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भोजपुरी विशेष : निजामाबाद - जेके माटी से मिलल अंतरराष्ट्रीय पहिचान

अइसे त इ बर्तन उपयोग लायक होने, लेकिन सुंदरता के कारण ब्लैक पॉटरी के सजावेके मन हो जाला.
अइसे त इ बर्तन उपयोग लायक होने, लेकिन सुंदरता के कारण ब्लैक पॉटरी के सजावेके मन हो जाला.

अंगरेजी में ब्लैक ब्यूटी मतलब स्याह सौंदर्य के बहुत जिक्र आवेला. लेकिन भोजपुरिया इलाका के आजमगढ़ में काला रंग के मिट्टी के बर्तन देखिके अंगरेजी के ब्लैक ब्यूटी साफ दिख जाला. राहुल सांकृत्यान, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध अउर कैफी आजमी जइसन अमर कलमकार पैदा करे वाली इ धरती के ब्लैक पॉटरी कलाकारन के भी दुनिया भर में सम्मान मिलेला.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 17, 2020, 6:10 PM IST
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आईं, आज निजामाबाद चले के. निजामाबाद मने तेलंगाना वाला निजामाबाद ना, एगो निजामाबाद अपनियो जवार में बा. एहीं आजमगढ़ जिला में. आजमगढ़ से उत्तर पच्छू ओर राजमार्ग 28 पर कुछ दूर चल के उहाँ से सीधे पच्छू हो जाए के आ आगे जा के पूर्वांचल एक्सप्रेस वे के फानत तहबरपुर हो के उहाँ से फेर दक्खिन हो जाए के. ओकरे बाद फेरू एक बेर सरदहा ओर से पूर्वांचल एक्सप्रेस वे के फानत निजामाबाद पहुँच जाएब. दूरी कौनो बहुत अधिक ना, बस 20-21 किलोमीटर हौ. बकिर समय एक घंटा के लगभग लगि जाले. वइसे इहाँ अइले के औरो राहि हईं. निजामाबाद के नाम पूरे देस आ बलुक बहरो दुनिया भर में जानल जाला. एकर एक्के गो ना, कई कारन हवें. पहिला त ई कि हिंदी के महान साहित्यकार अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ क जनम एही निजामाबाद में भैल आ उनकर सुरुआती सिच्छा-दिच्छा भी एही जा भैल. हरिऔध के बाद खाली साहित्यकारे ना, महान बहुबिद्याबिद महापंडित राहुल सांकृत्यायन के जनम भी एही तहसील के अधीन पंदहा गाँव में भैल. हालांकि पंदहा उनकर पैतृक स्थान ना रहे. पंदहा में उनकर ननियाउर रहे आ राहुल जी के जनम से लेके सुरुआती सिच्छा-दिच्छा तक कुल्ही पंदहा अउर एही निजामाबाद में भैल. टौंस यानी कि तमसा नदी के तीरे बसल निजामाबाद से गुरु नानक देव जी के भी रिस्ता जुड़ल हौ.

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ज्यॉग्रफिकल इंडिकेशन टैग भी



लेकिन आज हम निजामाबाद के जौन चर्चा करत हईं ऊ एह कुल के नाते नाईं, बलुक ओह कलाकारी बदे करत हईं जौने के नाते बमुस्किल 15 हजार आबादी वाले एह कस्बा के देस-बिदेस के कई पुरस्कार मिल चुकल हौ. भारत के नाम बिदेसन में रोसन करे वाले कई ठो कलाकार अबहिनो इहाँ हवें. निजामाबाद के ई पहिचान कौनो नया ना हौ, पिछले करीब चार सौ साल से ज्यादा समय से चलल आवत हौ आ अगर आमजन के अभिरुचि के भोथरियइले आ सरकारी उपेच्छा के गरहन न लगल त अगहूँ कई हजार साल तक ई पहिचान बनल रही. एही कलाकारी के नाते एके कौनो समय में दुनिया भर में जानल जात रहल आ अबहिनो बहुत लोग जे हस्तकला के सौक रखाला ते निजामाबाद आ इहाँ के करिक्की माटी के कलाकारी से अनजान ना हो सकेला. वइसे अब एह कलाकारी के जीआई यानी कि ज्यॉग्रफिकल इंडिकेशन टैग भी मिल चुकल हौ. ई टैग आजमगढ़ के एह कलाकारी के सन 2015 में मिलल. ई टैग खाली ओही चीजन के मिलेले जौने के एगो खास भौगोलिक मूल होले. ई टैग वह समान के गुणवत्ता, ऐतिहासिक बिरासत आ प्रतिष्ठा के लिए दिहल जाले. एह सब के संरच्छन के बदे इ इंतजाम हौ. एही जीआई टैग के अधीन मणिपुर के काला चावल आ गोरखपुर के टेराकोटा भी संरच्छित कइल गइल बा. एकरे अलावा कई ठो हस्तकला, उपज और उत्पाद एकरे अधीन संरच्छित कइल गइल हवें. हालांकि ई मामिला खाली संरच्छित कइले भर के ना, बलुक ओसे बेसी प्रतिष्ठा के हौ. दुनिया भर में ब्लैक क्ले पॉटरी के नाम से मसहूर एह अद्भुत कलाकारी खातिर कच्चा माल यानी कि करिक्की माटी निजामाबाद के आसेपास एक जमाने में भरपूर मिलत रहे, बकिर फेर उहो स्थिति आइल कि ओह मटिये के अकाल जइसन परि गैल. ताल पोखरा के स्थिति ठीक न रहला से कीने के परे लगल. बहरहाल अब फेरू सरकारी पट्टा से ओकर काफी हद तक समाधान हो गइल हौ.
निजामाबाद ब्लैक पॉटरी
चीनी मिट्टी के करिया बर्तन पर सुनहरी कढ़ाई लाजबाब लागेला.


सिंधु घाटी से मिलेले ब्लैक क्ले पॉटरी
अइसे इतिहास में झाँकीं त काली माटी वाले एह बर्तनन के जिकर सिंधु घाटी सभ्यता तक में मिलेले. एह हिसाब से एकर अस्तित्व कई हजार साल से हौ, बकिर अपने जवार में एकर इतिहास करीब चार सौ साल पुरान हौ. इहाँ एकर आगमन गुजरात से भैल. इहाँ अइला के बाद ई लोग माटी के हाथी-घोड़ा बनवल सुरू कइलस. गुजरात के कच्छ से कुम्हार लोगन के चार परिवार आके गोरखपुर के खजनी में बसि गइले. बाद में उहाँ से तीन जने आ के आजमगढ़ के जोधी के पुरा में रहे लगलन. फेर ओहमन से दू जने के बोला के इहाँ के काजी अपने साथे निजामाबाद ले अइले. ई बाति 17वीं सताब्दी के हौ. ओह समय औरंगजेब के सासन रहे आ निजामाबाद जौन अब आजमगढ़ के सबसे बड़हन तहसील हौ, एक ठो छोट-मोट बजार रहल. इहाँ ऊ कुम्हार लोगन के अपने कला के हिसाब से कच्चा माल और खरीदार दुनो मिल गइले. बनारस ओहू समय बड़हन सहर रहल. इहाँ से जौनपुर आ बनारस के अलावा कई और जगह भी पहुँचल जा सकत रहल. पूरे पूर्वांचल आ ओहर नेपाल से भी कासी गइला के अबहिनो कौनो दूसर राहि नाई बा. आ कासी पहिलहूँ बहुत महतपूर्न नगरी रहल आ अबहिनो बा. एह राही पर आ आके आ काजी से संगे-संगे अउरो तमामन भरपूर गहकी पा के इहाँ ई लोगन के कला के फले-फूले के पूरा मौका मिल गइल. हालाँकि महापंडित राहुल सांकृत्यायन ई लोगन के खिलजी के सासन के दौरान देवगिरि से आइल बतौले हौवन, लेकिन अधिकतर बिद्वान एहपर सहमत ना हवें.

निजामाबाद के एह कला के पहिला बेर बड़हन पहिचान 1868 में मिलल. ओह समय देस में अंगरेजी सासन रहे आ नॉर्थ वेस्ट प्रॉविंसेज के गठन हो चुकल रहल. ओही दौरान पूरे नॉर्थ वेस्ट प्रॉविंसेज के एगो प्रदर्सनी आगरा में लगल. ओह प्रदर्सनी में निजामाबाद के दू कलाकार नोहर राम आ झींगुर राम के वायसराय के हाथे प्रथम पुरस्कार मिलल. ओह समय पुरस्कार के तौर पर दुनो जने के प्रमाणपत्र आ चाँदी के सिक्का के अलावा ढाई भर सोना के मेडल भी मिलल रहल. एकरे तीन साल बाद 1871 में फेरो लंदन में एगो प्रदर्सनी लगल. ओहमें झींगुर राम खास तौर से बोलावल गइलें. झींगुर राम के कलाकारी उहाँ भी सबकर मन मोह लिहल आ एही के नतीजा भैल कि उनके सौ मुहर आ सोना के हल जोतत किसान पुरस्कार में मिलल. एकरे बाद 1936 में मध्य प्रदेश के देवास नरेस के ओर से लगल एगो प्रदर्शनी में एहीं के एगो कलाकार जियाऊराम के भी ओह जमाना में सौ रुपिया के पुरस्कार मिलल. अब राज्य और राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार से सम्मानित माटी के कई गो कलाकार लोग इहाँ निजामाबाद में बा. एही में सोहित प्रजापति जी के राज्य से लेके राष्ट्रीय स्तर तक के पुरस्कार मिल चुकल हवे.

black pottery azamgarh
ए कला के बढ़ावा दिहले के जरूरत बा.


संकट में बा कला
खैर, पुरस्कार-सम्मान सब अपने जगह, आ कलाकारी अपने जगह. एतना सब सम्मान के बावजूद ई सच्चाई हौ कि ई कला संकट में बा. एकर कई वजह हई. पहिला त ई कि पहिले के जइसन एकर कच्चा माल यानी कि माटी मिलल अब आसान ना रहि गैल हौ. दूसर भौतिकता आ उपभोक्तावाद जब हर जगह हावी होत हौ त निजामाबाद आ इहाँ के कलाकारी भी ओसे बचल कइसे रहि सकेले! आ एह सबसे बड़हन, मने बाउरो से बाउर बाति सासन-परसासन के उपेच्छा के नीति रहल, जौन इहाँ के कुम्हारन के बिच्चे में करीब बीस-तीस साल झेले के परल. एक समय त स्थिति ई आ गैल रहल कि इहाँ खाली दू घर में ई काम रहि गइल रहल. बाकी सब एन्ने-ओन्ने हो गइल रहल. हालत ई हो गइल रहल कि कई लोग इहाँ से आपन काम धाम छोड़ के रोजी-रोटी के तलास में परदेस ध लेहल. केहू दिल्ली, केहू मुंबई आ केहू पंजाब भ सूरत ध लिहल. उहों जाके जांगर पेरल लोग, आ केहू-केहू बहरा जा के इहे काम कइलस. बकिर आपन काम कइले क जौन संतोख हौ, ऊ नोकरी में कहाँ मिले वाला बा. कुछ त आपन काम, आपन माटी और अपने सुतंत्रता के बोध आ कुछ सरकारी प्रयास. एकर नतीजा भैल कि कुछ लोग बहरा से एहर लौटे लगल. अब ढेर लोग लौटि आइल बा आ आके आपन काम भी सुरू क देहले बा.

ई लोगन के वापसी के असर हौ कि अब रउरे फेरू निजामाबाद में जौने ओर चाहीं ओहीं, करिया रंग के कई तरह के चमचमात बरतन आ कलाकृती देख सकीले. बरतन भी अब अजबे-गजब हवें. पहिले के लेखिन खाली हांड़ी, खोन्हा, खपरी, भरुका, कुरवा आ हाथी-घोड़ा वाला कोहार ई लोग ना रहि गइल बा. अब नया लोग तवा, कराही, भगौना, सुराही, गिलास, बोतल, थाली, कटोरी से लेके गुलदान, फानूस, लाइटिंग स्टैंड, देबी-देवता तक न मालुम का का बनवे लगल बा. ई इहे सब बनौले के नतीजा ह कि अब देस के कोने-कोने से लेके बिदेसन तक निजामाबाद के ब्लैक पॉटरी नए सिरे से लोकप्रिय हो चुकल हौ. नए समय के जरूरतन से जुड़ के जब सब समान बनवे लगल आ एहर 2015 में जौन जीआई टैग मिलल त ओसे एकर चमक फिर से लौटे लगल. बीचे में काम गड़बड़इले के एक कारन मिट्टी के कमी भी रहल. निजामाबाद से थोड़ी दूरी पर दू गाँव हवें, एक तेलीपुर आ दूसर धुरीपुर. ओहीं के पोखरी में ई लोगन के अपने काम के माटी मिलत रहल. इहाँ के पुरान कलाकार लोग अबहिनो ओह पोखरिन के माटी के आपन अलगे खासियत बतावे लन. ओह माटी चमक आ ओकरे भित्तर के लसलसापन दुनो अलग तरह के हौ. बकिर अब ओसे माटी के कहे, पनियो मिलल दुसवार हो गैल बा. जब सार्वजननिक संपत्ति के हर चीज अतिक्रमण के सिकार होखे लगल, त ई पोखरियो बचल ना रहि पौली. इहो अतिक्रमण के सिकार हो गइली. कुम्हार लोगन खातिर मटिये मिलल दुसवार हो गइल त बेचारे बरतन कहाँ से बनौतन लोग. कुछ दिन लोग माटी कीन के बरतन बनौलस. लेकिन परता जोड़ले पर ई बड़ा महंगा आ घाटा वाला काम लगल. बाति खाली कला तक त बा ना, ई कला के ब्योपार भी हौ आ घाटा उठा के केहू केतना दिन ब्योपार चला लेत. एहर एकठे निम्मन बाति ई भइल कि सरकार नगिचवें अइसनकिए माटी वाला एकठे निम्मन पोखरा ई लोगन के लिए पट्टा क दिहल. एसे ई लोगन के लिए माटी मिलल आसान हो गइल. एकरे साथे-साथे जीआइ टैग भी इहाँ के सोगहक कलाकारन के लिए बड़हन प्रोत्साहन के काम करत हौ. कुल मिलाके अब फेर से एक बेर ई उम्मीद बन्हत बा कि ई कलाकारी भारत के नाम त दुनिया में ऊँचा करबे करी, नौजवान लोगन के रोजगार आ समृद्धि के साधन भी बनी. एह कलाकारी के पूरी प्रक्रिया आप पढ़ल जाई अगिली कड़ी में.
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