भोजपुरी जंक्‍शन: अनकर सुख:आपन दु:ख खेलबि ना खेले देबि, खेलिए बिगाड़बि

अरे बाप रे बाप!अतना तिलक-दहेज़ रकटुवा ससुरा कहंवा राखी?भिलोटन अपना बेटा खातिर लाख हाथ-गोड़ पटकले, खूब मोलभाव आ हुज्जत कइले, बाकिर नगद-सामान--कुल्हि मिलाके एको लाख ना भेंटा पावल.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 27, 2020, 1:19 PM IST
  • Share this:
ने एगो सउंसे सप्ताह के खुशहाली के हफ्ता का रूप में मनावल गइल आ एह में सभे केहू सचहूं के सुख हासिल करे में लवसान रहल. का कारन बा कि तमाम संसाधन के अछइत लोग आपन-आपन दुखड़ा रोवत बा. आजु काहें सुख गदहा के सींग बनि गइल बा? रकटू के सरकारी नोकरिहा बेटा के बियाह में जब बेमंगले तिलक-दहेज़ के ढेरी लागि गइल,त पट्टीदार भिलोटन के करेजा प सांप लोटे लागल. अरे बाप रे बाप!अतना तिलक-दहेज़ रकटुवा ससुरा कहंवा राखी?भिलोटन अपना बेटा खातिर लाख हाथ-गोड़ पटकले, खूब मोलभाव आ हुज्जत कइले, बाकिर नगद-सामान--कुल्हि मिलाके एको लाख ना भेंटा पावल.

एने रकटुवा के देखऽ!किछु मंगबो ना कइलस आ सभ किछु पाइओ लिहलस. ठीके नू कहल गइल बा--बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न भीख!अब त भिलोटन के रात के नींन गायब हो गइल, दिन के चैन छिना गइल. दिन-रात ऊ एही सोच-फिकिर में अझुरा गइले कि खुशहाल रकटुवा के परिवार के कइसे जीयल मोहाल कइल जा सकेला? भिलोटन आपन मए काम-धाम भुला गइले आ रकटुवा के तबाह करेके मकसद पर जीव-जान से भीड़ि गइले. भिलोटन खाली एगो अदिमी के नांव भर ना ह. आजुकाल्ह गांव-जवार में अइसने भिलोटनन के भरमार बा. अइसना लोग के दु:ख-तकलीफ के कारन आपन दु:ख-तकलीफ कतई नइखे.

इन्हिकरा पीर के वजह ई बा कि फलनवां काहें सुखी बाड़न आ कइसे उन्हुकराके बरबाद कइल जा सकेला?उन्हुकरा बरबादी में भलहीं आपन कवनो नफा-नुकसान ना होखे, बाकिर उन्हुकर दु:ख के दिन लवटावे आ उन्हुकरा के दु:खी देखे के सुख त मिलबे करी. आपन एगो आंखि फूटि गइला से 'काना' के विशेषण भलहीं भेंटाउ, बाकिर दोसरा के दूनों आंखि फोरिके 'सूर ' कहिके चिढ़ावे के मजे किछु अउर बा! गांव-गांव में ई लत सुरसा-अस मुंह बवले बढ़ते जा रहल बा. केहू बहरवांसू बहरा से जांगर ठेठाके, नोकरी-चाकरी कऽके दू पइसा गांवें ले आइल, ग॔वई लोग हाथ धोके ओकरा पाछा परि जाता कि कवना तरी ओकरा के कंगाल बनावल जाउ!



कइसे ओकर जिनिगी नरक में बदलिके जीयल दुलम कऽ दिहल जाउ? खेलबि ना खेले देबि, खेलिए बिगड़बि! पहिले दोसरा के दुःख से लोग दुखी होत रहे आ परदुखकातरता मनई के महान गुन मानल जात रहे. तबे त हरेक इंसान दोसरा के पीर में हाथ बंटावल आपन फरज बूझत रहे--'वैष्णव जन ते तेने कहिए जे पीर पराई जाने हे!' बाकिर अब त पराया सुखे सभसे बड़का दु:ख बनिके करेजा में सालत रहत बा. देवी-देवता-पितरन से अपना बढ़न्ती खातिर ना, दोसरा के तबाही खातिर भखौटी भाखल जात बा. भरभस्ट तरीका अपना के अधिका से अधिका धन संहोथिके भौतिक सुख के ललसा आजु जिनिगी के मकसद बनि गइल बा आ ओही अरथ खातिर मए अनरथ हो रहल बा--'सबहिं नचावत अरथ गोसाईं!'
अब ले सभसे बड़का धन 'संतोष धन' के मानल जात रहल हा, जेकरा आगा बाकी धन-दउलत धूरि बुझात रहे—
'गोधन-गजधन-बाजिधन, अउर रतनधन खान.
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान. . '

मगर अब संतोष कहां!सभ केहू पागल भइल बा--भौतिकता के मृगमरीचिका का पाछा. बाकिर समुंदर के पानी से भला कबो तरास बुझिला!जतने लोग गहिर डुबकी लगावत बा, असंतोष आ पियास अउर बढ़ते जा रहल बा. नतीजा बा तबाही आ दु:ख.  पहिले अपना से निचिला तबका के हाल देखिके लोग सुख के अनुभूति करत रहल,बाकिर अब अपना से अधिका वाला के औकात देखिके लोग दु:ख झेलत बा आ भीतरे-भीतर इरिखा के आगी में जरत-बुतात बा.

सवाल उठत बा, गांव में सुख-सुविधा बढ़ला का बादो का लोग सुखी बा?पहिले अभाव में रहलो पर आंतर के जीवंतता मनई के जिनिगी के जियतार बनवले राखत रहे.

बाकिर अब टीवी, फ्रिज, लैपटॉप, स्मार्ट फोन, बिजली, फूस-माटी का जगहा पक्का के शानदार कोठी आ किसिम-किसिम के खानपान, रहन-सहन में तरक्की के बावजूद ना त केहू के चेहरा प सुख के भाव झलकत बा आ ना सही माने में जिंदादिली से जिनिगी जीए के कवनो लच्छने लउकत बा. गांव से नोकरी-चाकरी, रोजगार-बैपार खातिर जे नगर-महानगर में जात बा, ऊ गांव के हरदम-हरदम खातिर भुला-बिसरा देत बा. शहर में केकरा फुरसत बा, जे ऊ दोसरा भा बगलगीरो का बारे में सोचो!सभे केहू बा अपने में मगन आ मस्त. उहवां त सभ किछु औपचारिक आ रस्मी बनिके रहि गइल बा. ना केहू से दोस्ती ना केहू से बैर!

एह से 'कर बँहिया बल आपनो छाड़ि विरानी आस ' के दर्शन में अकेलापन के दंश झेले के त्रासदी. बाकिर गांव के लोग त दोसरेके सुख से फिकिरंत बा. बुरबक मुअले पराया के फिकिरी! स्वामी विवेकानंद जी के अद्वैत दर्शन ई मानेला, जे दुनिया-जहान में जतना जीव बाड़न, सभ एके बाड़न, दोसर केहू हइए नइखे. एह से जब हम केहू के दुःख दे तानी, त खुद दुखी हो तानी आ जब सुख दे तानी, त अपनहूं सुख पावत बानीं. सचहूं सुख पावे खातिर सुख-खुशहाली बांटे के परेला. एही से इहो सवाल उठत बा कि आखिर अनकर सुख छीनेवाला ग॔वई बटमारन से भलमानुस लोग भला कब ले भागत रही?राहुल सांकृत्यायन के सोझ-साफ कहनाम रहे--भागऽ मत, गांव के बदलऽ!सांच सुख पावे खातिर एह पर अमल जरूरी बा.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज