भोजपुरी में पढ़ें: चलीं चलीं जा दक्षिणेश्वर मंदिर

उनुकरा तप के प्रभाव से ही आज भी दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में अनगिनत भक्त आवेले आ मां काली के दर्शन क के अपना के धन्य क देले.
उनुकरा तप के प्रभाव से ही आज भी दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में अनगिनत भक्त आवेले आ मां काली के दर्शन क के अपना के धन्य क देले.

दक्षिणेश्वर काली मंदिर श्रद्धालु लोगन के खातिर बहुत महत्व वाला मंदिर ह, ये मंदिर के बनला के कहानी भी कम रोचक ना ह. स्वामी विवेकानंद जी के गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस यही मंदिर के मुख्य पुजारी रहलन.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 21, 2020, 6:08 PM IST
  • Share this:
क्षिणेश्वर के जगत प्रसिद्ध काली मंदिर जब से बनल, तबे से आकर्षण के केंद्र बनि गइल. एकर इतिहास बड़ा रोचक बा. आईं सुरु से जानल जाउ. सन 1847 के बाति ह. ओह घरी देस के राजधानी कलकत्ता रहे. एगो बहुत धनी- मानी आ घनघोर धार्मिक जमींदार महिला रानी रासमणि बनारस जाए के प्रोग्राम बनवली. सोचली कि भगवान शिव के नगरी काशी धाम में जाके ऊ कुछु दिन पूजा- पाठ में बितइहन. मां अन्नपूर्णा के दर्शन करिहें. मां अन्नपूर्णा के प्रति उनुका मन में एगो भारी आकर्षण रहे.

त कुल 24 गो नाव तय भइल. काहें से कि नौकर- चाकर, घर- कुटुंब के कई आदमी जाए के तेयार रहे. जाए के तेयारी होखते रहे कि एक रात रानी रासमणि के सपना में मां काली अइली आ कहली कि तूं का करे बनारस जातारू. हमार मंदिर एहिजे गंगा के किनारे बना द, हम ओमें जाग्रत देवी के रूप में रहब. मां काली ई बाति एतना प्रभावशाली ढंग से कहली कि रानी रासमणि के दिल- दिमाग में स्थाई जगह बना दिहलस. गंगा के किनारे जमीन के खोज सुरू भइल.

बहुत खोजला के बाद पता चलल कि दक्षिणेश्वर में 60 बिगहा जमीन बा. दक्षिणेश्वर के चारो ओर ओह घरी घना जंगल रहे. सियार आ का जाने कतना जानवर राति भर बोल सन. खैर जवन जगह पसन परल ओकर मालिक रहले एगो अंग्रेज जेम्स हेस्टी. त सन 1847 में ई 60 बिगहा जमीन 42 हजार 500 रुपया में रानी रासमणि जेम्स हेस्टी से कीन लिहली. कुछहीं दिन बाद मंदिर बने सुरू हो गइल. तले ब्रिटिश सरकार के फैसला भइल कि रेल लाइन के एगो अउरी ब्रांच दक्षिणेश्वर हो के जाए के चाहीं.



भोजपुरी विशेष: आठवीं अनुसूची में भोजपुरी खातिर संघर्ष, संसद में ई लड़ाई कुछ रंग ले आई
रेल लाइन बिछे लागल. अंग्रेजन के काम में देरी ना होखे. रेल लाइन दक्षिणेश्वर मंदिर के लगे से बिछावे के रहे. त मंदिर के दू बीघा जमीन पर ब्रिटिश सरकार कब्जा क लिहलसि. ओही पड़ी रेल लाइन आगा गइल. अब मंदिर का लगे बांचल 58 बिगहा जमीन. सरकार के फैसला के आगा के बोली. ऊहो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ. रानी रासमणि जल्दी से एगो अद्भुत सुंदर मंदिर बनावे के इंतजाम क दिहली. नवरत्न स्टाइल (आर्किटेक्ट) में जोर- सोर से मंदिर बने लागल.

बंगाल के सबसे अच्छा वास्तुकार आ मिस्त्री के चुनाव कइल गइल. रानी रासमणि के कारिंदा मुस्तैदी से मंदिर बनवावे में लागि गइले सन. खूब मनोयोग से काम होखे लागल. तबो सात साल लागिए गइल.  आखिरकार मई 1855 में मंदिर बनि के तेयार हो गइल. मां काली के पत्थर के मूर्ति तैयार करे वाला कलाकार ब्रह्मचर्य व्रत के पालन कइलस. ऊ गंगा स्नान आ पूजा कइके काम सुरू करे. समय पर सात्विक भोजन करे आ अपना के धन्य महसूस करे.

काली मंदिर के पीछे राधा- कृष्ण मंदि बनल. काली मंदिर के पश्चिम तरफ द्वादश शिवलिंग माने 12 गो मान्य शिव स्थान के प्रतीक में उत्तर से दक्षिण के ओर एकलाइन से 12 गो शिव मंदिर के स्थापना भइल. आजुओ रउवां ओह मंदिर में जाईं तो काली जी त जाग्रत लगबे करेली, भगवान शिव जी भी जाग्रत लागेले. मंदिर में जाते राउर मये चिंता, मानसिक बोझ आ परेशानी ओतना देर खातिर गायब हो जाला. त कालीमाई के आसिरबाद से 31 मई 1855 के दिने मंदिर के उद्घाटन भइल.

अब IPL भोजपुरी में : कोरोना में किरकेट जइसे गमक बिना फूल, जानीं पहिला अउर दूसरा मैच के हाल

मंदिर के मुख्य पुजारी नियुक्त भइले रामकृष्ण परमहंस के बड़ भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय. घर रहे बांकुड़ा जिला के कामारपुकुर. कुछ दिन बाद रामकृष्ण परमहंस भी बड़ भाई का लगे रहे आ गइलन. रानी रासमणि के पति राजाचंद्र दास के मृत्यु बहुत पहिले 48 साल के उमिर में हो गइल रहे.

उद्घाटन के दिने देश भर से एक लाख ब्राह्मण देवता लो बोलावल गइल लोग. लेकिन एगो विवाद हो गइल. रानी रासमणि शूद्र जाति के रहली. त ब्राह्मण लोग कइसे अइहन आ भोजन ग्रहण करिहन. रानी रासमणि एकर समाधान मंदिर के मुख्य पुजारी रामकुमार चट्टोपाध्याय से पुछली. मुख्य पुजारी कहले कि अगर ई मंदिर कौनो ब्राह्मण के समर्पित क दिहल जाउ तो ब्राह्मण लोग खुशी से आई आ भोजन ग्रहण करी. त रानी रासमणि अपना गुरु के नाम से मंदिर के समर्पिते क दिहली. ओकरा बाद केहू के कौनो एतराज ना भइल. उड़ीसा, नवद्वीप आ काशी से अनेक विद्वान पंडित जी लो आइल. बड़े- बड़े शास्त्र ज्ञाता आ विद्वान लोगन के देख- रेख में बहुत विधि- विधान से मंदिर के उद्घाटन भइल.

एकरा साले भर बाद मुख्य पुजारी रामकुमार चट्टोपाध्याय के मृत्यु हो गइल. रानी रासमणि रामकृष्ण परमहंस के जानत रहली. उनुकर भक्ति आ भगवान के प्रति चरम आकर्षण देखि के रानी रासमणि उनुका के मंदिर के मुख्य पुजारी बना दिहली. रामकृष्ण परमहंस के बारे में प्रसिद्ध रहे कि ऊ मां काली की मूर्ति अपना देह के भीतर देखसु. मां काली जैसे उनुकरा भीतर समाइल बाड़ी. त प्रसाद चढ़ावत बेरी एगो अद्भुत काम करसु. अपना भीतर बइठल काली जी के खियावे खातिर खुदे प्रसाद खाए लागसु. मूर्ति पर फूल चढ़ावसु त अपनो कपार पर चढ़ा लेसु. ई देखि के मंदिर के मुख्य एकाउंटेंट के बहुत खराब लागल. जूठ प्रसाद काली जी के चढ़ता.

भोजपुरी भाषा में पढ़ें: फिल्मी दुनिया आ नशाखोरी के बहस थरिया में छेद कि कथी में छेद!

ऊ का जानता कि रामकृष्ण परमहंस कतना उच्च कोटि के साधक हउवन. मां काली त सचहूं उनुका भीतर रहली. मां काली आ रामकृष्ण परमहंस में कौनो अंतर ना रहे- “जानहिं तुमहिं, तुमहिं होई जाहीं”- मां काली माने रामकृष्ण परमहंस. ई भक्ति के पराकाष्ठा रहे. त मुख्य एकाउंटेंट रानी रासमणि से रामकृष्ण परमहंस के पूजा के तरीका के सिकायित (निंदा) कइलसि आ कहलसि कि एकरा पर कार्रवाई होखे के चाहीं. रानी रासमणि मंदिर में स्वयं अइली आ रामकृष्ण परमहंस के पूजा पद्धति देखली. ऊ समझि गइली कि रामकृष्ण परमहंस उच्चकोटि के महात्मा बाड़न.

उनुकर श्रद्धा रामकृष्ण परमहंस के प्रति अउरी बढ़ि गइल. ई देखि के मुख्य एकाउंटेंट लजा गइले. ऊ फेर रामकृष्ण परमहंस के सिकायित ना कइले. बाद में त रामकृष्ण परमहंस एह मंदिर परिसर में उच्चकोटि के तंत्र साधना आ वेदांत साधना कइले. उनुका तप के प्रभाव हमेशा खातिर एह मंदिर में स्थापित हो गइल बा. आजुओ एह मंदिरे के प्रताप एही से बा कि रामकृष्ण परमहंस के मां काली एहिजा कई बार दर्शन देले बाड़ी. बतियवले बाड़ी. आशीर्वाद देले बाड़ी. स्वामी विवेकानंद के अनौपचारिक दीक्षा एही जगह संपन्न भइल. एहीजा रामकृष्ण परमहंस आपन तप प्रभाव छोड़ि के गइल बाड़े.

एकरा अलावा काशीपुर में जहां उनुकर देहांत भइल ओहिजो तप के प्रभाव बा. बेलूर मठ में तप के प्रभाव बा आ अउरी कई जगह प्रभाव बा. त दक्षिणेश्वर मंदिर में एक से एक सिद्ध साधु- संत आ के ठहरल बालो, तप- साधना कइले बा लो, रामकृष्ण परमहंस के बातचीत कइले बा लो.

भोजपुरी में पढ़ें: जिनगी झंड बा, फिर भी घमंड बा

उनुकरा तप के प्रभाव से ही आज भी दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में अनगिनत भक्त आवेले आ मां काली के दर्शन क के अपना के धन्य क देले. एहीजा योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया के संस्थापक परमहंस योगानंद जी भी मां काली के साक्षात जीवंत दर्शन कइले. ऊ अपना पुस्तक “आटोबायोग्राफी ऑफ अ योगी” (हिंदी अनुवाद के नांव ह “योगी कथामृत”) में एकर उल्लेख कइले बाड़े.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज