भोजपुरी विशेष: महामारी में चुनावी महाभारत- तेल देखीं आ तेल के धार देखीं

जब कबो चुनाव आवेला, त अइसन लागेला जइसे बेमौसमी फागुन आ गइल होखे आ नवकी कनिया नियर जनता का संगें बुढ़ऊ राजनेता के देवर-भउजाई के रोमानी नेह-नाता कायम हो गइल होखे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 12, 2020, 9:35 PM IST
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खिर छिड़िए गइल कोरोना काल में चुनावी महाभारत.ई तय कइल बहुते कठिन बा कि के पांडव आ के कौरव? एह बीच 'बंबई में का बा ' का बहाना से जब बिहार के गुन गवाए लागल, त ओकर तोड़ो निकलि गइल--'बिहार में का बा'? जवाब ई बा कि बिहार में चुनाव बा. कोरोना से जंग चलते रहे कि बिहार में बेसम्हार बरसात आ फेरु बाढ़ आ गइल. एह जंग से दू-दू हाथ करत कहीं कि अब चुनावी जंग. बरसाती मौसम में चुनाव करावे के एगो लाभ ई होला कि सफेदपोशन के एक-दोसरा प कीचड़ उछाले खातिर कीच का खोज में फटीचर-अस सूरत ना बनावे के परे. ओइसे कीचड़ बेगर कमल खिले के बातो नइखे सोचल जा सकत. माफ करबि, हम कुदरती कमल के बात करत बानीं, कवनो दल के चुनाव-चिन्ह वाला कमल के ना.


जब कबो चुनाव आवेला, त अइसन लागेला जइसे बेमौसमी फागुन आ गइल होखे आ नवकी कनिया नियर जनता का संगें बुढ़ऊ राजनेता के देवर-भउजाई के रोमानी नेह-नाता कायम हो गइल होखे भा भोली-भाली गाय जइसन जनता के हरियरी देखाके लोभावे के दिन आ गइल होखे. दरअसल चुनाव आ फागुन में कई गो समानता होला. फागुन भर कीचड़ उछाले के पूरा छूट रहेला आ चुनावो भर. हुड़दंग का बेगर ना फागुन सोहाला, ना चुनाव. फगुओ में नवही लोगन के बोलबाला रहेला आ चुनावो में. एगो में अबीर-गुलाल पोताइल रंग बिरंग के थोबड़ा, त दोसरा में रंग बिरंग के झंडा, पताका, बैनर, पोस्टर. एगो में कबीरा आ जोगीरा के धूम, त दोसरका में एक से बढ़िके एक धराऊं आ भड़काऊ नारा के अहमियत.


दूनों मोका प दोसरा के मुंह पर करिखा पोते आ अपना मुंह पर के कारिख धोवेके पूरा छूट रहेला. एक-दोसरा के मखौल उड़ावत अजीबोगरीब उपाधि, नीमन-बाउर गारी होरिओ में दियाला आ चुनावो में. होरी खेले आ चुनाव लड़ेवालन के हुलिया देखते बनेला. चुनाव ले वोटर के बात के बुरा ना मानल जाला आ फगुओ में तींत बतकही आ गारी फजीहत के हंसिए ठिठोली बूझल जाला. फागुन भर बुढ़ऊ जवना कनिया के लारटपकाऊ निगाह से ताकेलन आ कनियो बूढ़ से देवर नियर मसखरी करेली स--फागुन भर बुढ़वा देवर लागे! चुनाव भर हमनीं के मसीहा हमनीं गरीब-गुरबा के आपन भगवान मानिके 'त्वमेव माता च पिता त्वमेव' के अखंड जाप करेलन आ हमनीं के फूलिके कुप्पा हो जानीं जा.


चुनाव का बाद त बस इयादिए रहि जाई--ऊ दिन कतना सुन्नर रहुए! जदी बारहों महीना अइसने माहौल रहित, त बीसो अंगुरी घीव में रहित आ कपार कराही में! रउआ मने मन कोसत होखबि कि ई कमबखत कवना जबाना के चुनाव आ फागुन के बेसिरपैर के बात क के समय जाया करत बा! सांचो ऊ जबाना लदि गइल.अब त होरी आ चुनाव के चरचा चलते हंसी ठीक ओइसहीं गायब हो जाला, जइसे गदहा के माथ पर से सींग. फेरु त दिल में दहसत के थरथराहट आ मातमी धुन गूंजे लागेली स. चुनाव में अब या त बुलेट से बैलेट हासिल कइल जाला भा थैली से. थैली करेंसी नोटो के हो सकेला भा देसी ठर्रा के पाउचो के. लोकतंत्र के पहरुआ लोकतंत्र के मखौल उड़ावे खातिर अधिकृत बाड़न.


सोझ-सांच गौमाता जनता वादा-आश्वासन के हरियरी खाके पगुरात रहो आ अपना गोबर से जनतंतर के पवित्तर करत रहो.रहनुमा भ्रष्टाचार के शिष्टाचार में बदलि देले बाड़न. अब जे भरभस्ट बा, उहे विशिष्ट बा आ जे विशिष्ट बा, ऊ भला अशिष्ट कइसे हो सकेला! अब रंग बरिसावे के ना, बलुक नंग बरिसावे के माने होला होरी आ चुनाव. नंग माने नंगापन.लंगटई, थेथरई. फलाना के वोट दिहल मंजूर बा आ कि छव इंच छोट करावल? ई लंगटई टीवी चैनलो बरिसावत बाड़न स समाजो बरिसा रहल बा आ पच्छिमी देसो से आयातित होके झमाझम बरखा होत बा.तबे नू कर्मसंस्कृति का जगहा काम-संस्कृति के नायाब परिपाटी परवान चढ़त बिया. का बरसात, का गरमी, का जाड़ा--अब त सालो भर फगुवा मनावल जात बा.


पानी आ रंग--दूनों महंग बा एह देस में. एही से खून के होरी खेलल जात बा.रंग का जगहा नंग के अंगीकार करत अपहरन, लूट, शीलहरन जइसन रसीला-रोमांचक खेल चरचा में बाड़न स. भारत के खोज करेवाला के वंशज 'चोली के पीछे ''चुनरी के नीचे ' के खोज में जीव-जान से लवसान बाड़न आ मउज-मस्ती के जिनिगी-जवानी के मकसद बनाके सुरा, नील फिलिम, विदेसी संगीत, अय्याशी आउर देह के सरसता में मदहोश होके देसी संस्कृति के गुनगान में लवसान बाड़न. कोरोना काल के ई चुनावी जंग बेमिसाल होई.अबहीं त तेल देखीं आ तेल के धार देखीं.चुनावी जंग में ना जाने कतने बेगुनाहन के कद छव इंच छोट हो जाई.जनता एक हाली फेरु गजरा-मुरई बनी.


ना जाने, कतनन प कोरोना के कहर आ बिजुरी गिरी.खून के होरी खेले के सिलसिला त शुरू हो चुकल बा.एक बेरि फेरु बलि के बकरा बनिहन चुनावी डिउटी प तैनात मुलाजिम.दोसरा ओरि चुनावी जसन मनावे के होड़ लागी.फेरु सरकार बनावे खातिर महाभारत होई.चुनाव के सियासी जंग जारी बा.आगा-आगा देखीं, का होत बा?खुदा खैर करसु!

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