भोजपुरी जंक्‍शन: चन्नी बर्द भुसउले भूसा

तना जने के इहां लड़िकन के शादी-बियाह बदे देखुआर आवैं त उ आपन औकात बढ़ावै खातिर दूसरे क बैल लियाइके अपने चन्नी पर बांधि देय. बनारसी में कहावत हौ -चन्नी बर्द भुसउले भूसा, जात-पात एक्को जिन पूछा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 28, 2020, 5:18 PM IST
  • Share this:
भारत में खेती-बारी का भाव पहिले नंबर एक पर रहल. जेकरे खेत अउर खेती न रहै, ओकर समाज में कौनो इज्जत न होय, दरिद्र मानि जाय ओके. आदमी के औकात क अंदाजा दुआरे क चन्नी और चन्नी पर बन्हल बरधन यानी बैलन से लगावल जाय. जेकरे दुआरे चन्नी पर जेतना जोड़ी बैल रहय ओके ओतनै संपन्न समझि जाय. केतना जने के इहां लड़िकन के शादी-बियाह बदे देखुआर आवैं त उ आपन औकात बढ़ावै खातिर दूसरे क बैल लियाइके अपने चन्नी पर बांधि देय. बनारसी में कहावत हौ -चन्नी बर्द भुसउले भूसा, जात-पात एक्को जिन पूछा.

मतलब जेकरे चन्नी पर बैल बन्हन होय और भुसउले में भूसा भरल होय, ओकरे इहां शादी-बियाह आंख बंद कइके कइ ल, सुजाती हौ कि कुजाती हौ, पता करे क जरूरत नाही. चन्नी मतलब जहां पशु बांधल जालन, अउर भुसउल मतलब जहां भूसा रखल जाला. खेती-बारी में ट्रैक्टर अउर हारवेस्टर क जमाना आवै से पहिले किसानन के दुआरे पशुन क चन्नी अउर पूरे साल पशुन के खाये खातिर भूसा रखे बदे भुसउल जरूर रहै. पशु, पुरुष और प्रकृति खेती क अधार रहलन. कहावत रहल -बर्द मर्द क खेती.

खेती में कौनो खर्चा नाही रहल. हल-बैल से जोताई, पशुन के गोबर क खाद, तलाबा-कुंआ के पानी से सिंचाई, अउर घरे क बीज. अंगरेजी में एही के आज जीरो कास्ट खेती कहल जाला. लेकिन आज क हालत एकदम से उलटि गयल हौ. खेती में अब खाली कास्ट रहि गयल हौ, पइसा क खेल होइ गयल हौ खेती. आज के तारीख में टैªक्टर क जोताई 300 रुपिया बिगहा हौ. अब सबके पास ट्रैक्ट त बा नाही, केराया पर लेइ के जोतवावा. ओइसे भी डीजल एतना महंगा होइ गयल हौ कि जेकरे ट्रैक्टर हौ, उहो अब हिसाबै से खेत जोतैला. बोआई तक जहां पहिले 10-12 बाह खेत जोताय, अब पांचै-छ बाह से काम चलाई लेलन लोग. लेकिन खेत के अच्छे से जोतले बिना फसल नहीं होत. खेती क जान जोताई होला. बिरवा जामै बदे मट्टी नरम चाहेला अउर मट्टी नरम बनावै बदे खेत क अच्छे से जोताई जरूरी हौ.



अब एक बिगहा खेत के छह बाह भी जोतवावै क मतलब खाली ट्रैक्टर क केराया 1800 रुपिया. ओकरे बाद बजार से खाद खरीदा, बीज खरीदा, फिर पंपसेट-टुबेल से सिंचाई करा, सबके बदे खीसा में पइसा चाही. फसल के कौनो रोग-बियाद पकड लिहेस त बजारी से खरीद के कीटनाशक छिड़का. अबही भी कौनो गारंटी नाहीं कि फसल खेते से घरे पहुंचि जाई. अगर दऊ क आफत आइ गयल त पूरा लागत पानी में.
फसल अगर बचि गयल त मशीन से कटाई-मड़ाई बदे भी पइसा चाही. एतना कुल कइले के बाद जब फसल बेचै क बारी आयल त गजरे क भाव. फायदा क बात त दूर लागत निकलि आवै त धन भाग. नाही त घरहू क उरदी जेगरे में. सरकार किसानन क फसल खरीदै बदे एमएसपी घोषित करेला. लेकिन एमएसपी क हालत इ हौ कि खाली छह प्रतिशत फसल क खरीददारी एमएसपी पर होला. बाकी साहूकारन के भरोसे.

आज के खेती-किसानी क इ असली तस्बीर हौ. किसान करजा में पैदा होला अउर करजा में ही मरि जाला. एही नाते आज के जमाने में नई पीढ़ी खेती-किसानी से दूर भागत हौ. भारत क खेती बरबाद होइ गयल हौ. इ बरबादी जानबूझि के कयल गयल हौ. पहिले जब अंगरेज इहां रहलन तब खेती के सीधे बरबाद कइलन अउर इहां से गइले के बाद उब्ल्यूटीओ के जरिए बरबाद कइलन. हमार सरकार भी खेती बरबाद करै में भागीदार रहल हौ. अब 1951 में देश के अर्थव्यवस्था में खेती क जोगदान 51 प्रतिशत रहल, लेकिन 2011 में घटि के 19 फीसदी रहि गयल, फिर 2019-20 में अउर घटि के 16.5 प्रतिशत रहि गयल.

घाघ क कहावत हौ - उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी भीख निदान. लेकिन जवन खेती समाज में सिरमौर पेशा रहल, उ अब रसातल में चलि गयल हौ. जवन बैल पहिले दुआरे क शान रहत रहलन, अब ओनकर जगह या त कसाईबाड़ा हौ या फिर उ अन्ना यानी आवारा बनि के घूमत हयन, ओनकर स्वागत लाठी-डंडा से कयल जाला.

भारत गांव क देश रहल. देश में पहिली बार 1901 में जब जनगणना भयल त शहर क आबादी खाली 11 प्रतिशत रहल. यानी 89 प्रतिशत आबादी गांव में रहत रहल अउर ज्यादातर लोग खेती-किसानी पर निर्भर रहलन. चालीस साल बाद 1951 में भी देश क 70 फीसदी आबादी खेती-किसानी पर निर्भर रहल. लेकिन 2011 आवत-आवत इ औसत घटि के 55 प्रतिशत पर आइ गयल. एकरे बाद 2019 में आकड़ा लुढ़कि के 42.39 पर पहुंचि गयल. आज शहर क आबादी 34 प्रतिशत से अधिक होइ गयल हौ. खेती जब घाटा क सउदा होइ गयल, गांव में करे बदे कौनो काम नाही रहि गयल त नई पीढ़ी का करी. पेट पालै खातिर शहरै न भागी.

भोजपुरी जंक्‍शन: मौलाना लोग बोलत नइखे, पत्ता आपन खोलत नइखे

प्हिले जे आपन-गांव घर छोड़ि के बहरे कमाए जाए ओकर समाज में बदनामी होय. ओके दरिद्र मानि जाय. जेकरे घरे दुकानी से खरीदारी होय ओहू के दरिद्र मानि जाय. लेकिन आज जमाना बदलि गयल हौ. आज बजार का जमाना हौ - हाट बजार केकर, जे ले दे ओकर. मतलब सबकुछ बजार पर निर्भर हौ. बजार से बहरे कुछ नाही हौ. जब सकबुछ बजार होइ गयल हौ त अब खेती-बारी भी बजार के सौंपै क पूरी तइयारी हौ. अइसन-अइसन कानून आवत हौ कि खेती-बारी क जवन बचल-खुचल सोर बा, उहो उपरि जाई.

जइसे सरकारी कंपनी बेचै बदे पहिले ओके कमजोर कयल जाला, ओके घाटा क कारोबार बनावल जाला अउर फिर अंदरखाने सउदा कइके ओके अपने मनइन के औना-पौना दाम में बेचि दिहल जाला, उहे हाल आज खेती क भयल हौ. पहिले एके घाटा क कारोबार बनावल गयल, किसानन के कमजोर अउर कर्जदार बनावल गयल अउर अब एके बेचै क बारी हौ.

किसान भाई इ गणित अच्छी तरह से समझि लेय. खेती अउर किसान के बचावे क खाली एकै उपाय बचल हौ. खेती क खर्चा घटावल जाय. जोताई त खैर अब बैल से न होइ पाई, काहे से कि न त अब हरवाह रहि गइलन अउर न हल-बैल क व्यवस्था रहि गयल हौ. एतना केहू के टाइम भी नाही हौ. लेकिन पशुन के बिना खेती न होई. बैल हल न खिचिहै, लेकिन खेती क दूसर काम करिहै. बैल गन्ना क पेराई कई सकैलन, दिनभर अल्टीनेटर घुमाइके बिजली पैदा कइ सकैलन. बैल क गोबर खेती के अनिवार्य रूप से चाही. बिना गोबर के खेती ना होई -गोबर मैला नीम क खली, एनसे खेती दूनी फली. खेती क इ पुराना फार्मूला फिर से गरमावै के पड़ी. किसान के कर्ज अउर मर्ज से मुक्ति तबै मिली, जब खेती बजार के खाद-बीज से मुक्त होई. जमीन क भूख भले असमाने पहुंचि गयल हौ, लेकिन एक आदमी के केतना जमीन चाही, एके जाने बदे रूसी लेखक लियो टाल्सटाॅय क कहानी पढ़ि ल. हाउ मच लैंड डज अ मैन नीड. महात्मा गांधी के इ कहानी एतना बढ़िया लगल रहल कि उ एकर गुजराती में अनुवाद कइले रहलन.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज