भोजपुरी में पढ़ें: खांटी भोजपुरी के लोगन से ही ए भाषा के कल्यान होई

भोजपुरी के नाम आवते बहुत से लोग अश्लीलत के चर्चा शुरू कर देला, लेकिन लक्ष्मण शाहाबादी जी एगो अइसन लेखक बानीं कि उनकर लिखल -“गंगा आबाद रखिहs सजनवा के.” गीत के 8 लाख 55 हजार ऑडियो कैसट बिकल रहे. एहसे पता चलेला कि साफ सुथरा गीत भोजपुरी में खूब पसंद कइल जाला.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 30, 2020, 4:05 PM IST
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फेर कहाँ बनल ओइसन भोजपुरी फिल्म ? काहे ना बनल ? लोग कहे कि उ लिख दिहें आ धुन बना दिहें त हिट हो जाई आ हिट हो जाव. हिट होखे के गारंटी रहलें उ. उ माने के ?

ई त भोजपुरी सिनेमा के रोटी तूरे वाला लोग भी ना जाने. भोजपुरी के टीवी चैनल पर रात दिन उनकर गाना बजा के, चला के टीआरपी आ माल बटोरे वाला भी ना जाने. काहे कि उ भोजपुरी माटी में जनमलें, ओकरे गीत-गंध के साथे जियलें आ खाँटी माटी के मन-मिजाज भोजपुरी सिनेमा के गीत-संगीत में भर के महज तिरपने साल में निकल लेलें.

हिंदी से भोजपुरी में आइल रहतें त लोग जरुर जानित. जानित ना पूजित. हिंदी के बड़ा स्टार भोजपुरी में छींकियो देला त उ ब्रेकिंग न्यूज होला. स्टार सिनेमा के होखे भा राजनीति के. एक बेर पी. चिदंबरम कहलें कि ‘हम रउरा सभ के भावना समुझत बानी’. ई हेडलाइन बन गइल. अखबार के पन्ना रंगा गइल. भोजपुरिया लोग के बुझाइल जे काल्हे भोजपुरी आठवीं अनुसूची में आ जाई. सभे गच्च रहे... बाकिर आज ले झुनझुना बजावता.



एही तरे भोजपुरी सिनेमा के एह दौर ( 2001 के बाद वाला ) में अमिताभ बच्चन, दिलीप कुमार, सुभाष घई, अजय देवगन, सायरा बानो, जी. पी. सिप्पी, रमेश सिप्पी, भाग्यश्री, प्रियंका चोपड़ा, कॉन्टिलो फिल्म्स, महिंद्रा एन्ड महिंद्रा के अइला के बाद लोग कहल कि भोजपुरी सिनेमा त आकाश ध ली. … बाकिर पाताल में घुस गइल भोजपुरी सिनेमा. रसातल में चल गइल. हिंदी वाला के भोजपुरी में अइला पर भोजपुरी वाला खूब थपरी पीटे ला लोग. भोजपुरी वाला भोजपुरी खातिर जिनिगी दे देव, जान दे देव तबो ओकर पूछ ना होला, मान ना मिलेला, पहचान ना मिलेला, बड़ा कैनवास ना मिलेला, मिडिया ना पूछेला. अइसन ढेर उदहारण बा.
एही महिना में 24 सितम्बर के अचीवर्स जंक्शन पर भोजपुरी साहित्य के प्राण आचार्य पाण्डेय कपिल जी के जयंती समारोह मनावन गइल बा. फूलसूंघी जइसन कालजयी उपन्यास लिखे वाला, भोजपुरी साहित्य के एह युग के निर्माण करे वाला आचार्य पाण्डेय कपिल के केतना लोग जानsता ? ना जानी. काहे कि उ शुरुवे में हिंदी छोड़ के भोजपुरी में उतरलें आ अपना के भोजपुरी में झोंक देलें. भोजपुरी में अपना के झोंके वाला के लोग ना जाने. हिंदी में जमला, चमकला के बाद भोजपुरी में झाँकियो देला प शोर हो जाला. नाम हो जाला.

कुछ लोग त हिंदी-अंग्रेजी से आके भोजपुरी में कुछ करेला त अइसन जतावेला जइसे उ भोजपुरी पर एहसान करsता.

बाकिर इतिहास साक्षी बा कि जे समर्पित भाव से, श्रद्धा से, अपना जिम्मेवारी आ जबाबदेही के साथे आइल ओकरा के सर-माथा प लिहल गइल. शैलेन्द्र, मजरुह, नौशाद, अंजान हिंदी के स्थापित नाम, जब भोजपुरी में उतरल लोग त अपना जिम्मेवारी आ जबाबदेही के साथे, समर्पण के साथे. एही से ओह लोग के नाम आजो ईज्जत से लियाला. एह घरी उ सम्मान अनुभव सिन्हा आ मनोज वाजपेयी के मिलता. बाकिर ई सिलसिला जारी रखे के पड़ी.

खैर, हम दोसर बात कहत रहनी ह. उ ई कि हिंदी से भोजपुरी में अइला पर ढेर मान मिलेला. लोग ईयाद रखेला. खाली भोजपुरिये में अपना के झोंक देला प आदमी झोंकाइये जाला. लोग ना चीन्हे.

यकीन मानी अगर शैलेन्द्र आ मजरुह हिंदी में स्थापित ना रहितें त भोजपुरी में जवन गनवा लिखले बा लोग, जवना के लेके लोग सीना चौड़ा करेला, स्वाभिमान के गीत गावेला ... ओकरा के लेके उनका नाम के साथे लोग अइसे ना उतराइत. बलुक हो सकेला गाना ईयाद रहित बाकिर ओह लोग के नाम ना ईयाद रहित. जइसे उनका साथे होता.

उनका माने के ? उ के?

उहे, जेकरा बहाने हतना कथा हो गइल. उनकर गीतवा शैलेन्द्र आ मजरुह साहेब से कवनो कमजोर नइखे आ ना हीं उनका गीतन के लोकप्रिय होखे भा सुपरहीट होखे में कवनो कमी रहल. सबका जुबानो प बा. नचनियो गावेलन स. टीवीयो प चलता तबो उनका के लोग नइखे जानत.

एगो बात आउर अश्लील गाना के टीआरपी बढ़ावे वाला के बात त छोड़ी अश्लीलता के विरोध करे वाला भी उनका के नइखे जानत जबकि उनका गाना में कहीं अश्लीलता नइखे. जे कहsता कि बिना अश्लीलता के गाना ना चली, फिलिम ना चली ओकरा मुंह पर अपना गीतन से जोरदार तमाचा मारत बाड़न उ, तबो लोग उनका के नइखे जानत. जे अपना गीत-संगीत से भोजपुरी सिनेमा के सोनहला दौर गढ़ल, जे दू दर्जन से बेसी सुपरहिट फिल्म दीहल, उनका के लोग नइखे जानत.

उ के ? हाय रे, भोजपुरी के होके भोजपुरी में काम करे वाला के दुर्भाग्य.

उ रहलें गीतकार-संगीतकार-संवाद लेखक लक्ष्मण शाहाबादी.

शिवगंज, आरा के रहनिहार, 16 मई 1938, में जनमल लक्ष्मण प्रसाद श्रीवास्तव उर्फ लक्ष्मण शाहाबादी. इहाँ के दीहल गीत आ संगीत ना खाली भोजपुरिहा लोग अपितु दोसरा भाषा के भोजपुरी प्रेमी लोग भी अक्सर गुनगुनात रहेला. इहाँ के गीत-संगीत आ संवाद के वजह से कई दर्जन फिल्म सुपर-डुपर हीट भइल. कुछ फिल्म में इहां के सिर्फ गीत लिखले बानी, कुछ में गीत आ संवाद दुनो. कुछ में गीत आ संगीत दुनो देले बानी आ कुछ में गीत-संगीत के साथे संवाद लेखन भी कइले बानी. शाहाबादी जी के कुछ प्रमुख फिल्म बा –

गीत-संवाद - धरती मईया, गंगा किनारे मोरा गाँव

गीत-संगीत-संवाद- दूल्हा गंगा पार के, छोटकी बहू'

गीत-संगीत- ‘दगाबाज बलमा’, हमार दूल्हा, 'गंगा-ज्वाला', 'बेटी उधार के', 'गंगा आबाद रखिहऽ सजनवा के', 'राम जइसन भइया हमार',

गीत - सजाई द मांग हमार, पिया निर्मोहिया, गंगा सरजू, भैया दूज, पिया परदेसिया

बिहार सरकार के सिंचाई विभाग में अकॉउंटेंट रहनी लक्ष्मण शाहबादी जी बाकिर जब फिल्म में मामला जमे लागल त लिभ विदाउट पे लेके पूरा समर्पित होके फिल्म में काम करे लगनी. गीतकार-संगीतकार के रूप में स्थापित हो गइनी त फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी उतरनी.  चर्चित कथाकार मधुकर सिंह के कहानी पर फिल्म बनल दूल्हा गंगा पार के. एह फिल्म के निर्मात्री रानीश्री लक्ष्मण शाहबादी जी के धर्मपत्नी हईं. दूल्हा गंगा पार के फिल्म के संवाद, गीत, संगीत सब शाहाबादी जी के ह. 1986 में बनल उनइस गो फिलिम में से सबसे सफल फिल्म साबित भइल रहे दूल्हा गंगा पार के. एह फिल्म के गीत, “बोल बम के नारा बा, इहे एक सहारा बा”  चाहे ” स्वागत में गारी सुनाई जा, चलs सखी मिलके, केकरा ईयाद नइखे.

लक्ष्मण शाहाबादी जी के बेटा अमरेश शाहाबादी जे कि खुद संगीतकार बाड़न, हमरा से बातचीत में बतवलें कि " संगीत के प्रतिभा बाबूजी के विरासत में मिलल रहे. हमार बाबा रामलाला प्रसाद खुदे एगो कुशल सितार वादक रहलें, त राग रागिनी त बाबूजी के लोरी में मिलल रहे. जवना उमिर में लइका गिल्ली डंडा खेलsसन बाबूजी अनेक वाद्ययंत्र से खेली." आगे अमरेश इहो बतवले कि बाबूजी 13-14 साल के उम्र से ही स्टेज शो करे लागल रहीं. ”दियरा के बाती अइसन जइसन जरे के पड़ी” जइसन गाना त स्टेज परफॉर्मेंस के दौरान ही प्रसिद्ध हो गइल रहे. बाबूजी के गाना के पहिला रेकॉर्डिंग एच एम वी कंपनी द्वारा मोहम्मद रफी साहब के आवाज में भइल रहे, गाना के बोल रहे ”कह के भी न आये मुलाकात को”.

सुप्रसिद्ध संगीतकार ‘चित्रगुप्त’ जी के साथ भी लक्ष्मण जी के जोड़ी खूब जमल. गंगा किनारे मोरा गांव आ धरती मईया एही जोड़ी के कमाल के नाम ह. लक्ष्मण शाहाबादी के लिखल धरती मईया के गीत ‘जल्दी जल्दी चलू रे कहँरा’, केहू लुटेरा केहू चोर हो जाला’, ‘ जाने कइसन जादू कइलू, मन्तर दीहलू मार’, चाहे गंगा किनारे मोरा गांव के गीत, जइसे रोज आवेलू तू टेर सुन के,  मेला में सइयां भुलाइल हमार, दे द पीरितिया उधार धरम होई, भीजे रे चुनरी भीजे रे चोली भीजे बदनवा ना आ चाहे जिआ द सइयां चाहे मुआ द, तहरे भरोसे बानी किरिया खिआ ल, ओह घरी गांव-गांव, गली-गली गूंजे.

किरिया खिआ ल गीत के त एगो अलगे कहानी बा. भोजपुरी सिनेमा के तब के सुपरस्टार आ  गंगा किनारे मोरा गांव के हीरो कुणाल सिंह एगो साक्षात्कार में हमरा के बतवलें कि ओह फिल्म के सेट पर निर्देशक दिलीप बोस एक तसला खीर बनवा लेलें अउर गाना के शूटिंग के समय फिल्म के हीरोइन गौरी खुराना से कहलें कि तुम कुणाल जी को खीर खिलाओ. गीतकार लक्ष्मण शाहाबादी भौचक्का. कहलें दादा खीर क्यों खिलवा रहे हैं ?

दिलीप बोस कहलें कि आप हीं ने तो लिखा है कि खिरिया खिआ ल. तो खीर खिलवा रहा हूँ.  लक्ष्मण जी आपन माथा ठोकत कहलें दादा खिरिया नहीं, किरिया, किरिया. किरिया माने कसम. चाहे जिआ द सइयां चाहे मुआ द, तहरे भरोसे बानी किरिया खिआ ल. सेट पर बड़ी ठहाका लागल.

लक्ष्मण जी के फिलिम महीनों महीनो चलत रहे. अमरेश शाहाबादी बतवलें कि, ' बाबूजी के गीत के प्रसिद्धि के आलम ई रहे कि इनकर एगो फ़िल्म “गंगा आबाद रखिहs सजनवा के” के  ऑडियो कैसेट ओह समय बिक्री के कीर्तमान स्थापित कइलस, 8 लाख 55 हज़ार,जवन कि आज तक अपना आप में नायाब बा.

दरअसल लक्ष्मण जी के गीत पूरा परिवार एक साथे सुनत-देखत रहे काहे कि ओह गीतन में संस्कार, परिवार, श्रृंगार सब परिवार के साथे बइठ के देखे लायक रहे. ओह समय के लिखल उनकर गारी गीत, “ स्वागत में गारी सुनाईं जा ” आजो माड़ो में गूँजेला. साहित्य आ सिनेमा के बीच संतुलन के नाम ह लक्ष्मण शाहाबादी. उनकर श्रृंगार गीत भी कमाल के होत रहे, “चांद जइसे चमके तोहार देहिया” चाहे अलका याग्निक के आवाज़ में,“ अइसे जन रूपवा निहार ए सजन हमरा लाज लागेला” में केतना सलीका से बात कहाइल बा.

भैया दूज’ के गीत ‘कहंवा गइल लरिकइयां हो, तनी हमके बता द’ चाहे ‘एही फागुन में कई द बियाह बुढ़ऊ’ केतना लोकप्रिय भइल रहे. चाहे ‘दुलहा गंगा पार के’ के टाइटल गीत ‘काहे जिया दुखवलs, चल दिहलs मोहे बिसार के / अतना बता द ए दुलहा गंगा पार के’ आहा, आहा लइकिया गुनगुनाते रहs स.

अमरेश जी बतवलें कि बाबूजी अपना नाम के आगे शाहाबादी तखल्लुस पंडित जवाहर लाल नेहरू के कहला पर लगवलें.

19 दिसम्बर 1991 के भोजपुरी संगीत के ई सितारा धरती छोड़ के आकाश में टिमटिमाये लगलें लेकिन उनका गीत-संगीत से आज भी रौशन बा भोजपुरी सिनेमा के संसार. ई अलग बात बा कि आम आदमी त दूर भोजपुरी सिनेमा के रोटी तूड़े वाला आ ओह से आपन जिंदगी चमकावे वाला अधिकांश कलाकार लक्ष्मण शाहाबादी के नामो नइखन जानत, उनका नाम पर कुछ कइल त दूर के बात बा. केहू उनका खातिर भा उनका नाम पर कुछ ना कइल, उनकर आपन कहाये वाला लोग भी. तब हमरा उनके लिखल गीत ईयाद आ गइल,

"कहे के तs सभे केहू आपन, आपन कहाये वाला के बा."

एह त के जिक्र एह दौर के सबसे बड़ कवि ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित केदार नाथ सिंह हमरा से भोजपुरी सिनेमा पर लीहल गइल साक्षात्कार में कइनी. इहे एह गीत के ताकत बा आ मास से क्लास तक के यात्रा बा अउर साँच पूछीं त इहे लक्ष्मण शाहाबादी जी के असली कमाई बा. ( लेखक मनोज भावुक भोजपुरी सिनेमा के इतिहासकार हैं.)
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