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Bhojpuri: कॉपीराइट बेचि के कपारे क कर्जा उतरले रहलन भारतेंदु

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भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र के आधुनिक हिंदी क पितामह कहल जाला। हिंदी क आधुनिक स्वरूप गढ़य बदे पूरा हिंदी समाज ओनकर कर्जदार हौ। लेकिन इ कम लोगन के पता होई कि भारतेंदु जीवन के अंतिम समय में खुद कर्जदार होइ गयल रहलन, अउर कपारे क कर्जा उतारय बदे ओन्हय आपन पूरा कॉपीराइट बेचय के पड़ल रहल।

  • News18Hindi
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भारतेंदु बनारस के एक बहुत धनी परिवार से रहलन। पिता गोपाल चंद क लंबा-चउड़ा कारोबार रहल। लेकिन पिता के मरले के बाद रईशी अउर शाहखर्ची में जमा धन खर्च होइ गयल अउर हरिश्चंद्र धीरे-धीरे कर्जा में डूबत गइलन। अंत में पटना के खड्गविलास प्रेस के चार हजार रुपिया में आपन पूरा कॉपीराइट बेचि के कर्जा से छुटकारा पइलन।

भारतेंदु हरिश्चंद्र अपने रचनाकर्म से आधुनिक हिंदी क बुनियाद रखलन, त बुनियाद पर हिंदी क बुलंद इमारत खड़ा करय बदे तमाम लेखकन अउर साहित्यकारन क हर तरह से मदद भी कइलन। जे भी ओनके इहां मदद बदे जाय, खाली हाथे न लउटय। पिता के निधन के बाद 15 साल के उमर में जब उ पूरे परिवार सहित पुरी के जगन्नाथ जी क दर्शन करय जात रहलन, तब रस्ते में कलकत्ता में रुकलन। ओह समय बंगाल में पुनर्जागरण आंदोलन चलत रहल, जहां औरतन क स्थिति सुधारय बदे कई आंदोलन शुरू रहल -बाल विवाह अउर सती प्रथा रोकय क आंदोल, विधवा विवाह शुरू करय क आंदोलन। बंगाल के आंदोलन क हरिश्चंद्र पर एतना असर पड़ल कि उ हिंदी में भी पुनर्जागरण करय क ठनलन अउर साथ ही औरतन क स्थिति सुधारय बदे काम शुरू कइलन।

अंगरेजी शासन में दालमंडी क तवायफ वेश्या बनय बदे मजबूर होइ गइल रहलिन। तवायफन क जिनगी नरक होइ गइल रहल। हरिश्चंद्र दालमंडी के तवायफन क जीवनस्तर सुधारय में जुटि गइलन। तवायफन के अउर ओनके लड़िकन-बच्चन के पढ़ाई-लिखाई क व्यवस्था कइलन। हरिश्चंद्र खुद भी दालमंडी जाइ के पढ़ावय। वेश्यावृत्ति के दलदल से निकालय बदे तवायफन क आर्थिक मदद करय लगलन। एही कड़ी में उ एक ठे विद्यालय खोललन, जवन चौखंभा स्कूल के नाव से जानल जाय। सन् 1868 में विद्यालय सुड़िया स्थानांतरित भयल। भारतेंदु के निधन बाद 1995 में इ विद्यालय सुड़िया से मैदागिन पहुंचि गयल। हरिश्चंद्र क शुरू कयल इ शिक्षा संस्थान आज मैदागिन पर हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज, हरिश्चंद्र कन्या इंटर कॉलेज अउर हरिश्चंद्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय के रूप में चलत हौ। पुरनिया लोग बतावयलन कि तवायफन क स्थिति सुधारत सुधारत हरिश्चंद्र के महफिल में बइठकी क भी चस्का लगि गयल रहल। उ संगीत क अच्छा जानकार अउर रसिक रहलन। एतना कुल समाजिक अउर साहित्यिक व्यस्तता के बीचे एक तरफ कारोबार ढीला पड़ल, त दूसरी तरफ खर्चा काफी बढ़ि गयल। स्थिति इहां तक आइ गइल कि उ कर्जा लेइ के खर्चा चलावय लगलन।

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के ओरी से सन 2000 में एक ठे किताब प्रकाशित भइल रहल। ’आधुनिक हिंदी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका’ नाम वाली किताब में भारतेंदु क एक ठे चिट्ठी छपल हौ। इ चिट्ठी उ कलकत्ता के अपने एक मित्र के लिखले रहलन। चिट्ठी में लिखल हौ कि ’’संप्रति रामदीन सिंह ने मुझे एकसाथ चार हजार रुपये देकर उऋण किया है। वे ’क्षत्रिय पत्रिका’ के संपादक हैं। अब मैं किसी को पुस्तकें छापने न दूंगा। प्रकाशित-अप्रकाशित पुस्तकों का सत्व भी इन्हीं को दिए देता हूं।’’ रामदीन खड्गविलास प्रेस क मालिक रहलन, अउर सन 1880 में उ आपन प्रेस खोलले रहलन। प्रेस शुरू करय से पहिले रामदीन सिंह बिहार में हिंदी बदे आंदोलन चलावत रहलन। उ खुद कवि अउर लेखक भी रहलन। भारतेंदु से रामदीन क परिचय देवरिया जिला के मझौली रियासत क राजा अउर कवि-नाटककार खड्गबहादुर मल्ल करउले रहलन। रामदीन सिंह इ चार हजार रुपिया के बाद भी भारतेंदु क कई बार आर्थिक मदद कइलन।

भारतेंदु ओह समय हिंदी क सर्वमान्य नायक रहलन, अउर ओनसे कापीराइट क चिट्ठी मिलले के बाद रामदीन सिंह अपने इहां से प्रकाशित हर किताब अउर पत्र-पत्रिका में इ चिट्ठी बार-बार छपलन, जवने से प्रेस क प्रतिष्ठा बहुत बढ़ि गइल। भारतेंदु के निधन के बाद 1888 में ओनकर छह खंड में ग्रंथावली भी इहय प्रेस छपले रहल। बनारस क भारत जीवन प्रेस जब भारतेंदु क नाटक ’अंधेर नगरी’ क प्रकाशन कइलस, तब खड्गविलास प्रेस कापीराइट क मुकदमा कइ देहलस। देश में कापीराइट क इ पहिला मुकदमा रहल, अउर मुकदमा क फैसला खड्गविलास प्रेस के पक्ष में आयल रहल।

भारतेंदु हिंदी के विकास बदे एक हिंदी विश्वविद्यालय स्थापित करय चाहत रहलन, लेकिन अंतिम समय में तंगहाली के नाते ओनकर इ सपना पूरा नाहीं होइ पइलस। चौतीस साल के कच्ची उमर में ही उ अपने साहित्य क दुनिया पक्की कइ के छह जनवरी, 1885 के चलि गइलन। हरिश्चंद्र क जनम नौ सितंबर, 1850 के भयल रहल, अउर हिंदी में ओनकरे अभूतपूर्व योगदान बदे 1880 में बनारस क विद्वान लोग ओन्हय भारतेंदु क उपाधि देहले रहलन।

(सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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