भोजपुरी में पढ़ें: जिनगी झंड बा, फिर भी घमंड बा

भोजपुरी इंडस्ट्री में पर्याप्त सम्मान आउर उचित पारिश्रमिक ना मिलला के चलते हिन्दी इंडस्ट्री के तरफ रुख कर चुकल बाड़ें !
भोजपुरी इंडस्ट्री में पर्याप्त सम्मान आउर उचित पारिश्रमिक ना मिलला के चलते हिन्दी इंडस्ट्री के तरफ रुख कर चुकल बाड़ें !

आज के करन-अर्जुन, रंगबाज दारोगा, अंखिया लड़िए गइल जइसन फिल्म के हिट अउरी लोगन के जबान पर चढ़ि जाए वाला डायलाग लिखे वाला के मनोज सिंह के आज जन्मदिन ह. पटना के इ लाल के तारीफ दिलीप कुमार भी क चुकल बाने.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 18, 2020, 2:11 PM IST
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तेज़ाब, खलनायक, सौदागर आ रंग दे वसंती जइसन सुपर-डुपर फिल्म लिखे वाला प्रख्यात स्क्रीनप्ले राइटर कमलेश पाण्डेय जी हमरा संगे साक्षात्कार में कहनी कि स्क्रिप्ट राइटर सिनेमा के पहिला नायक होला. त आज हम भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के अइसने एगो पहिला नायक के बात करत बानी .

“जिनगी झंड बा- फिर भी घमंड बा”... ई सुपर हिट डायलॉग त रउरा सभे सुनलहीं होखब. रवि किशन जी हर जगह सुनावेलें. ई डायलॉग के लिखले बा, पता बा ?

एह लेखक के ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार आ सायरा बानो भी तारीफ़ कइलें. अपना फिल्म “अब तs बन जा सजनवा हमार” के संवादो लिखवावल लोग.



जब मनोज सायरा बानो के फिल्म के संवाद लिखत रहन, तबे एक दिन सायरा जी मनोज से इच्छा ज़ाहिर कइली कि फिल्म “उठाइले घुंघटा चाँद देखले” दिलीप कुमार के संगे देखे के चाहत बाड़ी. तब सायरा जी आउर दिलीप साहेब खातिर एह फिल्म के स्पेशल शो रखवावल गइल. फिल्म देखके दिलीप साहब जे तारीफ कइलें, मनोज के अनुसार, “उ हमार जिनगी के सबसे बड़ अवार्ड हs.
“जिनगी झंड बा फिर भी घमंड बा” के अलावा इनकर लिखल दर्जन भर सुपर हिट संवाद आज दर्शक लोगन के जबान पर चढ़ल बा, जइसे कि “औकात बित्ता भर- तेवर तीन गज” (आज के करन-अर्जुन),“ जइसे जौहरी नगीना के पहचानेला, ओइसे कमीना कमीना के पहचानेला” (आज के करन-अर्जुन), “पुलिस मारेला क्रिमिनल के पैर में तs दरद होला पालिटिसियन के सर में” (रंगबाज दारोगा), “जवानी अइसन चीज ना हs जे फ्रिज में रखला से ताजा रही....बसिया पड़ जाई तs एको रसिया ना मिली...” (अँखिया लड़िए गइल) इत्यादि.

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एह लेखक के आज जन्मदिन ह. नाम ह के. मनोज सिंह.

के. मनोज के जनम 18 सितंबर, 1970 के पटना में भइल रहे आउर बचपन बीतल पुश्तैनी गाँव भटगाईं (प्रखण्ड- तरैया, जिला- छपरा, बिहार) में. बी. एन. कॉलेज (पटना विश्वविद्यालय) से अङ्ग्रेज़ी में स्नातक आउर मगध विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक के पढ़ाई के दौरान ही ई पटना रंगमंच आउर आकाशवाणी खातिर नाटक-लेखन से आपन शुरुआत कर चुकल रहन. एही दौरान ई राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिका आदि खातिर बहुत कुछ लिखलन. बाकी जादा रुझान रहे सिनेमा के तरफ. एह से 1996 में घरवालन के सहयोग से मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में भाग्य आजमावे पहुँच गइलन.

के. मनोज सिंह के अनुसार, मुंबई में सबसे पहिले भोजपुरी के सुपर स्टार कुणाल सिंह आपन हास्य धारावाहिक “मुसीबत बोलके आई” (हिन्दी) लिखे के अवसर देलन, जे बाद में श्रेया क्रिएशन के बैनर से डीडी-2 पर प्रसारित भइल. ओकरा बाद कई गो धारावाहिक में लेखन के अवसर मिलल. 2005 में एगो भोजपुरी फिल्म मिलल “बाजे शहनाई हमार अंगना”, जेकर हीरो रहन रवि किशन. फिल्म पूरा भइला के बावजूद आजतक डिब्बा में बंद बा, बाकी इनका लेखन से प्रभावित होके सुपर स्टार रवि किशन, निर्देशक जगदीश शर्मा (मुन्ना भाई) आउर निर्देशक सुनील सिन्हा इनका से कई गो फिल्म लिखवइलें.

अब तक तीस से जादा भोजपुरी फिल्म लिख चुकल के. मनोज सिंह के चर्चित फिल्म के सूची में शामिल बा- “उठाईले घुंघटा चाँद देख ले”, “रंगबाज दारोगा” “तोहार किरिया” “मुक़ाबला” “लागी नाहीं छूटे रामा” “रवि किसन” इत्यादि. फिल्म “रवि किसन” के हीं डायलॉग ह - “जिनगी झंड बा- फिर भी घमंड बा”.

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साल में औसतन दू से जादा फिल्म ना लिखेवाला मनोज के प्रयास रहेला कि इनकर फिल्म मनोरंजक, भोजपुरी संस्कृति के अनुरूप आउर स्तरीय होखे.

भोजपुरी सिनेमा के वर्त्तमान स्थिति पर मनोज के कहनाम बा कि “भोजपुरी सिनेमा से मौलिकता आउर भोजपुरियापन गायब होत जा रहल बा. औद्योगीकरण आउर शहरीकरण के साथ-साथ संचार के क्षेत्र में तेजी से हो रहल क्रान्ति के चलते गाँव के जीवन-शैली में भी जबर्दस्त परिवर्त्तन आइल बा, बाकी भोजपुरी सिनेमा आज भी 80 के दशक के हिन्दी सिनेमा के लीक पर चल रहल बा. जदि सिनेमा के लेखन में समय के मांग के अनुसार बदलाव ना होई, तs धीरे-धीरे भोजपुरी सिनेमा के अस्तित्व संकट में पड़ जाई.“

मनोज के अनुसार, “भोजपुरी सिनेमा के  पहचान दक्षिण भारतीय सिनेमा जइसन ना बन पावे के सबसे बड़ वजह ई बा कि सक्षम भोजपुरिया लेखक-कलाकार-निर्देशक आदि भोजपुरी इंडस्ट्री में पर्याप्त सम्मान आउर उचित पारिश्रमिक ना मिलला के चलते हिन्दी इंडस्ट्री के तरफ रुख कर चुकल बाड़ें !” जरूरत बा एह संवेदलशील लेखक के बात के अक्षरस: समझे के!
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