भोजपुरी में पढ़े: बलिया के बलियाटिकपन

बलिया-जवना के क्लिष्टता आ सरलता में विलक्षण सामंजस्य बा-ठीक आचार्य रघुनाथ शर्मा के संस्कृत वांग्मय-अस दुरूह, बाकिर उन्हुका शख्सियते नियर सहज-सरल.

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  • Last Updated: October 14, 2020, 8:04 PM IST
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भोजपुरी के ए-बी-सी मानल जाला आरा-बलिया-छपरा. कहलो गइल बा- 'आरा-बलिया-छपरा--भोजपुरी के अंचरा! 'भोजपुरी माई के आंचर के लाज राखे आ मान-मरजाद में बढ़न्ती खातिर बलिया कबो पाछा नइखे रहल. बलि, भृगु, वाल्मीकि, दर्दर, सुदिष्ट आउर अनगिनत पीर आ बाबा के नांव का संगें जुड़ल बलिया. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उन्मुक्त ठहाका आउर लालित्यपूर्ण साहित्य-अस ललित बलिया. आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के संत साहित्ये नियर साधुता खातिर विख्यात बलिया.

बलिया-जवना के क्लिष्टता आ सरलता में विलक्षण सामंजस्य बा-ठीक आचार्य रघुनाथ शर्मा के संस्कृत वांग्मय-अस दुरूह, बाकिर उन्हुका शख्सियते नियर सहज-सरल. ई सहजता-सरलता ददरी, धनुषजग वगैरह सालो भर चलत रहे वाला मेलन -गंगानहान में लउकेला, कृष्णदेव उपाध्याय के लोकसाहित्य विवेचन में नजर आवेला आउर लोकपरब तेवहारन में झलकेला. ई सभ किछु इहां के विस्तृत भू-भाग में फइलल-पसरल लोकजिनिगी में पइसिके गह-गह करेला. बाकिर जब एही लोक में विद्रोह के बिगुल बाजेला, त सन् बेयालिस जइसन विस्फोटक क्रांतियन के अमरत्व मिलेला. तब मंगल पांडे, चित्तू पाण्डेय, कौशल किशोर, जयप्रकाश नारायण जइसन प्रकाश-स्तंभन के रुधिर-कथा जियतार हो उठेले आ दुर्गा प्रसाद गुप्त के क्रांति-साहित्य सभका के अचरज-रोमांच से भरि देला.

बलिया के माटी में जवन सोंधापन बा, ओकर आपन मौलिकता बा. करइट आ दोआबा के कठकरेजी माटी. एकरा में जतना ताकत चोट करे के बा, ओतने कूबत खुद पर हंसे आ सभकरा उपहास का पात्र बनहूं के बा. इहे माटी चतुरी चाचा आ विवेकी राय के विवेक के व्यापक फइलाव आ आयाम देले आउर रामविचार पाण्डेय के 'भोजपुरी रतन' के अनमोल गहनो पहिरावेले. सांचो, बेगर लाग-लपेट के कतना खांटी बिया इहां के माटी! तबे नू बलिया के आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के जब राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्तजी 'बलियाटिक' कहलन, त हाजिरजवाब द्विवेदी जी तुरुंते चिरगांव के मैथिलीशरण जी के 'चिरगंवार 'कहि दिहलन. बलिया के कबीरी ठाट के त बाते निराला ह. अरुआइल, बासी, रुखल-सूखल खाए आ ठंढा पानी पीए के बात दीगर बा, इहां के फांकामस्तियो के का कहे के बा!

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पेट में भलहीं चूहा कूदत होखे आ मुसरी दंड करत होखे, बाकिर शानो-शौकत में कवनो कमी ना आवे के चाहीं. दिल आ गइल त सउँसे दुनिया आपन--आ जदी ना त अपनो बाप-महतारी बेगाना.  बलिया के सुभाव ह अड़ल. अड़ल, त फेरु मुड़ल ना आ अगर मुड़बो कइल त फेरु कबो जुड़ल ना. एकरा के रउआ जिद कहीं भा अहम, बाकिर आन खातिर जान गंवावल बलिया के फितरत रहल बा. मारपीट, लड़ाई-झगड़ा, खून-कतल आ पुश्त-दर-पुश्त मोकदिमाबाजी बलियावासियन के इज्जत-प्रतिष्ठा के अभिन्न अंग होला. नाप-जोख के पैमाना ई कि जेकरा लगे जतने किता अधिका मोकदिमा, ऊ ओतने बड़ अदिमी!तबे नू बड़प्पन के गहिराई नापे खातिर केस-ममिला के फीता भिड़ावल जाला. रउआ भलहीं एकरा के बेवकूफी मानीं, बाकिर हम त एह के रईसी कहब. कबो बिगड़इल सांड़-अस खूंखार लउकिहें, त कबो खुद मूड़ी नवाके कहिहें--आवऽ बैल, मारऽ!



इहवां लाठी-लंठई के चरचा त खूब होत आइल बा. मोंछ खातिर किछऊ करे-करावे प उतारू हो जइहन बलिया के बलियाटिक. लौंडा के नाच देखे खातिर दस-दस कोस ले सूंघत चलि जइहन--अन्हरा भइंसा नियर. नचनियन खातिर हजार-लाख के कुरबानी त आम बात बा. बनूक के नोखी प नोट के गड्डी राखिके गोली दागि दिहल आ समियाना में फायर क के छेदे-छेद क दिहल नचदेखवा लोगन के शगल होला. लौंडा-रंडी का संगें जदी छेड़खानी आ हुड़दंगई ना भइल, त नाच का देखलऽ--ठेंगा! भला कवन माई के लाल टिकि पाई बलिया के बलियाटिकपन का सोझा!बाकिर खाली बलिया में रहला भरि से केहू बलियाटिक ना हो जाला. बलियाटिक होखे के मतलब होला--कवनो-ना-कवनो रूप में हरदम चरचा में बनल रहल. एकरा खातिर भलहीं कवनो बेवकूफ़ाना हरकते काहें ना करे के परे.

नजीर खातिर भोला बाबा नियर झुनझुना के हथियार बताके विमान अपहरन भा बेंग (भदइलवा)-अस उछल-कूद मचावत कबो एम पी, त कबो पी एम के तरजूई पर तउलाइल. कबो आशिकाना अंदाज़ में सियासती चाल चलल, त कबो कानूने दां का ओरि से कानून के शीलभंग कइल. बताईं भला, जब बलिया जिला घर बा, त कवना बात के डर बा! बलिया वाला हर भेस में, हर देस में, परदेस में, हरेक सूबा के कोना-अंतरा में अपना बलियाटिकपन का संगें मिलि जइहन. जहंवें भेंटइहन ,आपन छाप अउर लोगन पर छोड़त लउकिहन. जेनिए से होके गुजरिहन, अपना आगा-पाछा चेला-चाटी आ अनुयायियन के लेले-देले.  बलियाटिकन के सवदगर पकवान आउर भांति-भांति के लजीज व्यंजन से ना, बलुक सातू आ फुटेहरी (लिट्टी)-चोखा से मोहब्बत बा.

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उन्हुकरा अपनन से ना, परायन से अपनापन बा. ऊ पहिले अपना महतारी आ महतारी भासा के उपेक्षा करिहन, फेरु लमहर अरसा के बिछुड़न का बाद जब कतहीं अपमानित आ जलील होइहन, त अपना माई मातृभाषा का ओरि लवटिहन. महतारी भासा के सीढ़ी-अस इस्तेमाल क के ओकरा अस्तित्वे के मटियामेट क ऽ दिहल चहिंहन.  तबे नू सदियन से शोषित, उत्पीड़ित,उपेक्षित आ प्रताड़ित रहल बा बलिया. हालांकि इहां के माटी में फरल-फुलाइल एक से बढ़िके एक लाल अपना चमक-दमक से देस-दुनिया के रोशनी दिहलन, बाकिर इहवां के हाल हरमेसा बदहाले रहल. कतना निरीह आ बेबस बिया बलिया के बदहाल जिनिगी!बाकिर तबो कतना प्रतिभावान, जुझारू आ जीवटवाला बाड़न--नगर-महानगरन में छिछिआत, देस-विदेस में आपन धाक जमावत बलिया के बलियाटिक!

अपना लोकशक्ति आ आत्ममुग्ध रोमानियत से भरल-पुरल सचहूं कतना निश्छल आ जियतार बा बलिया के बलियाटिकपन!तबे नू केहू के 'बलमा' बलिये में हेरा जालन आ केहू के कवनो हरकत से सउँसे बलिया जिला हिले लागेला!इहे नू ह ऽ बलिया के बलियाटिकपन!
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