भोजपुरी में पढ़ें - दशहरा पर रामराज के लेके गांधी जी लंदन में का विचार रखले रहनीं, जानीं

दशहरा के मौका पर एक बार लंदन में गांधी जी रामराज के चर्चा कइले रहनी अउरी साफ क देले रहनी कि मकसद के संगे साधन भी पवित्र होके के चाहीं. लंदन में एक बार दशहरा के अवसर पर बापू आपन विचार रखले रहलीं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 25, 2020, 6:38 PM IST
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भारतीय सभ्यता अवुर यूरोपीय सभ्यता के समझ के मामले में गहरा अंतर बा.योरुपीय सभय्ता के मूल में हिंसा,आतंक, बलप्रयोग, खूनी क्रन्ति के लक्ष्य हासिल करें खातिर जायज ठहरावाल गइल बा. जबकि गांधीजी भारत के आजादी के लक्ष्य के हासिल करे खातिर एह उपायन बाधक मानत रहनी. कहत रहनी एह उपाय से हासिल तबे तक टिक सकेला, जबतक भय कायम रही. गांधीजी आ सावरकर के बीच एह विषयन पर लंदन से भारत में भइल तीन भेंट आ बातचीत से दुनो जाना के मतभेद आ उद्देश्य में फर्क के समझल जा सकेला. खासकर साधान, साध्य के पवित्रता के लेकर. गांधीजी के लिए साधन साध्य के बीच ऊहें सम्बध बा बीज आ पेड़ के बीच बा. जबकि सावरकर के यहां लक्ष्य पावें सब कुछ जायज बा. सावरकर और उनकी टोली ने कर्नल वायली से लेकर जिला मजिस्ट्रेट जैकसन् की जो भी हत्या कइल भारत में अंग्रेजन के ज्यादती के विरुध बदले की भावना अवुर गुस्से के इजहार करे खातिर कइल. इहे दावा सावरकर आ उनकर टोली करेला. सावरकर के सिखावन पर नाथूराम गोडसे बतावत बाड़े कि बदले भावना भी कभी कभी ओतने आध्यत्मिक आ स्वाभाविक होला,जतना दया की भावना.

कहे के न चाही कि दया, करुणा, क्षमा, प्रेम, शत्रुओं के बीच जाकर बातचीत की गुंजाइश की तलाश अवुर सहमति की कोशिश गांधीजी के जीवन मे शुरुआती दौर से अन्त तक जारी रहें. एहि कोशिश में 24 अक्टूबर 1909 में  महात्मा गांधी और विनायक दामोदर सावरकर की भेंट लंदन में होत बा. जब दुनो जाना रामराज्य पर चर्चा के बहाने भारत के आजादी के संदर्भ में आपन भावी रणनीति के ऐलान करत ब लोग. आपस में वैचारिक रूप से एक दूसरा के घोर बिरोधी मोहनदास करमचंद गांधी आ विनायक दामोदर राव सावरकर के ई दुसरका मुलाकात  लंदन के इंडिया हाउस में 24 अक्टूबर सन् 1909 को आज से ठीक 121 साल पहिले  दशहरा के दिन इंडिया हाउस  में होत बा. एह मुलाकात के शर्त ई तय भईल कि दशहरा के अवसर पर बने वाला भोजन शाकाहारी होखे चाही आ राजनीतिक विषय पर कवनों चर्चा ना होई. गांधीजी लन्दन जाए के पहिले अपना परिवार, आ विरादरी से वादा कर चुकल रहनी कि विदेश प्रवास के दौरान तीन चीजन से परहेज करेके बा. मदिरा, मांस अवुर परस्त्री गमन. अपना देश में पुरनिया लोगन के ई विश्वास रहें कि समुद्र पार यात्रा कइला से आदमी के धर्म के नाश हो जाला.



एहि खातिर गांधीजी के पुरनिया एक तरह से उहा के किरिया धराके विदेश पढ़े के भेजले रहें. गांधीजी अपना बचन के निभावे खातिर इंडिया हाउस में ओह दिन ओयोजित समारोह में शाकाहारी भोजन के शर्त रखली. राजनीति के अलावा और कवनों विषय पर चरचा के प्रस्ताव कइली. एकरा पहिले गांधीजी के सावरकर से मुलाकात 1906 में लंदन में हो  चुकल रहें. जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका के काम के सिलसिला में लंदन गइल रहनी. उहा भारत के पढ़ेवाला नौजवानं पर सावरकर के भारत के आजादी खातिर हिंसक क्रांतिकारी विचारधारा के असर के भी नजदीक से महसूस कइले रहनी. तब तक दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी के सत्य अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह  के प्रयोग अपना मुकाम तक धीरे धीरे बढ़त रहें. एकरा ठीक विपरीत विचारधारा सावरकर आ उनकर टोली के रहें. ओ लोगन के हिंसा आ फुटकर ह्त्या पर भरोसा रहें. अपना उद्देश्य के पूरा करे खातिर सन् 1899 में बी डी सावरकर आ उनकर भाई गणेश सावरकर मिली के नाशिक में क्रांतिकारियों के गुप्त संगठन मित्र मेला के आयोजन कइले. बाद में सन्1904 में महाराष्ट्र के कई कस्बा के लगभग 200 नौजवानं  के जुटान में मित्र मेला के नाम बदली के अभिनव भरत हो गइल.
जब 1906 में बी डी सावरकर कानून के पढ़ाई करें लंदन गइले, तब उनका संगे अइसने नौजवानं के पूरी फौज  लंदन पहुंच गइल. उहा भी ये लोगन के क्रांतिकारी आंदोलन वइसे जारी रहें. एहि आंदोलन के नतीजा रहें कि 1 जुलाई 1909 के एक शाम जब इंडियन नेशनल एसोसिएशन के एक जलसा में भारत सचिव के राजनीतिक सलाहकार कर्नल विलियम हट कर्जन वायली अपना पत्नी के साथ पहुंचलें, तब मदनलाल धींगरा उनका के गोली मारके उनकर हत्या कर देहलन. एह हत्या के आरोप में 17 अगस्त 1909 में मदनलाल धींगरा के 23 साल के उमर में फाँसी दे दिहल गइल. मदनलाल धींगरा मेकेनिकल इंजीनियरिंग के पढ़ाई करें लंदन गईल रहलन. उहा जाके बी डी सावरकर के संपर्क में आ गइल रहलन. धींगरा के परिवार अंग्रेजन के वफादार रहें. मदनलाल धींगरा कर्नल वायली के ठीक से जानत रहलन आ उनकरा संपर्क में भी रहलन. कहल ई जाला की सावरकर उनका के अभिनव भारत के सदस्य बनवले रहलें, आ ई मारेवाला टारगेट सौंपले रहलन. ई हिदायत के साथ कि अबकी टारगेट चुकी जाइ तब हमराके मुंह मत देखइह.एही पृष्ठभूमि में गांधीजी आ सावरकर के मिलन होत बा 24 अक्टूबर1909 में दशहरा के दिन इंडिया हाउस में.

जब 23 साल के नौजवान मदनलाल धींगरा के फाँसी के अनुगूंज बिल्कुल ताजा रहें. एह फाँसी के बाबत गांधीजी इंग्लैंड में ही ई सार्वजनिक बयान देनी कि हमरा विचार से धींगरा उन्माद में आके ई हत्या कइले बाड़न. नशा खाली शराब आ भांग के ना होखे. उतेजक विचार के भी नशा  होला. श्री धींगरा अइसने नशा में गांधीजी आगे कहत बानी कि अगर अइसन हत्या से अंग्रेज देश छोड़कर चल भी जासु, तब ओ लोगन के जगह पर केकर राज होई? गांधीजी जवाब देत बानी कि राज तब हतायरने के होई. अइसन राज से भारत के भलाई नइखे हो सकत, हत्यारा गोर होखे चाहे काला.दशहरा के अवसर पर सावरकर के कहला पर उनकर अनुयायी लोग इंडिया हाउस लंदन में दशहरा समारोह आयोजित कइले रहें. भोज खातिर गांधीजी के शर्त के मुताबिक़ शाकाहारी भोजन तैयार होत रहें. सभा के बहुत पहिले उहा पढ़े वाला विद्यार्थी लोगन के संगे गांधीजी बैईठ के आलू वैगरह छिलत बानी. सब कुछ  दशहरा के उत्सव के मुताबिक ख़ुशी ख़ुशी माहौल में हो रहल बा. सभा में पहिले गांधीजी के बोले के अवसर दिहल जाता. जइसन मान्यता बा दशहरा के असत्य, अन्याय के ऊपर सत्य, न्याय के जीत के रूप में मनावल जाला.

गांधीजी के धार्मिक चिंतन पर गीता, तुलसी कृत रामचरित मानस,भक्त कवि नरसी मेहता श्री राजचंद्रजी के असर रहें. उ सभा में गांधीजी आ सावरकर दुनो जाना शर्त के मुताबिक राजनीति पर चर्चा के बिना भारत में रामराज के बाबत अपना भावी रणनीति के चर्चा करत बा लोग. सभा में पहिले गांधीजी बोलत बानी. रामायण के हवाले से कहत बानी कि ई अइसन ग्रन्थ बा जवन सचाई खातिर कष्ट सहे के सीख देला. सचाई खातिर रामजी के बनवास भइल. सीताजी रावण के कैद में रही के पवित्रता आ सहनशीलता के परिचय दिहली. भाई के रूप में लक्ष्मण के जंगल में कष्ट आ तपस्या अपने आप में एगो नजीर बा. गांधीजी ई परतोख देके बतावत बानी कि सचाई खातिर अइसने  त्याग, तपस्या भारत के आजादी दिला सकेला. ई निश्चित बा कि झूठ पर सच्चाई के विजय होइ. गांधीजी इहो बतावत बानी कि भारत के आजादी  खातिर अहिंसा के रास्ता अपने आप  में साधन ना साध्य यानी धेय्य ह जवन हमनी के स्वतंत्र करेला. दे खे वाला बात ई बा कि रामायण के एहि कथा के आपन उद्देश्य साफ करे खातिर सावरकर कइसे इस्तेमाल करत बानी. बतावत बाड़न की रावण जे दमन, अन्याय के प्रतीक  रहें, ओकर बध के बादे रामराज के स्थापना हो सकेला.

दुष्टता के नाश दुष्ट के विनाश से ही संभव बा. सावरकर दुर्गा की प्रशंसा कइले आ बतवले कि दुष्ट के खत्म कइल जरूरी बा. सावरकर के नजर में भारत के आजादी के  लड़ाई में दुष्ट रावण के मारल जरूरी लागत रहें.गांधीजी आजादी के लड़ाई के बहाने भारत के मूल स्वभाव के मुताबिक भारतीय सभ्यता के उद्धार कइल चाहत रहनी.यूरोपीय सभ्यता जेकरा के गांधीजी शैतानी सभ्यता कहत रहनी के बरक्स भारतीय सभ्यता के मूल स्वरूप में स्थापित कइल चाहत रहनी. एह सभ्यता के आदर्श रामराज्य के शासन होला. धरमबुद्धि से नियंत्रित, लोकलाज  से मर्यादित न्यायशील विवेक पर आधारित ब्यवस्था.जहां पर सबल, निर्बल सबके एक समान अधिकार होखे. खाली बल के बूते बलवान लोगन के निर्बलन पर शासन करेके स्वाभाविक  अधिकार ना होखे.बल्कि राजा ई समझे कि प्रजा से जवन अधिकार प्राप्त भइल बा ओकर  हम संरक्षक मात्र बानी. हमरा ऊपर भी कवनों दैवी नियंतरण बा.भारतीय सभ्यता के ये मूल्यन के आलोक में गांधीजी के दृष्टिकोण, आ रामराज्य के आदर्श के स्वरूप साकार भइल रहें.जवना से दूर दूर तक कवनों संबंध सावरकर आ उनका टोली के ना रहें.

भारत के अधिकतर क्रांतिकारी लोगन के सोच इटली, जर्मनी, जापान और अमेरिका के अराजकतावादियन से प्रेरित रहें.देशज ना रहें.एकर संभावना आ सफलता भारत के आजादी दिलावे के संदर्भ गांधीजी के नजर में संदिग्ध रहें. तब 40 वर्षीय गांधीजी ओह समय 26वर्षीय सावरकर के कवनों प्रकार से सहमत करावे में कामयाब ना भईली. लंदन में दक्षिण अफ्रीका के मिशन पूरा करके वापस लौट गइनी.एह वापसी यात्रा में 13 नवंबर1909 से 23नवंबर के बीच हिन्द स्वराज जइसन दुर्लभ ग्रंथ के रचना के  संयोग बनल. ई ग्रन्थ आगे चली के भारत के आजादी के घोषणा पत्र भइल.
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