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    भोजपुरी विशेष: दुनियावी महामारी के एह दौर में ई फरक कइल कठिन बा कि के आम आ के खास!

    खास बनावे के सोनहुला सपना देखाके बरगलावल जा रहल बा आम अदिमी.
    खास बनावे के सोनहुला सपना देखाके बरगलावल जा रहल बा आम अदिमी.

    आम आ आम अदिमी--दूनों एके नियर होला. फलन के सरताज होला आम, त जनआंदोलनन के सिरमउर होला आम अदिमी. लेकिन सबके बाद अगर आम अदिमी नाहीं रही त केहू के काम न चली.

    • News18Hindi
    • Last Updated: October 2, 2020, 10:28 AM IST
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    काहे कि सबका मुँह पर लागल जाब जइसन मास्क.  बुझाते नइखे जे सारी बीच नारी कि नारी बीच सारी!बाकिर तबो आम आम हऽ आ खास खास. एक त महामारी आ ओहू पर चुनाव के तेयारी. एक त करइला, ओहू पर नीम प चढ़ल!जब से सोनू सूद नियर खास आम के मदतगार साबित भइल बाड़न, आम एक हाली फेरु से चरचा में आ गइल बा. ओइसे खास आ खासमखास--सबके खिंचाव का केन्द्र में रहल बा आम अदिमी. चाहे डॉक्टर-इंजीनियर होखसु, खुद के तीसमारखां बूझे वाला बुद्धिजीवी होखसु भा अपने में मगन लेखक-पत्रकार--सभे केहू आम अदिमी नांव के परानी के गाहे-बगाहे इस्तेमाल-उपभोग करत रहेला.

    राजनीति के मँजल खेलाड़िन के त बाते निराला बा. ओह लोग खातिर त सोना के अंडा देबे वाली मुर्गी लेखा होला आम अदिमी. अइसन नायाब झुनझुना होला ई खासन खातिर, जवना के मन बहलावे का गरज से बजावे में कवनो हरज ना होला. अबरा के जोरू, सबकर भउजाई! सांच पूछीं, त अबरा के जोरुवे लेखा होला आम अदिमी. आम अदिमी माने जनसामान्य भा जनता जनार्दन!निचिला तबका के दबाइल-कचराइल, शोषित-उत्पीड़ित जानवरनुमा अदिमी. जइसे मेहरारू के देवी कहे के चलन बा, त ओकर आबरू लूटे के छूटो बा--किछु ओइसहीं ई आम अदिमी जनतंतर के मजबूत पाया होला, त लातमारू जीवो होला. जबरा मरबो करे आ रोवहूं ना देइ!

    आम आ आम अदिमी--दूनों एके नियर होला. फलन के सरताज होला आम, त जनआंदोलनन के सिरमउर होला आम अदिमी. पाकल आम के भरपूर चूसीं आ चटनी, कूंचा, अंचार भा पन्ना से सवाद बदलीं. आम के आम आ अंठिली के दाम वाली कहाउत त जग-जाहिर बड़ले बा. अपना मन-मरजी से आमो अदिमी के जवना रूप में चाहीं, इस्तेमाल करीं. दरअसल लोकतंत्र के रीढ़ के हड्डी होला आम अदिमी. चाहे ओकरा के आम लेखा चूसत रहीं, चटनी नियर चट कऽ जाईं भा अंचार-अस चटखार लेलेके चाटत रहीं--ऊ मरदवा पोंछि सुटुकावत-हिलावत हरदम रउरा खिदमत में हाजिर रही.



    बस,नया-नया लोभावन नारा आ लालच के हरियरी फेंकिके ओकरा के अपना मायाजाल में अझुरवले राखीं. खाली जियते जिनिगी-भर ना, बलुक मरि-खपि गइला का बादो बेजान अंठिली नियर आम अदिमी सियासत के मोहरा बनावल जाला. खासन के अहमियत तबे ले बा, जब ले आम अदिमी बा. आमे अदिमी जब ना रही, त आम आ खास के बीच के देवाल अपने आप ढहि जाई. तब सभ के सभ अपने आप आम से ख़ास हो जाई. ठीक ओइसहीं, जइसे रेल महकमा के तीसरा दरजा के खतम होते ऊ तमाम लोग खुदे दोसरा दरजा के मुसाफिर हो गइल. हर्रे लागल ना फिटिकिरी आ रंगो चोखा हो गइल.
    कइसन लाजवाब तरीका बा ई!गरीबन के खात्मा करीं, गरीबी खुदे खतम हो जाई. ना रही बांस, ना बाजी बंसुरी! सभ दिक्कत के जरि बा आम अदिमी. अगर आम अदिमी रहबे ना करी, त मए मोसकिल अपने आप आसान हो जइहन स. तबे त खाली महामारी, बेमारी, संक्रामक रोग आउर कुदरती आफत-विपतिए में ना, बलुक दंगो-फसाद, सामूहिक नरसंहार, बाढ़, अकाल, भुखमरियो नियर विभीषिका में खाली आमे अदिमी आ ओकर हीत-नात मुवेलन. बाकिर तबो ओकर समूल नाश कहां हो पावेला!एगो के खतम होते खदबदात अनगिनत जनमि जालन स--रक्तबीज जइसन. कइसन जांबाज जिन्न बाड़न स ई कमबख्त आम अदिमी!

    देश के पँचसाला जोजना होखे भा तरक्की के प्रोग्राम, परिवार के नियोजित राखे के नया-नया तौर-तरीका होखे भा साक्षरता के नित नूतन प्रयोग, खेती के नया-नया तरकीब होखे भा गरीबी दूर करे के सरकारी उपाय--सभे के जरि में बा आम अदिमी. एकर सोरि अतना गहिर बा कि एकरा के जरी-सोरी खतम कइल मोसकिले ना,नामुमकिनो बा. बाकिर तनी सोचीं त सही, अगर आम अदिमी के सांचो के सफाया हो जाई, त मए सरकारी जोजना आ कार्यक्रमन के का होई?केकरा खातिर बड़-बड़ मोट रकम उगाहल जाई?केकरा नांव प रहनुमा लोग चानी काटी?तब चुनावी मुद्दा केकरा खातिर बनावल जाई?नेतन खातिर धरना, प्रदर्शन, भूख हड़ताल के तब नया विषय का होई?

    जनतावादी लेखकन के अतना बरिस के लेखन के फेरु का उपयोगिता रहि जाई?तब खास लोगन का खासियत रहि जाई?मीडिया के ललचावे वाला इश्तहार फेरु केकरा के रिझाई? हमनीं के जनतांत्रिक मसीहा लोग बुझिला एह बारे में गहिरे पइसि के सोचले-विचरले होखसु. तबे त आम अदिमी खातिर चले वाली जोजना आ तरक्की के प्रोग्रामन के भनको ओह लोग तक ना पहुंचे दिहल जाला, जवना से कि आम अदिमी के अस्तित्व बरकरार रहे आ कवनो कीमत पर ऊ खास जनि बने पावे. शतरंज के एह मोहरा के बदउलते त सभकर दोकान फरत-फुलात रहेले आ गोटी लाल होत रहेले.

    महान लोकतंत्र के ई बन्हुआ मजूर आ आजाद देश के ई गुलाम आम अदिमी बेचारा त होला, बेचारगिए एकर गहना होला. राजनेतन के एकरा के बरगलावे के हक हासिल बा. जाति-धरम के नांव पर बांटि-काटि के बहत गंगा में हाथ धोवल कतना आसान होला. फूट डालऽ आ राज करऽ!पुलिस-परशासन के एह आम अदिमी के नांव के जीव पर रोब झारे आ आपन उरुवा सोझ करेके अधिकार बा. रखवार के त भकोसेवाला होखहीं के चाहीं!

    देश के संविधान में सभ केहू के एके समान अधिकार हासिल बा आ एकर जीयत-जागत मिसाल बा आम अदिमी. तबे नू जइसे घूरो के दिन फिरेला, ओइसहीं हर तरे दबाइल-मिसाइल-कचराइल आम अदिमी हर पांच बरिस पर महान हो जाला आ ओकरा धुरिआइल गोड़ पर माथ टिकावल जाए लागेला. उहे अदना आम अदिमी चुनावी जंग के महारथियन खातिर 'त्वमेव सर्वम् मम देव देवः ' हो जाला. भावना आ भावुकता में बही आम अदिमी ,बाकिर संवेदना के नांव पर घरियार-अस लोर बहइहन बड़मुंहवां लोग.

    देश खातिर मरि-खपि के शहादत दी आम अदिमी, बाकिर शहीदन के सूची में कतहीं ओकर नांव-चरच ना होई. हर खतरा से खेलत आपन जान तरहत्थी पर लेके आगा-आगा चली आम अदिमी, बाकिर बाहबाही लुटिहन बड़-बड़ खास लोग. जोतल, बोवल, रखवारी कइल, जांगर ठेठावल ओकर काम आ मन माफिक काटल-बटोरल-हथियावल केहू अउर के जिम्मा. बाकिर भितरे-भीतर खउलत आम अदिमी चुप्पा काहें कहाला?लागता, रउआ नामी डकइत के भीड़ का हाथे चढ़िके आखिरी सांस लेत नइखीं देखले. जब आम अदिमी के खउलत खून अगिया बैताल हो जाला, त बड़-बड़ इंकलाबी बदलाव करवट लेबे लागेला.

    सभके हँसावे-गुदगुदावे वाला लबार के दिली रोवाई साइत रउआ ना महसूसले होखबि. मगर अब अपना जायज खीसि के इजहार करे लागल बा आम अदिमी. आगा-आगा देखीं, का होत बा! इहवां त अबहीं जबाइल कोल्हू के बैल बा आम अदिमी. गदहा-अस बुद्धू बा आम अदिमी. धोबी के कुकुर बा आम अदिमी, जवन ना घर के होला, ना घाट के. रिझावल जा रहल बा आम अदिमी. फुसिलावल जा रहल बा आम अदिमी. पटावल जा रहल बा आम अदिमी. फंसावल जा रहल बा आम अदिमी. पीटल, घसेटल आ दुरदुरावल जा रहल बा आम अदिमी. रेतल जा रहल बा आम अदिमी.

    मुआवल आ दफनावल जा रहल बा आम अदिमी. घोड़ा बेंचिके सुतावे का गरज से दूरदर्शनी अय्याशी में डुबावल जा रहल बा आम अदिमी. दिशाहीन बनाके भटकावल जा रहल बा आम अदिमी. खास बनावे के सोनहुला सपना देखाके बरगलावल जा रहल बा आम अदिमी. कुल्हि मिलाके, बलि के बकरा बनावल जा रहल बा आम अदिमी. देखीं ओकर माई कब ले खैर मनावत बिया!बाकिर केकर माई?बकरा के, आम के?आ कि बलि देबे वाला के, खास के?
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