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भोजपुरी विशेष - दर्द के संगी-साथी आ क्रांति के प्रतीक ह खंजड़ी बाजा

हाथे में रहला आ बढ़िया आवाज के कारण खंजड़ी हर वर्ग के बहुत रुचेला. आंदोलन से लेकर साधना तक एकर महत्व ह.
हाथे में रहला आ बढ़िया आवाज के कारण खंजड़ी हर वर्ग के बहुत रुचेला. आंदोलन से लेकर साधना तक एकर महत्व ह.

खजड़ी अइसन बाजा ह जवना के थाप आ धुन साधु लोगन के धुनी पर भी सुनाई देला आ आंदोलन में भी लगन लगावेला. छात्र – नौजवान लोग कवनो आंदोलन में इहे खंजड़ी लेके कूद पड़ेला. हल्का आ आकार में छोटा इस सहज सरल सा बाजा के अलग अलग रूप दिखाई देला.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 2, 2020, 5:47 PM IST
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तकई के तकधिन, मकई के लावा.
अइसन पतोहि कहां पवल हो बाबा

भोजपुरी इलाका के गांवन में जब भदई भा रबी के फसल तेयार हो जात रहे, लोक गवइया, फकीर, भिखारी आ गोंसाई जी के दुआरे-दुआरे आवाजाही बढ़ि जात रहे.भदई में भइल जनेरा के बालि दुआरी पर मइया, बड़की माई, अधवानो आ चल्हकी फुआ आदि लोग मिलि के निकियावत रहे लोग, भा रबी के सरसों-तिसी के फटकाई होत रहे, ठीक दुपहरिया गोंसाई जी भा कवनो साधु बाबा खंजड़ी लेके हाजिर हो जात रहलन. उनुको खातिर एगो बोरा बिछि जात रहे.रबी के मौसम में गरमी ढेरे पड़ेला त पियवनी पानी आ जात रहे त भदई में एकर मोका गवनई के बाद आवत रहे.
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साधु बाबा के खजड़ी
साधु बाबा भा गोंसाई जी जब खंजड़ी के ताल दिहल सुरू करत रहले त सुरूआत एही ताल से होत रहे, तकई के तकधिन. कॉलेज तक के पढ़ाई गांवहिं में रहि के भइल बा. हर साल फसल तेयार भइला के बाद ई नजारा गांव के पहचान रहे.बाकी दिन में ई खंजड़ी रेलगाड़ी में बाजे, दु पइसा जुटावे खातिर कवनो जियकिया भा भिखारी पंचम सुर में भजन आदि गावे के बेर खंजड़ी बजावत रहे लोग. गांव में रहत खानी ले त एह खंजड़ी के कवनो अहमियत पते ना रहे. बस इहे मालूम रहे कि जियकिया साधु बाबा होखसु भा, महीना-दू महीना पर गांवांगाईं घूमे वाला गोंसाई जी, उहे लोग खंजड़ी पर ताल देला.आ आपन जीवन चलावेला. राजधानी दिल्ली अइला के बाद पता चलल कि खंजड़ी के औकात त एह से कहीं बेसी बा. सीकरी में खंजड़ी के ई ताकत देखि के बिहारी कवि के दोहा यादि आवे लागल-
देखन में छोटो लगै, घाव करे गंभीर.



क्रांतिकारी धुन-सुर आ थाप
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के लउकन, कवनो बात होखे, चाहे पढ़नियां लोगन के मांग होखे, भा अमेरिका के राष्ट्रपति के कवनो फैसला, इराक पर हमला होखे, चाहे चे ग्वेरा के जनमदिन, कांग्रेसी लोगन के हाथों पिटइला के बाद शहीद भइले सफदर हाशमी के जयंती, हर दिन खंजड़ी आपान पूरा ताकत देखावे.स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया यानी एसएफआई, ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन यानी आइसा, एआईएसएफ आदि के प्रदर्शन में त खंजड़ी आ ओकर भाई मानीं चाहे बहिन, डफली के मौजूदगी हिंदी में कहीं त अनिवार्य बा. वामपंथी संगठन के प्रदर्शन में इस्तेमाल के बाद खंजड़ी के हैसियत लोक से बढ़ि के अंतरराष्ट्रीय हो गइल बा.

गांव से शुरु भइल जतरा
गांव से सहर तक के यात्रा में खंजड़ी के ताकत आ पहिचान में बदलाव आ गइल बा.गांव में जहां ई सरवन कुमार के दर्दीला भजन के सहयोगी रहे, बेटा भइला के खुसी में गावे वाला सोहर के सहयोगी रहे, उहवां सहर पहुंचि के खंजड़ी क्रांति के सहयोगी बनि गइल बिया. साल 2014 के बाद एह लोक बाजा के ताल ज्यादे सुनाता. कोरोना के कठिन दिन सुरू होखे से पहिले एकर ताल नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के खिलाफ जामिया मिलिया इस्लामिया के लगे खूब सुनाइल. खंजड़ी के धमक 2016 के फरवरी में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एतना सुनाइल कि ओकर आवाज अमेरिका-ब्रिटेन के अखबारन तक गूंजत रहे. केंद्र के मौजूदा सरकार बनला के पहिले लोकपाल आंदोलन के दौरान दिल्ली के जंतर-मंतर पर खंजड़ी के ताल खूब चढ़ल. 2012 के दिसंबर में दिल्ली में निर्भया संगे भइल जघन्य पाप के बाद भी खंजड़ी जम के बाजल रहे. चाम के एह बाजा से निकलल सुर एह घरी नवका खेती कानूनन के खिलाफ दिल्ली में भइल किसानन के जुटान में भी सुनाता. भक्ति आ लोक धार के प्रतीक खंजड़ी के बारे में संगीत के जानकार लोगन के आपन विचार बा. ऊ लोग एकरा के ताल वाद्य मानेला.

रूप-स्वरूप
खंजड़ी में लकड़ी के एगो छोट घेरा होला. जेकरा में एक ओर कवनो मरि गइल जानवर के उतारल चाम चढ़ावल रहेला. इ चाम ज्यादेतर बकरी के होला. एकरा के बजावे खातिर एगो हाथ से एकरा के बजावे वाला पकड़ेला आ दूसरका हाथ के अंगुरी आ हथेली के इस्तेमाल से बजावेला. कवनो-कवनो खंजड़ी में लकड़ी के घेरा में छेदा कइके झांझ भी लगावल जाला.

बचपन के एगो साधु बाबा के खंजड़ी लेके आइल याद बा. गरीबी के मारल उ साधु बाबा लकड़ी नियर पातर रहले.कहल जा सकेला कि उनुकर देहि खाली हड्डियन के ढांचा रहे. सरला सावन होखे भा भरला भादो, हाड़ कंपावत जाड़ होखे बा जगत के तपोवन करे वाली गरमी, उनुका देहि पर एगो पातर कुर्ता आ एगो धोती लपिटाइल रहत रहे. छपरा जिला के उ साधु बाबा भोर वाली गाड़ी से आवत रहले आ सांझि का लवटि जात रहले. उनुकर आवाज में अइसन दरद रहे कि श्रवण कुमार के कहानी उनुका मुंह से सुने खातिर टोला-महल्ला के बुजुर्ग मेहरारू लोग जुटि जात रहे लोग. जेकरा दुआरि पर उ गावे बइठत रहले, ओह घर के कनिया लोगन के उनुकर भजन सुने के मोका परदा के पीछे से मिलि जात रहे.
तब ऊ खंजड़ी बजाके भजन सुरू करत रहले.
एक वृक्ष की आड़ में
राजा दसरथ खड़े सिंह के आस में
सरवन चलले लेबे के जल
लेकर कमंडल हाथ में
घनघोर काली राति रहे
पतई गिरल रहे राहि में.

एह भजन के आखिरी लाइन जइसहिं साधु बाबा गावे के होखसु कि उनुकर भजन सुने बइठल मेहरारून के सांस रूकि जात रहे.ओह घरी कवनो लइका आ के केहू टोकलसि कि ओकर खैर ना रहत रहे.त ऊ आखिरी लाइन बिया-
पैर के आवाज सुनि
दसरथ धरि लियो बान चाप पे.

एह लाइन के बाद जइसे सन्नाटा छा जात रहे.साधु बाबा भी भजन सुनावे के अनुभव रहे त ऊ भी सन्नाटा पसरे देत रहले. थोड़की देर बाद रूकि के जब ऊ दोबारा भजन सुरू करसु, सरवन कुमार के बान लागाला के प्रसंग सुनावसु त खंजड़ी के अलगे ढंग से बजावसु.जवना से करूणा भाव उत्पन्न होखे.जवना से रोआई आवे. आखिर में जब उ ई लाइन सुनावसु, आजी-मइया लोग के आंखि से ढारे-ढार बहे लागत रहे.ऊ लाइन रहे-
अब नीर पिला रे प्रान पियारे
नीर पिला से प्रान पियारे
सूखे अलख हमारे
प्यासे हैं नीर पिला रे.

सरवन कुमार के माता-पिता के इस कातर पुकार को सुन वहां मौजूद महिलन के अंतरतम जइसे बहि निकलत रहे. आ धीरे-धीरे खंजड़ी के आवाज थम्हि जात रहे.
खंजड़ी त गिरी बाबा भी खूब बढ़िया बजावत रहले. केहू-केहू उनुका के गोंसाई जी भी कहत रहले.

कौन होला गोंसाई जी लोग
गोंसाई जी भोजपुरी इलाका के शैव ब्राह्मण होला लोग. सिवाला भा शंकर जी के मंदिर में चढ़ल दक्षिणा-चढ़ावा के उहे हकदार होला लोग. ऊ लोगन किहां परंपरा रहल हा कि भले खाए-पिए के तकलीफ ना होखे, बाकिर साल में एक-दू बार जरूर अपना जजमानी वाला गांव में आई लोग.खंजड़ी के ताल पर भजन सुना के भा केहू जजमान किहां पैदा भइल बेटा के खुसी में सोहर गाइके अनाज-कपड़ा आ रकम के दक्षिणा जरूर ले जाइ लोग. हमनी के गांव के पासे एगो गोंसाई जी त बंगाल में बड़का अफसर हो गइल रहले. बाकिर जब साल में एक बेर छुट्टी पर गांवे आवत रहले त खंजड़ी बजावे एक दिन हमनी के गांवे जरूर आवत रहले. उ लोग के खंजड़ी के ताल संगे गूंजत रहे.
जुग-जुग जियसु ललनवा
भवनवा के भाग जागल हो
ललना लाल होइहें कुलवा के दीपक
मनवा में आस जागल हो.
आजु के दिन सुहावन, रतिया लुभावन हो
ललना फलाना देई के होरिला जनमले, होरिलवा बाड़ा सुंदर हो.

सुनिके लोग थिरके लागेला
भोजपुरी के लोककवि लोग रसवन के धार कहेला. ओइसे त खंजड़ी मारवाड़, मेवाड़, हिमाचल, उत्तराखंड में भी बाजति रहलि हा.बाकिर भोजपुरी में ई रसधार के संहतिया रहलि हा. राजस्थान के कालबेलिया नाच में भी खंजड़ी बाजेले. कहल जाला कि खंजड़ी से निकलल सुर नचनिया के देहि में धीमे-धीमे नशा करेले. बाकिर एकर एकही पहचान रहल बा.फकीरी आ दरद के संहाती. दरद के संहतिया अब एगो अवरू रूप में बा. ई बात अलग बा कि नवका रूप के हंसी उड़ावे वाला भी एगो बड़का वर्ग बा, जबकि पारंपरिक रूप सवाल उठावे वाला केहू ना.
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