भोजपुरी जंक्‍शन: बिहार- ‘लैंडलॉक’ बा कि ‘माइंडलॉक’

सीएम नीतीश तेजस्वी यादव के दस लाख सरकारी नोकरी देवे के दावा के मजाक उड़ावत कहत बाड़े कि जवन दस लाख लोग के सरकारी नोकरी देवे के वादा कइल जाता, वोह कर्मचारी लोग के वेतन का तेजस्वी जेल से ले आके दीहे?

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  • Last Updated: October 29, 2020, 12:17 AM IST
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देश के मानचित्र प नजर दउड़ावल जाव त एगो इलाका अइसन मिली जहां खाली ईंट-भट्ठा के चिमनी से धुआं निकलत लउकी. दरअसल ई धुंआ हर युवा खातिर एगो सवालिया निशान छोड़त धुआं बा. हर युवा हताशा आ निराशा में खुद से एगो सवाल पूछत बा – ‘’ जाईं त जाईं हम कहाँ आगे/ दूर ले बा धुआं-धुआं आगे. हर परिवार के कमाये लायक भा उच्च शिक्षा लेवे के उम्र के होत-होत नौजवान ‘बहरा’ जाए खातिर विवश हो जाले. जी हं, हम बात क रहल बानी पूर्वांचल के रूप में मशहूर एह क्षेत्र के, जवना के भाषा भोजपुरी हवे. एह क्षेत्र के एगो बड़ हिस्सा बिहार में आवेला बाकि उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्सा में. अबहीं बिहार में विधानसभा चुनाव के जोर-शोर बा त वादा-दावा के भरमार लागल बा.

केहू दस लाख सरकारी नोकरी के वादा करता त केहू 19 लाख रोजगार सृजित करे के वादा के पोटली लेके चुनावी मैदान में घुमता. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुख्य विपक्षी महागठबंधन के नेता राजद के तेजस्वी यादव के दस लाख सरकारी नोकरी देवे के दावा के मजाक उड़ावत कहत बाड़े कि ई वादा भरमावे वाला बा. जवन दस लाख लोग के सरकारी नोकरी देवे के वादा कइल जाता, वोह कर्मचारी लोग के वेतन का तेजस्वी जेल से ले आके दीहे?  नीतीश कुमार के एह व्यंग्यात्मक भाषण प खूब थपरी बाजल. हालांकि तेजस्वी एह फंड कहां से आई एकरो बारे में कहलें बाकिर नीतीश कुमार एकरा आगे इहो कहले कि बिहार एगो ‘लैंडलॉक’ प्रदेश हवे, एह से एहिजा औद्योगिक विकास गति नइखे पकड़त.

एह जमीनी हकीकत से विपक्षी पार्टी मतदाता लोग के अवगत करावे के बजाय ओकरा के भरमा रहल बा. नीतीश कुमार के बात में कुछ दम जरूर बा काहे कि निवेशक ओहिजे निवेश करेले जहवां परिवहन, शासन व्यवस्था, आधारभूत संरचना बढ़िया होखे. एह में कवनो में बिहार के प्रदर्शन बढ़िया नइखे. जवना 15 साल के नीतीश कुमार ‘जंगलराज’  के रूप में चित्रित क रहल बाड़े, ओकर अगर बात छोड़ दी त इहो 15 साल राज्य के सत्ता प रहले त का एह कार्यकाल में ई पूरा भइल बा?  उत्तर ना में मिली. 15 साल के समय कवनो कम ना होला बाकिर आपन ई विफलता के ढांके खातिर नीतीश कुमार ‘लैंडलॉक’ के शिगूफा छोड़ले बाड़े.



ऊ जवना हकीकत के ओर इशारा क रहल बाड़े, आईं पहिले ओह हकीकत के पड़ताल क लीहल जाव. एही बिहार से 1995 में अलगा होके बनल झारखंडो ‘लैंडलॉक’  प्रदेश ना हवे? फेर ओहिजा कइसे औद्योगिक विकास भइल?  ई सवाल पूछल लाजमी बा. एगो समय रहे जब बिहार के बीमारू राज्य के संज्ञा दिहल जात रहे. खैर, एकरा से राज्य उबर त गइल बाकिर स्वस्थ आ समृद्ध राज्य के सपना अबहियों सपने बा. कवनो राज्य के विकास के ईमारत पूंजी निवेश, सस्ता ऊर्जा, स्मार्ट बैंकिंग प्रणाली, बेहतर परिवहन प्रणाली आ नीमन विधि-व्यवस्था जइसन पांच गो पाया पर खड़ा होले.
मूल रूप से बिहार एगो कृषि प्रधान प्रदेश हवे. एहिजा के माटी उपजाऊ हवे, कारण कि नेपाल, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश से बहत आवे वाली नदी अपना साथे उपजाऊ माटियो ले आवेले. देश के आजादी के बाद सरकार सोन, गण्डक, बागमती, कोशी, उत्तरी कोयल, दुर्गावती आदि कई गो सिंचाई परियोजना शुरू कइलस. एह में से दुर्गावती आ उत्तरी कोयल नदी प बने वाली मण्डल सिंचाई योजना के त लकवे मार दिहलस. ओह योजना के नहर सब में त तलहट्टी के सफाइये कबो ना भइल. त सिंचाई अधर में रह गइल. बाकिर दोसरा ओर सुशासन बाबू के छवि लीहले नीतीश कुमार अपराध के ग्राफ (हत्या, लूट, अपहरण इत्यादि) में कमी देखावेलें बाकिर खाद, बीज, कीटनाशकन के कालाबाजारी उनका सुशासन में बाधा पहुंचावत ना लउकेला.

एकरा वजह से खेती के लागत में बढ़ोत्तरी आ मुनाफा कम होखे के कारण पलायन हो रहल बा. चार दशक पहिले तक कृषि आधारित कइगो चीनी मिल राज्य में चलत रहली स. बाकिर धीरे-धीरे ई सब चीनी मिल महाराष्ट्र में शिफ्ट हो गइली स. एह हकीकत से सत्ता प्रतिष्ठान का कबो अवगत भइल? अगर बैंकिंग प्रणाली के बात कइल जाव त राज्य में एको सरकारी भा गैर सरकारी बैंकन के मुख्यालय नइखे. अइसन स्थिति में स्मार्ट बैंकिंग प्रणाली के कल्पना अबहीं एह राज्य खातिर दूर के कौड़ी बा. घरे-घरे बिजली त पहुंच गइल बा बाकिर एकर नियमित आपूर्ति अबहियों उद्योग के अनुकूल नइखे. इहां तक कि एह बिजली के भरोसे खेतियो एकरा प पूरा तरह से निर्भर नइखे हो सकत. एह बात से इनकार नइखे कइल जा सकत कि बीतल कुछ साल में बिहार के सड़क व्यवस्था में बहुते सुधार भइल बा, बाकिर एकरा में अबहीं अउरी सुधार के जरूरत बा.

ई त रहल सरकारी स्तर पर करे वाला बुनियादी सुधार के बात, बाकिर बिहार खास कर भोजपुरिया क्षेत्र के सामाजिक स्थितियो कम जिम्मेदार नइखे. जाति-उपजाति में बंटल ई समाज राजनीतिक दल खातिर एगो उर्वर माटी जइसन बा. एकरा प सभे आपन फसल लहलहावल, बाकिर एकरा वजह से राज्य के विकास के पहिया जवन पीछे जाये लागल एह पर कवनो राजनीतिक दल के ध्यान ना गइल आ गइले होई त ऊ जानबूझ के आपन आंख एने से मोड़ लीहल. कृषि क्षेत्र के कमजोर भइला से अब एहिजा के लोग खाली साल के तीने महीना कृषि कार्य में व्यस्त रहेलें आ बाकी बचल खाली समय बतकुचन आ गंवई पॉलिटिक्स में गुजरेला. कहलो जाला खाली दिमाग शैतान के घर, एकरे नतीजा बा कि आज बिहार में जाति के आधार प समाज के बंटवारा के खाई अउर गहीर आ चाकर भइल बा.

सिविल सेवा के बात कइल जाव त एह राज्य के युवा के संख्या एहमें सबसे अधिका बा बाकिर इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट के पढ़ाई खातिर राज्य में कवनो प्रतिष्ठित संस्थान नइखे. खात-पीयत घर के लइका दोसरा राज्य में पढ़ाई खातिर गइले, एकरा से हजारो करोड़ रुपया हर साल बिहार से बहरा जात बा त ओहिजे हर साल लाखों लोग इलाज करावे खातिर वेल्लोर, चेन्नई, दिल्ली जाला. इहो राज्य के धन दोसरा राज्य में जाये में सहयोग करेला. शिक्षा के स्थिति के बारे में बात कइल जाव त प्राथमिक विद्यालय में अधिकांश शिक्षक कॉट्रैक्ट प बहाल कइल गइल बाड़े आ माध्यमिक शिक्षा में त कॉन्ट्रैक्ट प शिक्षकन के बहाली अब सामान्य बात बा. स्कूलन में विज्ञान के पढाई के का भविष्य हो सकता जब प्रयोगशाला में तले लागल रहेला. कहल जाला कि प्रयोग के लायक उपकरण चाहे सामाने उपलब्ध नइखे.

उच्च शिक्षा में वित्तरहित कॉलेजन के भरमार बा. जब नियमित रूप से शिक्षकन के वेतने ना मिली त ऊ का शिक्षा दे पइहें?  कुल मिला के बिहार के शिक्षा-व्यवस्था जर्जर हो चलल बा. इहवां विकास के दृष्टि से महत्वहीन मुद्दा प त चर्चा भा आन्दोलन होते रहेला बाकिर शिक्षा-व्यवस्था प चर्चा भा आन्दोलन शायदे कबो होला. बिना उचित शिक्षा के बिहार के पिछड़ल स्वाभाविके बा. आजादी के बाद से जतना राशि केंद्र सरकार द्वारा राज्य में भेजल गइल ओकरो सदुपयोग ना हो सकल अउर उ राशि बगैर उपयोग के लौटावे के पड़ल. अगर केन्द्र के लौटावल गइल राशि के आंकलन कइल जाव त शायद बिहार प्रथम स्थान प होई.

पटना के आलू अनुसन्धान केंद्र के कुफरी (हिमाचल प्रदेश) स्थानान्तरित क दिहल गइल. एही तरह गया के फौजी छावनी के आकारो छोट क दिहल गइल. जनसंख्या आ क्षेत्रफल के हिसाब से लगभग 7% केंद्रीय संस्थान बिहार में होखे के चाही. बाकिर दुर्भाग्य से बिहार के हिस्सा में एको प्रतिशत नइखे. इहो कारण रहल बा कि बिहार के आर्थिक गतिविधि मंद पड़ल रह गइल. बिहार में दोसरा राज्य के तुलना में तकनीकि आ दोसर शिक्षण संस्थानन के कमी बा. साथहीं जवन शिक्षण संस्थान आ अस्पताल बा ओकर स्थिति बहुत संतोषजनक नइखे. एह से बिहारियन के बेहतर शिक्षा आ इलाज खातिर दोसरा राज्य में जाये के पड़ेला. एकरा से पूंजी दोसरा राज्यन में जाता.

बिहार के पहचान 7 गो सवर्ण जाति 11 गो पिछड़ा, 107 गो अति पिछड़ा जाति(ओबीसी), एक गो दलित , 23 गो महादलित आ लगभग एक प्रतिशत अनुसूचित जनजाति वाला प्रदेश के रूप में बन गइल बा. बिहार के विकास खातिर एकगो नया सोच, नया कार्य संस्कृति के जरुरत बा.

2020 के विधानसभा चुनाव में मुद्दा आ वादा के ढेर लागल बा बाकिर जवन नीतीश कुमार जमीनी हकीकत के बात क रहल बाड़े ओह हकीकत के ओर केहूं झांके के कोशिश नइखे करत. आज बिहार के अर्थव्यवस्था आयातीत पूंजी से संचालित हो रहल बा. गांव अब पहिले खानी गांव नइखे रह गइल, अब गांव के अर्बनाइजेशन हो रहल बा. इहो एगो शायद मजाक जइसन लागी कि देश के दोसरा राज्य के मुकाबले बिहार के गांवन के अर्बनाइजेशन होखे के गति जादे बा, बाकिर एकरा में सरकार के योगदान ना बलुक ओकर निकम्मापन जादे जिम्मेदार बा. अब एह अर्बन होत गांव के अभिलाषा आ आकांक्षा के अबहियों कवनो राजनीतिक दल देखे खातिर तइयार नइखन.

एह चुनाव में एक बात से उमेद बन्हल रहे कि राजद के तेजस्वी यादव, लोजपा के चिराग पासवान आ नया नया राजनीति में आइल प्लूरल्स पार्टी के पुष्पम प्रिया शायद युवा बाड़े आ ई लोग नया बदलत समाज के नया आकांक्षा के समझिहें आ एकरा खातिर चर्चा होई बाकिर ई दुर्भाग्य बा कि अइसन कवनो चर्चा एह चुनाव में नइखे, सब उहे घिसल-पिटल जुमला चल रहल बा. पुष्पम प्रिया एगो नया परिपाटी अर्थात जातिवादी मानसिकता के तूड़े के कोशिश क रहल बाड़ी बाकिर अब त इ समय बताई कि ई दिल से कोशिश बा कि चुनावी स्टंट ह. रह-रह के इहो सवाल गूंजता कि कहीं आपन बिहार ‘लैंडलॉक’  के साथे-साथे ‘मांइडलॉक’ के शिकार त नइखे हो गइल?
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