भोजपुरी में पढ़े: समाज के हिस्सा रहले ओह घरी के गुरूजी

आज परवेट (प्राइवेट) स्कूल में कई गुना फीस दिहल जाता. पढ़ाई के नाम पर कभी कैंप होता त कभी पिकनिक लेकिन जवन नइखे होत उ ह संस्कार देहला के काम. पहिले के मास्टर कइसे अपना स्कूल में पढ़े वालन से हर समय जुड़ल रहत रहल हा लोग. पढ़ाई के संगे संस्कार के जिम्मा भी उनके रहत रहल हा.

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  • Last Updated: October 12, 2020, 4:49 PM IST
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पंडीजी.हमनी के इहे कहत रहनीं जा आपाना मास्टर साहेब के.कहीं-कहीं गुरूओ जी के संबोधन से काम चलत रहल.आजु गंउओं के स्कूलन में अब ना त गुरू जी बाड़े.ना पंडीजी.अंगरेजी मइया बोले वाला लोगन पर एह देस में लक्ष्मी माई कुछ ज्यादे मेहरबान रहली.एकर असर अब गंउन में भी हो गइल बा.अब उहवों गिटिर-पिटिर अंगरेजी वाला परवेट (प्राइवेट) स्कूल खुलि गइल बा.ओह में पढ़ावे वाला मरद लोग अब सरजी हो गइल बा आ मेहरारू-लइकी लोग मिस भा मैडम.गुरूजी आ पंडीजी अब गंउन के स्कूलन से हेरा गइल बाड़े.

एकर असर गंउअन के स्कूलन में अब लउकत बा.सरजी, मैडम जी, मिस जी त बढ़ि गइल बा लोग.बाकिर ओह लोगन खातिर ओइसन आदरभाव नइखे रहि गइल.ओइसे त परवेट स्कूल मालिक सरजी, मैडम जी भा मिस जी लोगन के पढ़ावे खातिर रखि लेले बा.लक्ष्मी माई के सपना देखावे आ ओह के पूरा करावे के जिम्मा दे देले बा.बाकिर उहन लोग के आपाना जिनिगी से लक्ष्मी माई दूरिए बाड़ी.दू-चार हजार में गांवां-गाईं खुलल स्कूलन में ऊ लोग पढ़ाइके एक तरह से बेरोजगारिए काटता लोग.महंगाई के जमाना में दू-चार हजार से का होखे वाला बा.



त ऊ लोग टिशनियो (ट्यूशन) पढ़ावे के मजबूर बा.यानी लक्ष्मी माई के सपना देखला से लेके के देखावला होत पूरा करावे के पूरा खेलि में लक्ष्मीए माई परधान हो गइल बाड़ी.एह वजह से अब सर जी होखसु भा मैडम जी भा मिस जी.उनुका से पढ़े वाला लइका होखे भा लइकी.भा ओह लइका-लइकी के माई-बाबूजी.माफ कहीं पापा-मम्मी.अब कुछ ओइसहिएं उमेदि राखता जइसे.मजूर के मजूरी दिहला के बाद लोग ओकरा से काम के उमेदि करेला.अब ऊ लोग भी समाज के बस पइसा वाला वेवस्था के एगो अंग भरि रहि गइल बा.
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पहिले जब अंगरेजी माई के स्कूलन पर ढेर किरपा ना रहे.उनुका खातिर दीवानगी ना रहे त.दू-चार गांव के बीचे एगही स्कूल रहे.तब गुरू जी भा पंडीजी के जवन इज्जति रहे.ऊ आजु के लोग सोचियो ना सकेला.

हिंदू समाज में जब घर में सादी-बियाह, जनेऊ- गृहबास होत रहल हा.त पहिलका नेवता गंगा जी के दियात रहल हा.दूसरका नेवता गांव के सिवजी के.तीसरका नेवता अगर गांव में मंदिर बा त उहां के देवता आ पुजारी के.ओकरा बाद नेवता जात रहल हा कनफुंकवा गुरू आ उपरोहित के.एकरा बाद नंबर आवत रहल हा गांव के स्कूल के मास्टर साहेब यानी पंडीजी के.ओकरा बादे आपन संगी-संघतिया, नातेदारी-रिश्तेदारी में नेवता भेजात रहल हा.मुअला जियला में गांव के स्कूल के पंडीजी के जगह ऊंच रहल हा.

गांव-घर में मौसम के पहिलका फल होखे, बालि होखे, कोन होखे.उखि होखे, तरकारी होखे.घर के लोग आपाना मनहीं गुरूओ जी के भेजवा देत रहल हा.आपाना घर के पढ़े वाला लइका-लइकी के हाथे.हामार बाबूजी मास्टर रहले आ हामारा गांव के बगल वाला गांव में सतरह साल नियुक्त रहले.ऊहां तियन-तरकारी के बहुते खेती होला.सांझि खा जब ऊ स्कूल के छुट्टी के बाद गांवें लौटे लगिहें त कवनो ना कवनो खेत से केहू निकलि आई.कान्ह पर के गमछी छीन ली.आ ओह में कबो भांटा, त कबो मुरई त कबो कोबी त कबो कुछु बान्हि दी.

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बाबूजी माना करते रहिए जइहें.बाकिर लोग ना मानि.हामार आपन जनेव यादि बा.बाबू जी ओहो घरी ओहिजे रहले.ऊहां से जनेव के दिन नेवता पर आताना तरकारी आ दही आईल कि ओकरा के अगिला दिन हमनीं के टोला-मोहल्ला के संगे हितई-नतई बंटवावे के परल. आजु अगर अइसन होई त क्रांतिकारी टीवी वाला लोग पहुंचि जाई आपन कैमरा लेके.टीवी वाला लोग भले ही मार्क्स बाबा के दास कैपिटल ना पढ़ले होई.पंडीजी के झोरा में रहल तियन-तरकारी के भ्रष्टाचार से लेके शोषण से लेके बाम्हनवादी वेवस्था घोषित कइ दी.पंडीजी सस्पेंडे हो जइते.

पंडीजी के अइसन आदर काहें रहल.दरअसल भारतीय परंपरा में शिक्षा वेवस्था आजु नियर राज्य यानी सरकार के जिम्मे कम, समाज के जिम्मे ज्यादा रहल.गांव के लोग मानत रहे कि गांव के स्कूल के गुरूजी के काम बा समाज खातिर बच्चन के पढ़ा के इन्सान बनावल. ज्ञानी बनावल.बदला में गांव अपना बच्चन के गुरूजी के पालन-पोषण के जिम्मा लेत रहल.ना सिर्फ जिम्मा लेले रहे.ओह में आदरो भाव रहे.अंगरेज लोग एह वेवस्था के जानि बूझि के खत्म कइल.मैकाले जब 1835 में भारत के शिक्षा वेवस्था के बदले के योजना बनवले.

त राज वेवस्था में स्कूलन के ले आवे के शुरूआत कइले.गांधीवादी विचारक धर्मपाल जी आपन शोध पुस्तक ‘ब्यूटीफुल ट्री’ में लिखले बाड़े कि मैकाले के योजना लागू होखे से पहिले देशभर में संस्कृत आ फारसी माध्यम के करीब पांच लाख स्कूल रहले स.आ ज्यादेतर के वेवस्था गांव-समाज उठावत रहे. चूंकि तब स्कूल यानी पाठशाला गांव के अंग रहे त ओकर रख-रखाव के जिम्मेदारी गांवही उठावत रहे.रोजाना के सफाई स्कूल में पढ़े वाला लइका-लइकी लोग खुसी-खुसी करत रहे लोग.आजु देश के चलावे वाली ऊ पीढ़ी रिटायर हो गइलि बिया.

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जवन गांव के अइसन स्कूल वेवस्था से निकललि रहे.ओकरा एह बात के गर्व रहे कि ऊ गांव के बोरा-चट्टी वाला स्कूल से निकलल ह.ऊ स्कूल के बनवले बा.साफ-सफाई, रंगाई-पोताई कइले बा.कुछु साल पहिले गुजरात के चुनाव में आजु के एगो क्रांतिकारी पत्रकार रिपोर्टिंग करे गइले त स्कूल में लइकन के सफाई करत देखि एकरा के शोषण आ भ्रष्टाचार के रूप में पेश कइके स्टोरी बनवले.उनुका पता रहे कि ना रहे.गांधी 1935 के वर्धा सम्मेलन में स्कूली शिक्षा के जवन बेस डाक्युमेंट यानी आधार पत्र लिखले.

ओह में स्कूल के साफ-सफाई, रख-रखाव में बच्चन के सामिल करे पर भी जोर देले रहले. जब समाज एतना धेयान राखत रहे त पंडियो जी गांव के बच्चन के पढ़ाई के ध्यान राखत रहले.एह में पइसा के भूमिका ना रहत रहे.जिम्मेदारी के भाव रहे.अब तक परीक्षा-इंतेहान त प्राइमरी मिडिल स्तर पर रहिए नइखे गइल.बाकीर तीस-चालीस साल पहिले ले पांचवीं और आठवीं के बोर्ड परीक्षा होत रहे.ओह में आपाना छात्र-छात्रावन के बढ़िया नंबर से पास करावे के जिम्मा गुरूजी अपनहिंए उठा लेत रहले.

पंडीजी गांव के भा नजदीकी गांव के रहले त उनुका दुआर-दालानि में जाड़ा के दिन आवते पुआरा बिछि जाई.पंडीजी ओह पर दरी डलवा देत रहले.लइका लोग आपाना घर से बिछौना, ओढ़ना, किताबि, ललटेन लेके आ जात रहे लोग.पंडीजी आपाना देखरेख में राति का पढ़ाई करावत रहले.चारि बजे भोरे उठा के पढ़ावत रहे लोग.बच्चा लोग भिनहीं उठि के आपाना घरे जाके नहा-धो आ खा-पीके स्कूले जाइ लोग.सांझि के छुट्टी के बाद घरे जाके खा-पी के फेरू पंडीजी के पुअरा पर आ जात रहे लोग.

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जाहां पंडिजी दूरि के रहले, भा स्कूल में लइका ढेर रहले, उहां रात के पढ़ाई आ ठहराई के इंतेजाम स्कूले में होत रहे.स्कूले में पुआरा बिछत रहे.हम बलिया के सहतवार कस्बा के मिडिल स्कूल से छव, सात, आठ पढ़ले हईं.उहवां आठ के बोर्ड परीक्षा के तेयारी खातिर दशहरा बादे स्कूले के दू गो कमरा में पुअरा बिछि जात रहे.ओह घरी के मास्टर साहेब चाहे सीताराम सिंह पंडीजी रहनिं, चाहे शुभनारायण पांड़े, चाहे शिवपूजन दुबे, चाहे ददन दुबे.चाहे हवलदार गिरि.सब लोग उहवें रहत रहे लोग.

राति खा आपाना पइसा से चाउर-दालि, आटा-आलू मंगा के खाना बनवावत रहे लोग.आ लइका लोग के पढ़ावत रहे लोग. दरअसल जब बाजार के दबाव ना रहे.गिटपिटिया अंगरेजी माई के वर्चस्व ना रहे.मास्टर साहेब लोग के तनखाह ढेर ना रहे.जब गांव-घर में असुविधा ढेर रहे.तब मास्टर साहेब लोग ज्यादा जिम्मेदार रहे.ज्यादा धेयान राखत रहे लोग.लेकिन जइसे-जइसे बाजार के दबाव बढ़त गइल.सरकारी स्कूल के मास्टर लोग के तनखाह बढ़त गइल.ऊ लोग आपन जिम्मेदारी भूलत गइल.समाजो बदलि गइल.परवेट स्कूलन के जाल बढ़ि गइल.सुविधा त बढ़ल.

बाकिर पढ़ाई के स्तर गिरि गइल.भले आजु के लइका एबीसीडी कमे उमिर में जाने लागल लोग.लेकिन बाकि ज्ञान के स्तर पर गिरत चलि गइल. पहिले के मास्टर लोग कइसन रहे.हिंदी के घंटी में हिंदी पढ़ाई लोग त गणित के घंटी में गणित आ विज्ञान चाहे संस्कृत के घंटी में विज्ञान भा संस्कृत.लेकिन ज्यादातर लोग किताब देखबे ना करी.खाली एतने पूछी लोग कि काल्हु काताना पढ़वले रहनीं.लइका-लइकिन के जवाब मिलते ओकरा आगा शुरू हो जात रहे लोग.सोचिं सभे कि आजु अइसन मास्टर काताना बाड़े.

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आपन खा के, आपाना दुअरा पर पुअरा पर पढ़ावे वाला तब के गुरू जी लोगन के का फीसि मिलति रहे.ई जानबि सभे त चौंकि जाइबि सभे.जेकरा सरधा भइल त दू रूपिया पसकराई दे देत रहे.उहो रिजल्ट अइला के बाद.जेकरा बेंवत ना रहे, उ ना दे पावत रहे.हां, जेकरा बेंवत रहे.ऊ लोग जरूर पंडीजी के धोती, कुर्ता, गमझा भा कुछु आउर देत रहे.हां, एह दान में सरधा के भाव ज्यादे रहे.बाजार के भाव तनिको ना. आजु अगर अइसन रहित त पंडीजी के भ्रष्टाचारी घोषित कइ दियाइत.बाम्हनवादी वेवस्था के अंग बता दियाइत.

दरअसल तब के गुरूजी भा पंडीजी लोग समाज के रोसनी के लकीर रहे लोग.ऊ लोग कांच कोइनि के छड़ी से पीटत रहे लोग.लेकिन ओह पिटाई के बादो सरधे रहत रहे.लइके लोग कोइनि के छरका छीलि के ले आवत रहे लोग.छरका हथेली पर पड़ला के बाद आहि-आहि चिल्लात रहे लोग.बाकिर पंडीजी खातिर सरधा में कवनो कमी ना रहे.पंडीजी चाहे कवनो जाति के होखसु.ऊ गुरू रहले.लइका-लइकी काहे न बड़ जाति के घर के रहसु, उ पंडीजी के चेले रहे लोग.आजु इ संभवे नइखे.आजु कोइनि के छरका से मास्टर मारि के देखसु.थाना-फौजदारी ना हो गइल त कहसु. हम त सोचेनी.कास.ऊ पुरान दिन फेरू आ जाइत.
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