन से छूटि गइल त संगे आइल रहली मेहरारून के लोर फूटि पड़ल. आसमान में चांद बिंहसत रहे. बाकिर उ परिवार रूँआसा रहे. घरे लवटति मेहरारू सब दर्द छेड़ि दिहली.
रेलिया ना बैरी. जहजिया ना बैरी.
पइसवा बैरी भइले ना.

त्रिपाठी जी के कवि सम्मेलन में हिस्सा लेबे पच्छिम के रेल से जाए के रहे. कमासुत के रेल में बइठा के ऊ परिवार लवटि गइल. लेकिन ओकर गीत त्रिपाठी जी के मथि दिहलसि. पइसवा बैरी ना.. इहां ई बतावल जरूरी नइखे कि भारत में लोक साहित्य के पढ़ाई लखनऊ विश्वविद्यालय से शुरू भइल. आ त्रिपाठी जी से निहोरा पर शुरू भईल. ओकर जरिया बनल रहे. ई हे गीत. इस गीत त्रिपाठी जी के कहीं गहरा तक बेधि दिहलसि. कि ऊ लोकसाहित्य के मुरीद हो गइले.
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विद्यानिवास जी कहत रहले हा कि लोक में राष्ट्र के आत्मा बसेले. राष्ट्र केकरा से बनेला. लोक से. दीनदयाल उपाध्याय जी कहत रहले हा. राष्ट्र का ह. चित्ति के विस्तार ह. चित्ति माने अंतरमन. अंतरमन में का होला. लोक. प्रकृति से, माटी से मिलल गंवई-गंध. पुरखन के धरोहर. ई धरोहर धराऊं ना होला कि मोका पर निकालल जाई. काज-परोज पर ओकर जरूरत पड़ी. ई तक करेजा में. मन में. माथा में, जिनगी में घोराइल रहेला. अवचेतन में परान नाइन समाइल रहेला.



लोक में जिनगी के तमाम रंग समाइल रहेला. भोजपुरी भी लोक के भाषा है. एह कारण से एकरा में पग-पग पर लोक बसेला. जिनगी के रंग बसेला.अब एही गीत के ना देखीं.
एहि ठंइयां झुलनी हेरानी हो रामा, कासे मैं पूछूं
सास से पूछूं, ननदिया से पूछूं.
देवरा से पूछत लजानी हो रामा.

नायिका के झुलनी हेरा गइल बा. ऊ परेसान बाड़ी. सास से पूछतारी. ननदि से पूछतारी. चूंकि पिया जी से झूमा-झटकी में झुलनी कहीं गिर गइल बिया. ई बात सासुओ समझ तारी अउर ननदि भी. लेकिन उनका झुलनी नइखे मिलत. अब देवर से नायिका कइसे पूछसु. अगर हेरइला के वजह पूछि दिहलसि त. अइसे में देवर के सामने लजाहीं के परी. ई ह भोजपुरी लोक के रंग. एह एगो गीत में देखीं. घर बा, परिवार बा, सौंदर्य बा, पिया मिलन बा, संजोग बा. और स्वाभाविक मर्यादा भी बा.

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कुछ जानकार त कहेले कि मेरा साया फिल्म में आशा भोंसले के गावल गीत-झुमका गिरा रे- एही लोकगीत पर आधारित बा.ओइसे एह गीत के एगो अउर रूप मिलेला. .

मानिक मोर हेरइले हो रामा.
परदेस गइल पिया बरसों से ना अइले. वियोग में नायिका अपने पिया को ढूंढ़ते फिर रही है.

भोजपुरी लोकगीतन में विरह वर्णन पर खूब चर्चा भइल बा. लेकिन भोजपुरी लोकगीतन में जिनगी के किसिम-किसिम के आताना रूप बा. कि ओकर वर्णन करत-करत समीक्षक थाकि जइहें.

भोजपुरी लोक के नायिका के नजर में ओकर पिया के सम्मान केतना बड़ बा. एकरा बावजूद घर में ओकर ताकत का बा. एह के देखे के होखे त तनीं एह गीत पर ध्यान दीं. एह गीत में भोजपुरी लोकगीत में उपमा आ उपमान के कइसन प्रयोग भइल बा. इहो देखे के मिली.
जलवा में चमके उजरी मछरिया
रन में चमके तलवार
सभवा में चमके मोरा संइया के पगरिया
सेजिया पर बिंदिया हमार

यानी जल में जिस तरह उज्जर मछरी के चमक अलगे होला. जइसे लड़ाई में तलवार के चमक के महत्व होला. ओही तरी नायिका के पिया के पगड़ी सभा-बइठक में चमकेले. लेकिन सेजिया पर नायिका के बिंदिया ही दहकावे ले. यानी नायिका के नजर में ओकर पिया के सम्मान सबसे बड़ा बा. लेकिन घर में दहकावे के हैसियत ओकर बा. ए गीत में सौंदर्य के जइसन वर्णन भइल बा. ओइसन बहुत कमे जगह देखे के मिली.तनी एह रचना में जिनगी के रूप आ संदेश देखीं.
एकहि बंसवां के दुई रे कोइनिया
एक बंसुरी, दुई बांस रे.
एक ही मइया के दुई रे लरिकवा.
एक पुता, दुई धीय रे.

यानी एकही बांस से दुईगो कोइन निकलल. एगो से बनेला बांसुरी. जवना के सुर में दुनिया में डूबि जाला. त दोसरका से बनेले लाठी. जवन मारधाड़ के काम आवेला. ओही तरी एकही माई से एगो बेटा पैदा होला. जवन अपना घर में रहेला आ रच्छा करेला. आ दोसरकी होले धिया. जवन दोसरा घरे चलि जाले आ उहां जाके नइहर के सुबास फइलावेले.

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भोजपुरी इलाका में पहिले शादी-बियाह वर के घर-खानदानि देखि के कइ दिहल जात रहल हा. दुलहा के घर, दुआर, माई-बाप सबकर खोज-खबर कइ लिहला के बादो गारंटी ना रहत रहल हा कि बेटी सुखि रहिहें कि ना. एह पर भी भोजपुरी में एगो गीत बा. जिनगी के एहू रंग से परिचित होखल जाउ.
ऊंच निवास बेटी कांकर बोअलों.
रन-बन पसरेले डाल्हि रे.
आरे कंकरी के बतिया ए बेटी देखत सुहावन.
ना जानों तींत कि मीठ ए.

यानी सुनर बर आ नीमन घर देखि के ए बेटी तोहार बियाह त बाबा कइ दिहले. ओही तरी जइसे कांकरि बोवल जाला आ ऊ छपर पर चढ़ि के फइल जाले. लेकिन ओकर फर तींत होई कि मीठ. ई जइसे पाता ना होला. ओही तर ई पाता नइखे कि ए बेटी ताहारा सुख मिली कि दुख. .

विद्यानिवास जी कहत रहले का कि लोक के आनंद लेबे का बा. त आपाना खोलि में सिर्फ खुदे के समा ल. तब पता चलि कि लोक के मरम का बा. ओकर धरम का बा, आउर ओकर संदेस का बा. .भोजपुरी लोक के आनंद लेबे के होई. संदेस ग्रहण करेके होई. त ई शर्त पूरा करहिं के परी.  लोक के मरम जइसे रामनरेश त्रिपाठी जी समझले. ओइसे ही हमनीं के समझे के परी. तब पता चली कि जिनगी काताना सुनर बिया आ काताना बिया अर्थवान.
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