भोजपुरी जंक्‍शन में पढ़ें: जतरा के पतरा - चरणार्द्रि से हो गइल चुनार

आजकल के पढ़ल-लिखल लोग जेके गंवार बुझेलन उहे लोग एहमन सबसे महतपूर्न भूमिका निभाए लन. ओहू में खासकर मेहरारू लोगन. अपने संस्कृति के कई ठो बहुत जरूरी चीज, जौने पर खतरा मडरात हो, ओके उठा के सब रीति-रिवाज में बुन दिहल.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 30, 2020, 8:15 AM IST
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चुनार से राउर लोगन के जान पहिचान त हम पहिलही करा भइल हई. आज पारी उहाँ के इतिहास के हौ. जनबे करीले भारतभूमि पर इतिहास के संहे जेतना उपहास भैल हौ, ओतना भरसके कहीं अउर भैल होखी. तबहूं एह हिसाब से देखल जा त भारतै में पच्छू के तुलना में पुरुब एकर सिकार कम भैल हौ. ओकरे पीछे ऐतिहासिक आ भौगोलिक त बटबे क़ैल, एक ठे बड़हन कारण एह जवार के जीवट भी हौ. ऊ जीवट खाली तीर तरवार से ना, बहुत महीन ढंग से बुद्धी के स्तर पर भी आपन असर देखावेले. आजकल के पढ़ल-लिखल लोग जेके गंवार बुझेलन उहे लोग एहमन सबसे महतपूर्न भूमिका निभाए लन. ओहू में खासकर मेहरारू लोगन. अपने संस्कृति के कई ठो बहुत जरूरी चीज, जौने पर खतरा मडरात हो, ओके उठा के सब रीति-रिवाज में बुन दिहल. ई रीति-रिवाज में बुनले के काम सबसे निमने जौन करेले, उहे पुरान हवे. पुरान ऊ चीज ह, जौन इतिहास के रटौले के ना, मनई के संस्कार बना दिहले के काम करेले. एही नाते आचार्य रजनीश पुरान के इतिहास के बर्तुलाकर दृष्टि कहेलन.

भारत में खाली एही जे ना, कहीं के इतिहास उठा के देखे के हो त ओकर सुरुआत आपके पुराने से करे के परी. तनी गहिरे पैठ के देखब त मालूम होई कि ई खाली भारते नाहीं, ई बाति दुनिया के हर प्राचीन संस्कृति के साथ हौ. सबकर आपन-आपन पुरान हवे, कहे के चाहे कहल ओके कुछू जा. अब ई अलग बाति हौ कि काल के थपेड़ा से केहू ओके कौनो ङन बेसी बचा ले गइल, त केहू कुछ बचा पौलस आ कुछ भुला गइल आ केहू-केहू त पुरहरे भुला गइल. चुनार के इतिहास के चर्चा भी आपके पुराने से करे के होई. पुरान के टाइमलाइन पर देखब त चुनार के इतिहास आपके महाकाव्य काल, मने कि महाभारत आ रमायन से भी पहिले के मिली. आ उहाँ से देखब त इहो जानेब जे इहाँ के इतिहास पूरे भारत के इतिहास से जोड़े वाला त हइए हौ, ब्यापक अर्थ में पूरी दुनिया से जोड़े वाला ह.

इहाँ के किस्सा सुरू होले भगवान बिश्नू के पहिलका पुरहर मानुख औतार, आ वैसे उनकर चौथा औतार, मने कि बावन औेतार से. इतिहास के ई पूरा क्रम चुनार के नमवे में सन्निहित हौ. चुनार के इतिहास के ई पाठ उहाँ के भूगोल आ भौगोलिक संरचना से बहुत गहिरे जुड़ल हौ. लम्मे से भ उप्पर से देखीं त रउरे के ऊ पहाड़ी लउकाई जौने पर चुनारगढ़ बनल हौ. ई पहाड़ी मनई के गोड़ यानी कि चरण के आकार के हौ. बहिरी-भितरी दुनो ओर से ई कौनो बहुत बड़हन मनई के दहिना गोड़ जइसन लगाला. भगवान बामन वाले औतार के कहानी त रउरे जनते हईं. पुरान के मान्यता ई हौ कि राजा बलि से दान के संकलप करा लिहले के बाद जब बावन भगवान अपने पग से तीन पग धरती नापे लगलन त धरती के ऊ जहाँ से नापल सुरू कइले रहलन, ऊ जगही इहे ह. सबसे पहिलका आपन ऊ एहीं धइले रहलन. एही से एकर नाम चरणार्द्रि पड़ल. चरणार्द्रि, मने कि जहाँ पड़ले से चरण आर्द्र हो गइल हो, मने कि भीजि गइल हो, बस उहे चरणार्द्रि.



ध्यान देहब त पाइब कि चुनारगढ़ बिलकुल गंगा जी के किनरवे हौ. बल्कि अइसन कि तीन तरफ से गंगा जी से घिरल हौ. बस एक्के ओर से इहाँ जमीन से अइले-गइले के सुबिधा हौ. जाहिर हौ, जब इहाँ चरण परल होई त भीजबे करी. आ जब ऊ साक्षात बिष्नू भगवान के पहिलका मनई औतार के चरण होए त भला ओके पखरले के लोभ गंगा माई भी कइसे छोड़ सकेली. बस एही से भीजि गइल होई. उहे चरणार्द्रि बादे में चरणाद्रि, आ फेर चरणाद, चरणाद से चरनाद और चरनाद से चुनराद आ चुनराद से चुनार हो गइल. अब ओही के चुनार के नाम से जानल जाला. नाम बनले बिगड़ले के ई किस्सा दुनिया में बहुत जगहिन के साथे भइल बा. ओही में एकठे इहो हौ, आपन चुनार.
पुरान के मान्यता के हिसाब से देखीं त आज जौन किला बा, ऊ कौनो किला ना रहे. सबसे पहिले इहाँ जौन निर्माण भइल रहे ऊ जेल रहल आ ऊ जेल रहल कालयवन के बनवल. उहे कालयवन जे महादेव जी से बरदान लिहले रहल कौनो भी रणभूमि में हमेसा अपराजित रहले के. सैकड़न बेर हमला क के भी कंस के ससुर जब श्रीकृष्ण भगवान के हरा न पवलस तब ऊ अपने सहायता खातिर कालयवन के बोलावल. कालयवन के जब श्रीकृष्ण भगवान कौनो तरह से हरावल कठिन देखले तब ऊ भाग चलले. आ भागत-भागत जा के मुचकुंद ऋषि के गुफा में लुका गइलन. ओही आ के कालयवन मुचकुंद ऋषि के जगौलस आ उनके देखते भर में भसम हो गइल. मुचकुंद ऋषि के ऊ गुफा ललितपुर के लग्गे देवगढ़ में हौ. धौर्रा जवार से करीब 8 किलोमीटर आगे, बेतवा नदी के किनारे. खैर ओकर बाति फेर कबो होई. उहे कालयवन जरासंध से मिताई के नाते महाभारत काल में इहाँ आपन जेल बनौले रहल.

बावन भगवान से लेके महाभारत काल के बीच के एह जगही के कौनो इतिहास अब कौनहू रूप में सुरक्षित ना बा. ठीक ओही तरह से महाभारत से लेके फेर महाराजा बिकरमादित्य के बीच के इतिहास भी इहाँ के अब कौनो रूप में उपलब्ध नइखे. बिकरमादित्य के इतिहास इहाँ से अइसे जुड़ल कि उनकर बड़ भाई भरथरी जी जोगी हो गइलन. उनके जोग लिहले के किस्सा इहाँ जन-जन के जबान पर हौ. जोगी लोग त घूम-घूम के सुनइबे कराला, ओइसहूँ ई मध्य प्रदेश के सीधी जिला से लेके ओहर नैपाल के तराई ले आ ओहर बिहार बज्जिका आ मिथिला छेत्र ले लइका से लेके बूढ़ तक सबके कई-कई रूप में मालुम हौ. गोरख बाबा आ राजा भरथरी इहाँ के लोकगाथा ना, लोक संस्कार के हिस्सा हवें.

बतावल ई जाले कि जब राजा भरथरी राज-पाट सब छोड़ के जोगी हो गइलन तब राजपाट के जिम्मेदारी राजा बिकरमादित्य पर आ गैल. उहे बिकरमादित्य जेकरे नाम पर बिकरम संबत चलल. ओहर भरथरी गुरु गोरखनाथ से ज्ञान लेहला के बाद जोगी होके घूमत-घूमत इहाँ पहुँचलन. तब इहाँ बस एगो पहाड़ी रहल आ जंगल रहल. ओह जंगल में तरह-तरह के जीव-जंतु रहलन. ओही बीचे में एक ठो गुफा देख के भरथरी जी ओही में आपन जोग साधना करे लगलन. कौनो तरह से ई बात राजा बिकरमादित्य के पता लगल त ऊ सोचलन कि उहाँ त जंगल में हिरन, खरहा, बानर, भालू आ हाथी से लेके बाघ, चीता तक सभे जानवर होइहे. जानवर का जाने कि के जोग साधे आइल बा आ के सिकार खेले. कहीं ऊ कुल भरथरी जी के नुकसान न पहुँचावें, बस इहे सोच के राजा बिकरमादित्य इहाँ किला बनवा देहलन. अब केहू-केहू इहो कहेला कि ऊ कालयवन के जेलवे के फिर से ठीक करा के किला बनवा देहलन.

अब एह लोककथा के इतिहास के टाइमलाइन पर कसल चाहीं त बड़ी सावधानी बरते के पड़ी. काहे से कि अकसर लोग राजा भरथरी के कबि आ बैयाकरण भर्तृहरि समझ लेला. जबकि ई दुनो के बीचे बहुत घना संबंध होके भी कौनो संबंध नाई बा. दुनो जनी में ई संबंध जरूर बा कि दुनो उज्जयिनी से रहलन, लेकिन टाइमलाइन पर दुनो के बिच्चे करीब छै सौ साल के अंतर बा. भरथरी बिकरमादित्य के बड़ भाई रहलन, एकर सुतरी बैताल पच्चीसी वाली कहानी में मिलेले. ओह सुतरी के पकरला के काम सर रिचर्ड फ्रांसिस बर्टन कइलन, 1870 में जब ऊ अंगरेजी में एकर उल्था कइलन तब. ओह सुतरी के पुरहर बिस्तार मिलल हौ पंजाब के राजा गोपीचंद वाली कहानी में, जौन गुरमुखी लिपि में लिपिबद्ध हौ. ई लोकगाथा भी बहुते पुरान हौ. उहे खिसवा थोड़े जवारी हेर-फेर के साथे भोजपुरी आ छत्तिसगढ़ी में भी पावल जाले. बकिर इहाँ ऊ खाली स्रुति परंपरा में बा. हजारन साल से लोग ओके ओइसहीं गावत-सुनत आ रटत-रटावत चलि आवत बा. अब इहाँ से अगर इतिहास के टाइमलाइन पर एह भरथरी के बाबा गोरखनाथ से जोड़ल जा त फेर बड़ा भारी अंतर मिलेले. लेकिन लोक बिसवास के लोक बिसवासे के हिसाब से देखे के चाहीं. एके इतिहास के उर्धी टाइमलाइन पे जोड़ब-घटाइब त बहुत कुछ एन्ने ओन्ने हो जाई. बकिर हाँ, अगर ओही के पुरान के बर्तुलाकार दृष्टि से देखले के कोसिस करब त बहुत कुछ लौकिक-अलौकिक रहस्यन के खजाना खुलत चल जाई.

असल में देवकीनंदन खत्री जी ‘चंद्रकांता’, ‘चंद्रकांता संतति’ आ ‘भूतनाथ’ जइसन उपन्यासन में जौने तरह के रहस्यन के जिक्र कइले हवें, सही पूछीं त भौतिक रूप से अइसन कौनो रहस्य एह किला में ना हवे. हाँ ई जरूर हौ कि एहमें सुरंगन अउरी तहखानन के जाल जइसन बिछल हौ, ऊ अपने आपमें कौनो रहस्य से कम ना हौ. कई सुरंगन के मुँह त नीचे जाके सहर में खुलेले. हालांकि ऊ सब कब क बंद कइल जा चुकल हईं. लेकिन जब किला से नीचे उतर के इहाँ के लोक में पइठब त लोक में आपके अइसन हजारन कहानी प्रचलित मिलिहें कि हर कहनिए पे दंग रहि जाइब. आ इ जेतना कहानी हईं ओकर संबंध कौनो अउर कहानी से कम, जोग से जादा मिलेले. अब भगवान बुद्ध के ले ली. एसे सटले बनारस के लगहीं सारनाथ में ऊ आपन पहिलका उपदेस दिहले रहलन. एकरे बाद कहल इहो जाले कि भगवान बुद्ध चुनार में चातुर्मास भी कइले हवन.

चुनारगढ़ के एक नाम नैनागढ़ भी हौ. एकरे पीछे मान्यता ई हौ कि कबो ई नैना जोगिन के भी साधनास्थल रहि चुकल हौ. नैना जोगिन के बारे में खाली लोकगाथा छोड़ दीं त कौनो और प्रमाण ना मिलेले. लोकश्रुति के हिसाब से देखीं त ऊ नाथ पंथ से जुड़ल लगेलिन. राजा भरथरी के संबंध भी नाथ पंथ से ही जुड़ल हौ. उनकर इहाँ स्थान बटबे कइल. त एसे इनकार ना कइल जा सकेले कि नैना जोगिन भी कबो इहाँ कुछ साधना कइले रहल हों. लिखित प्रमाण नैना जोगिन के हमरे जानकारी में खाली फणीश्वरनाथ रेणु जी के एकठे कहानी हौ. बकिर भोजपुरी, अवधी, बज्जिका आ मैथिली के लोकगीतन में नैना जोगिन गहगह भरल हईं. इहाँ तक कि सादी-बियाह के गीतन में भी इनकर चर्चा आवेले. अचरज के बाति ई बा कि एतना सब भरल रहले के बावजूद सब नैना जोगिन के परताप आ उनसे निहोरा कइले के ही चर्चा मिलेले. उनके अपने जीवन के चर्चा कहीं ना मिलत.

हमके लगेले कि ई सब जोगी-जोगिन आ किला के बनावट के लेके रहस्यन के जौन चर्चा लोक में रहल होई, उहे सब मिल के खत्री जी के ओह सब तिलिस्म के रचना के लिए प्रेरित कइले होई जौन ऊ अपने तिलिस्मी उपन्यासन में गढ़ले हवें. एह गढ़ और कस्बा के व्यवस्थित इतिहास मिलल सुरू होले पृथ्वीराज चौहान के समय से. ई जरूर बा कि पृथ्वीराज से लेके अंगरेजी सासन के समय तक के पूरा इतिहास बहुत सघन संघर्स के हौ. मध्यकालीन इतिहास त बहुते संघर्स के समय हौ. बहरहाल ओह पूरे संघर्स के चर्चा अगिली कड़ी में.
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