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Bhojpuri: धूरी में, माटी में अपने परिपाटी में बिंध्याचल घाटी में बावला कहाईला

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अक्तूबर, 2012में जब ई सूचना मिलल कि ओह साल के नोबेल पुरस्कार एगो अइसन चीनी साहित्यकार के दिहल जा रहल बा, जे कबो मदरसा के मुंहों ना देखले रहे आ पहाड़ पर माल-मवेशी के चरवाही करत अकेलापन से निजात पावे बदे साहित्य रचल शुरू कइले रहे,त हमरा सुखद अचरज भइल।

  • News18Hindi
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लोककथा-लोकगाथा से लेके समकालीन साहित्य में फइलल भ्रमजाल के हटावल आ उकेरल उन्हुका रचनिहार के मकसद रहे। लोक से गहिर जुड़ाव राखेवाला नोबेल पुरस्कार विजेता ऊ रचनाकार बाड़न मो यान। मो के मतलबे होला मौन रहेवाला। ओह मौनसाधक,चरवाह रचनाकार का बिसे में खबर पढ़िके हमरा दिल-दिमाग प छा गइलन-हूबहू ओइसने भोजपुरी के एगो समरथी कवि राम जियावन दास बावला,जे चकिया जिला(उत्तर प्रदेश) के भीखमपुर गांव के अभावग्रस्त लोहार परिवार में पहिली जून,1922के रामदेव-सुदेश्वरी के जेठ बेटा के रूप में जनम लेके जंगल-जंगल कुसुंभर,रमरैया,मुरलिया,डुगडुगवा का लगे पहाड़ियन पर भइंसि चरावत तुलसी बाबा के रामचरितमानस आ कबीर के पद-साखी बांचत, कोल-भील-मुसहर का संगें रहिके लोकपरिपाटी के विरासत से जुड़ल जियतार गीतन के सिरिजना ताजिनिगी करत रहलन आ जेकर वाचिक परंपरा से गहिर-गझिन जुड़ाव रहे। खाली पढ़ाइए-लिखाई में ना,बलुक लेखनो के स्तर पर ऊ कबीर, भिखारी ठाकुर के परंपरा के दमदार रचनाकार रहलन आ महाप्रयाण करे के दिन (मई दिवस, 1मई, 2012)ले ऊ सिरिजना के दिसाईं लवसान रहलन।सोरहे साल के उमिर में मनराजी का संगें बियाह, लमहर-चाकर गिरस्ती, तीन-तीन गो छोट भाइयन आ दूगो बहिन के परिवार, लोहसाई के जातीय पेशा उन्हुका घुमंतू मन के इचिकियो बान्हि ना पवले रहे।उन्हुकर मन त रमत रहे राम-सिव चरचा में, चरवाही में, आशुकवित्व में, गवनई में आ कुल्हि मिलाके लोक में। काशी के दशाश्वमेध घाट पर जब निगाह परल एगो अइसना मनई पर,जवन एने से ओने आ ओने से एने ना जाने केकरा खोज में बेयाकुल होके छिछिआत रहे,त ओकरा के देखिके एगो साधू का मुंह से अचके में बोल फूटल-‘बावला!’ फेरु त इहे तखल्लुस नांव का संगें जुड़ि गइल, काहें कि ऊ मनई राम जियावन शर्मेजी रहनीं।आजु के दुनियादार समाज में जे सचहूं के बावला होई,ओकरे नू खाली अपना आ अपने घर-परिवार से ना,बलुक सभकर सुख,कुदरत, जंगल, पहाड़,परिपाटी, सउंसे लोक आउर संस्कार से मतलब होई! बावला जी आपन परिचय देत कहतो रहनीं-

गंवई के निवासी बनवासी हम,
घासी में, पाती में जिनिगी बिताईला।
बाहुबलबूता अछूता अस जंगल में
मंगल के कामना से मंगल मनाईला।
सेवा में फूल फल जल में पहारी के
पाहुन केहू आवे त परान अस जोगाईला।
धूरी में, माटी में अपने परिपाटी में
बिंध्याचल घाटी में बावला कहाईला।

बावला जी तमाम लोकधुनन आ विविध मनोहारी छंदन में अइसन सहज-सरस रचना करत रहनीं कि सुननिहार-पढ़निहार मंत्रमुग्ध हो जात रहे।’बबुआ बोलता ना,के हो देहलस तोहके बनवास!’,’हम बनवासी कोल-भील के बेटउवा,तूं त राजा बाबू हउआ’-जइसन शोहरत के बुलंदी छूवे वाला गीतन के भला के भुला सकेला!

बावला जी धुन-छंद लोक से लोकिके अपना गीतन के लोक बदे सिरिजना करत रहनीं आ रेडियो, कविसम्मेलन के मार्फत लोक के समर्पित कऽ देत रहनीं। उहां नियर फक्कड़ कवि के ना त पुस्तक-प्रकाशन के फिकिर रहे, ना साधन-संसाधने रहे।बाकिर धनि बानीं पुन्नश्लोक रामकथा मर्मज्ञ, जोतिषी पारसनाथ मिश्र जी कि उहां के एह कवि के प्रतिभा के सम्मान दिहनीं आ सेवक प्रकाशन, ईश्वरगंगी,वाराणसी से कवि के एकल संग्रह ‘गीतलोक’ के प्रकाशन के बीड़ा उठवनीं, बाकिर ऊ किताब मिश्र जी के देह छोड़ला का बादे जाके 1997में कवि के पचहत्तर बरिस के उमिर में प्रकाशित हो पावल।

‘गीतलोक’ के दू खंड में बांटल गइल बा।पहिल खंड भक्तिपरक गीतन खातिर बा आ दोसर खंड युगबोध के गीतन खातिर।’आपन बात’ में कवि के कहनाम बा-‘हम का लिखीं, हमके कुछ बुझइतै नइखे। कवितई के बिसे में कइसे कहां का रहे के चाहीं, हमरा मालूम नइखे।हम गंवई देहात के रहैवाला, अपने खेती-बारी में समय कटल। कुछ अपने पुरखा पुरनिया के द्वारा तुलसी बाबा के पोथी पढ़ै क लगन रहल।पुरखा पुरनिया ओही से सुख पावैं,हमरो पोथी बांचे के कहैं आउर अपने लोग अरथ लगावैं।ऐसहीं सुनत,पढ़त,जानत कुछ भाव अपने अंदर जागल।कबीर जी क भी कुछ पोथी पढ़ैके मौका मिलल।क्षेत्र के कुछ रामायणिन आउर गायकन के साथे उठत-बैठत लिखै-पढ़ै क मन बनल। कुछ गवनई भी करै लगलीं–हमरा के जवन समाज से मिलल,जवन सुनले बाटी,ऊ रउवां सबके समर्पित करत बाटी–‘

भक्तिपरक गीतन के पहिलका खंड में कवि पारंपरिक ढंग से पहिले सुरसती महरानी के वंदना करत बा,फेरु गुरुवंदना करत विनयी भाव से भगवद्महिमा के बखान कके माथ नवावत बा,भगवान विश्वकर्मो के गुन गावत बा, बाकिर सभसे लमहर आ जियतार प्रसंग बा शिवचरित आउर रामचरित के, जवना का जरिए कवि परंपरा आ आधुनिकता का बीचे पुल बनावेके पुरजोर कोशिश कइले बा। शिव बाबा के बहाना से कवि आजकाल्ह के रहनुमा के कथनी-करनी के पोल खोलत ढोंग-पाखंड के बेनकाब करत कहत बा-

उद्धारक उद्धार करै क ढोंग रचवले बाँटें
स्वर्ग बनी भारत क धरती, शोर मचवले बाटैं,
कहीं पे घुट-घुट लोग मरैलें,कहीं रचावैं रास,
जनाला धंसि जाई कैलास।

कवि शिव के निरास-हतास आम अदिमी का रूप में देखत सवाल ठोकत बा-

दलबंदी से घबड़इला या कहुं देखला घुसखोरी
हार भइल बा कोट में या कि भइल तोरे घर चोरी,
काहें भांग धतूरा खाला,कहवां जाला बुढ़ऊ,
बूढ़ बरध बा,तूं सुसुताला,कहवां जाला बुढ़ऊ?

कवि भोला बाबा के गुन त गावत बा,बाकिर आजु के हालात देखिके ओकरा बिसवास नइखे होत। तबे नू ऊ कहत बा-

सुनीला कि भोला बाबा हउवा बड़ा दानी,
लेकिन हम का जानीं!

मगर ई अबिसवास अकारन नइखे। सउंसे समाज के हाल सोझा बा-

गांव के गंवार बस माटी के अधार बाय,
सगरो अन्हार नाहीं पाईं उजियारे के,
कलही समाज दगाबाज के दखल बाय,
कल नाहीं बाय बोझ बढ़त कपारे के।

तबो कवि के आंतर में आस्था अटूट बा। ऊ झूमि-झूमिके गावत बा-

डिम-डिम डमरू बजावेला हमार जोगिया।

गरवा सोहे मुंडमाला,अंग में लपेटे नाग काला,
छाला शेर के बिछावेला हमार जोगिया।
नाचै भूत-प्रेत संग,सदा रहे अड़भंग,
भंग धतूरा चबावेला हमार जोगिया।

रामचरित के केन्द्र में राखिके रामचरितमानसे लेखा जनम,बाललीला,बियाह, कोपभवन प्रसंग, शोकाकुल कौशल्या, वन-प्रस्थान, गंगा वर्णन, केवट प्रसंग, भरत चरित,अरण्य काण्ड, शेवरी प्रसंग, किष्किन्धा काण्ड, सुन्दर काण्ड, लंका काण्ड -अलगा अलगा लोकधुन आ छंदन में समेटल गइल बाड़न स। इन्हनीं में इंद्रधनुषी छंदन के छटा देखते बनत बा।राम के वने जाए के बात सुनते रानी कोसिला बेयाकुल हो जात बाड़ी। अपना संतान खातिर महतारी के मन में कइसन उदबेग रहेला, एकर बड़ा मरम छूवे वाला चित्र बावला जी उकेरले बाड़न। एगो बानगी देखीं-

बादर घेरि घना बरसी,बिजुरी तड़पी तब ऊ डरि जइहें,
पेड़न के छंहिया रहिहैं,रतिया अन्हियारी,अंजोर न पइहैं,
भूख पियासि लगी जब तउ ललना ललुवाइ के पेट दबइहैं,
हाय न साथ नई जिनिगी पुछिहैं लोगवा हमके लुकियइहैं।

वन में सीता, लखन का संगें राम के देखिके बनवासी चिहा जात बाड़न। किसिम-किसिम के सवाल पुछाए लागत बा। एगो लोकप्रिय गीत के शुरुआती पांती देखीं-

कहवां से आवैला,कवन ठांव जइबा,बबुआ बोलता ना,
के हो देहलै तोके बनवास,बबुआ बोलता ना!
कवने करनवां बतावा अइला बनवां
कोने कोने घूमेला भंवरवा जइसे मनवां
कउनी हो नगरिया में अंजोरिया नाहीं भावै,बबुआ बोलता ना,
कहवां रात भावै बरहो मास,बबुआ बोलता ना!

बनवासी मनई के सेवाभाव आ अतिथि-सत्कार के कुदरती सुभाव एगो अउरी गीत में देखते बनत बा-

हम बनवासी कोल भील के बेटउवा,रउआ राजा बाबू हउवा।
करीं सेवा का खिआईं,कहां आसनी लगाईं,
इहां बनवा में बाय कंद-मूल फल पतउवा।
बनवासी हम लोग, नाहीं सेवा करे जोग,
लोग बावला भइल बा देखि-देखिके सुभउवा।

‘गीतलोक’ के दोसरका युगबोध खंड में समाज के निचिला तबका के तंगहाली,तबाही आ रोज-रोज जीए-मूवे के अलचारी पर लोककवि के गीत आ छंद उकेराइल बा।एगो साफ-सोझ अभावग्रस्त मनई के दु:ख भला केकरा दिल के घवाहिल ना करी-

घरहूं बिपतिया बहरहूं बिपतिया,
न रतिया में कल बाय,न दिनहीं में कल बाय,
जहां जहां जाईं, परिछाईं दुखदाई होत,
धरती के अंचरा में पग-पग छल बाय।

एक ओर बाजारवादी सोच आ विकास के ढिंढोरा पीटत रहनुमा, उहंवें दोसरा ओरि किसान-मजूर के बदहाली। समय के नबज टकटोरत बावला जी के कहनाम बा-

जांगर किसाने क आंके न कोई
पातर समइया में झांके न कोई
हानी पर हानी विकासे क बेला
किस्मत भी होइ जाले बांव
ए बाबू,हमरा त माटी क गांव।

जब रखवारे बटमार आ गिरहकट हो जाई त देस-दुनिया के का हाल होई।कवि व्यंगात्मक लहजा में सचाई के बयान करत सउंसे समाज के आगाह कइल आपन दायित्व बूझत बा-

एक दिन गइलीं रपट लिखावै घबड़ाइल कुछ माने में,
का बतलाईं ए भइया,मोर जेब कट गइल थाने में।
नमो-नमो हे देवता दानी,राउर सब क अकथ कहानी,
लोग कहैं कबिरा क बानी,बरसे कम्मर भींजै पानी,
हम बावला गांव में रहलीं खेते में खरिहाने में,
का बतलाईं ए भइया,मोर जेब कट गइल थाने में।

अइसना जनतंतर में सभकर हाल बेहाल देखिके कवि कहत बा-‘केकर-केकर लेहीं नांव, कमरी ओढ़ले सगरो गांव, का बताईं मितवा,दुख देले परिछाईं, का बताईं मितवा!’

एह लोककवि के पारखी नज़र भूमंडलीकरण आ उदारीकरणो पर बा।एगो छंद में कवि के नजरिया साफ-साफ नज़र आवत बा-

वाह रे उदारवृत्ति भारत निवासिन के,
चोर-चाई सबके खिआवै के हो गइल,
नागिन के बच्चा जे माहुर से घात करै,
दूध और चानी पियावै के हो गइल,
केवल परिवार क परपंच रंगमंच भइल,
अलग अलग झोली सिआवै के हो गइल,
जोड़-जोड़ गांठ परदेस के बिलारिन से
घरे-घरे कुकुर जियावै के हो गइल!

कवि देश के आबरू खातिर जान कुरबान करे के आवाहन करत बा-

राखै बदे देश ला सिपहिया क भेष,
तलवरिया ले ला ना,
कसके बान्हिला कमरिया,
तलवरिया ले ला ना!

लोकधर्मिता,मनुजता आ संवेदनशीलता बावला जी के सिरिजना के जान बा।उहां के लेखन के मकसद रहल बा इंसान के बेहतरी।भोजपुरी अंचल के ऊबड़-खाबड़ जमीन पर खांटी शब्द, लोकोक्ति, मुहावरा में लोकधुन, छंद आ वाचिक परिपाटी में रचाइल बावला के गीत झर-झर झरत पहाड़ी नदी आ झरना नियर प्रवहमान बाड़न स, जवन भोजपुरी भाषा, संस्कृति आ लोकचेतना के अनमोल निधि बाड़न स।तबे नू हिन्दी-भोजपुरी के गौरव-स्तंभ पुन्नश्लोक डॉ विद्यानिवास मिश्र के रेघरिआवे जोग टिप्पणी बा-‘बावला जी तो नि:स्पृह हैं, फक्कड़ कवि हैं और यह देवदुर्लभ गुण उनकी कविचेतना से जुड़कर अपने आप में सिद्ध रचनाकारों के लिए भी स्पृहणीय है।मैं उनकी कविता को केवल भोजपुरी के लिए बहुमूल्य अवदान नहीं मानता।मैं उसे समस्त हिन्दी क्षेत्र ही नहीं, समस्त भारत के लिए बहुमूल्य सांस्कृतिक अवदान मानता हूं।उनकी रचनाएं जीवंत वाचिक परंपरा की अभिवृद्धि जिस ईमानदारी और जिस जीवनश्रद्धा से कर रही हैं, उसमें भारतीय प्रतिभा की सनातन सक्रियता का प्रबल प्रमाण मिलता है।’

कबीर आ भिखारी ठाकुर के परिपाटी के एह जियतार लोककवि के हमार प्रणामांजलि!

(भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. लेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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