भोजपुरी जंक्‍शन: दसईं के दस बेटा, एगो बेटा भुअरा

दुनियाभर के समाजशास्त्री मानेले कि जवना समाज के जिनिगी के लड़ाई जइसे-जइसे कम होत चलल जाला, ओइसे-ओइसे ऊ आपन जड़ि-सोरि खोजल सुरू कइ देले.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 21, 2020, 11:40 PM IST
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सोसल मीडिया के जमाना में आपन तीज-तेवहार के लेके खास तरीका के जागरूकता भी बढ़ि गइल बा. आपन जड़ि-सोरि खोजे आ ओकरा के अभिव्यक्ति देबे में सोशल मीडिया बड़का सहारा बनि गइल बा. ओइसे दुनियाभर के समाजशास्त्री मानेले कि जवना समाज के जिनिगी के लड़ाई जइसे-जइसे कम होत चलल जाला, ओइसे-ओइसे ऊ आपन जड़ि-सोरि खोजल सुरू कइ देले. दुनियाभर में जारी अस्मिता के लड़ाई के मूल में ई बड़ कारण बा. जब दुनिया के पाले आर्थिक ताकत ना रहे. त हर लड़ाई के मूल में आर्थिक वर्चस्व रहे. यूरोप के मध्यकाल एकर बड़का उदाहरण बा. अइसन नइखे कि अब यूरोप में गेंग-झगड़ा कम हो गइल बा. अबो लड़ाई होत बा. चेकोस्लोवाकिया के चेक आ स्लोवाक के रूप में बंटवारा होखे भा. यूगोस्लाविया के स्लोवेनिया, क्रोएशिया में बंटवारा होखे. आ आजु जारी आर्मीनिया आउर अजरबैजान के बीच के झगड़ा होखे. सबके मूल में आपन जातीय स्वाभिमान के बचावे के संगे आपन अस्मिता के संस्थापने के संघर्ष बा.


हमनी भोजपुरी मनई के एगो बड़ कमी ह. बात कहां से सुरू करेनी जा आ कहवां ले ओकर डाढ़ि फइला देनीं जा. बात सुरू भइल हा. आपन तीजि-तेवहार के आ बतरस घूमि गइल यूरोप-अमेरिका के ओरि. बाकिर एहो बतिया के एगो सिरा अस्मिते रहल हा. जब दुनिया आपन अस्मिता खोजतिया त हमनी के भोजपुरिया कइसे एह से बांचि सकेनी जा. आ सोसल मीडिया अइसन बरियार मंच मौजूद बा त हमनी के काहें पीछा रहबि जा. त देखि सभे. शारदीय नवरात्र में हमनियों किहां ‘निमिया के डाढ़ि मइया ’ खूबे गूंजि रहल बा. देवी मइया निमि के डाढ़ि पर हिलोरा लगावेली त ओकर चरचा होखबे करि. बाकिर बचपन के दिन यादि आवेला. तीन-चार दसक पहिले ले देवी मइया निमिया के डाढ़ि पर हिंडोरा चैती नवरात्र में लगावत रहलि हा. ओह घरी ई गीति घरे-घरे गूंजत रहल हा..कहीं कराह चढ़ि त कहीं पूड़ी-जाई आ बतासा. ओह घरी मइया के निमिया के डाढ़ि ढेर गूंजि. शारदी नवरात्र में ई गीत कमे गूंजत रहल हा. सोसल मीडिया बाजार के संगे मार्केटिंगों के बड़का मंच मुहैया करा देले बा.


तब आजुकाल्हु के भोजपुरिया लोककलाकार लोग काहें पीछे रहसु. ओइसे समय के संगे समाज हमेसा बदलत रहल बा. त एहू घरी बदलता. तीन-चार दसक पहिले भोजपुरिया इलाकन में बिजुरी रानी पहुंच त गइल रहली. बाकिर टेलीविजन भइया आताना ना रहले. उनुका संगे घर-घर, दालानि-दालानि नवका संस्कार आ बाजार के दखल ना बढ़ल रहे. ओइसन दिन में जइसे शारदीय नवरात्र आवत रहे. वातावरण में दूगो रंग एकदमे बढ़ि जात रहे. खास तरह के भय भी वातावरण में रहत रहे. खासकर किसान, पशुपालक आ मेहरारू लोगन में. इहे दिन रहत रहे, जब घरे-दुआरे बान्हल परिवार के अंग रहल गाइ-बैल, भइंस- बछरू बेमार पड़त रहले. ओह से बचावे खातिर आपाना-आपाना गाइ-गोरू के बचावे खातिर गेरू से रंगि देत रहे लोग. बछरू के गर्दन में करिया धागा बान्हि दियात रहे. ताकि कवनो खराब नजर ना लागे. एही तरे छोट बच्चन के भी खास तौर पर गर्दन आ कलाई में करिया धागा बन्हात रहे. कमर के डांड़ा अगर टूटि गइल रहे. त ऊहो बदलात रहे.


माई-मइया लोग त बचवन के घर से बहरि निकले के पहिले आंखि में चटख काजर लगा देत रहे. छोट बच्चन के नाभियो में काजर लगावल जात रहे. घरे-घरे देवी मइया के पूजा सुरू होत जात रहे. माई-मइया हर दिन भगवती माइ के छाक आ जल चढ़ाई लोग. आ चढ़वला के बाद कही लोग. हे भगवती माई, हामार बाल-बाच्चा, गाई-गोरू के ठीक से रखिह. आजुकाल्हु के बाच्चा लोग पूछि सकेला कि आहो. ई छाक का होला. त बचवा छाक होत रहे. मसाला माने लवंग, इलाइची. दालचीनी. ओह के पहिले पानी में भें दियाई. फेरू सिलवटि पर पिसाई होत रहला. आ फेरू ओकरा के पवित्र जल में डालि दियाई. उहे देवी मइया के चढ़ावल जाइ. एगो अउरू बात धियान देबे के चाहीं. पूजा में पानी कबो ना इस्तेमाल होत रहल हा..खाली जले से पूजा होत रहल हा. चूंकि नवरात्र में ही षष्ठी के दिन से दुर्गा माई के आंखि खुलत रहल हा. आ हर दू-चार गांव के बीचे दसहरा के मेला लागि त लइका-लइकी लोगन में बाड़ा उत्साह रही. बच्चा लोग त मेला में जाके गूरही जिलेबी खाइके.


पिपिहिरी आ फुलावना लेके खुस हो जात रहल हा लोग. पहिले चाट बर के पतइ से बनल दोना में मिलत रहे. बाद में जब चीनी मिट्टी के पलेट आइल त ऊ पलेट में मिले लागल. भोजपुरी मनई चाटे के नाम पलेट रखि दिहले. बाच्चा लोग मेला में पलेटो खाए खातिर जिदि करि. बाकिर बड़-बुजुर्ग माना कइ दिहें. कि पेट खराब हो जाई. पलेट खाए के मोका बच्चा लोग के या त मइया संगे मेला घूमला में मिली भा माई संगे. ऊ लोग जिदि के आगे हथियार डालि देत रहे. बाकिर बाबा-बाबूजी संगे मेला देखे जाए वाला बाच्चा लोग के त पलेट के मांग रखे के पहिलहिं सिहरन हो जाई. का पाता मेलवे में लागि जाइ दू-तीन हाथ. ओह घरी मेला के अलगे क्रेज रहत रहे. .जेकर रेख भीजि जात रहे. ओकरा के थोड़ा-बहुत आजादी मिलि जात रहे. ऊ लोग आपाना संगी-संहतिया संगे मेला जात रहे लोग. ईहे हाल उनहीं लोगन के समवयस्क लइकी लोग के भी रहे. मेला घुमाई में नैन-मटक्को लड़त रहे..बाकिर हमनी के यादि नइखे कि केहू के प्यार-मोहब्बत कबो अंजाम तक पहुंचल होखे.


माई-बाबू, चाचा-पड़ोसी से लोगनि के आताना डर रहत रहे कि एह मामला में बड़का-बड़का लोगन के हिम्मत जवाब दे जात रहे. बहरहाल ओह घरी लइकन के बीच में एगो कहाउत बहुते प्रचलित रहे. दसईं के दस बेटा, एगो बेटा भुअरा. दसईं बान्हाइल बाड़े रामजी के दुअरा. नवरात्र में दस गो दिन होला. ओकरे के दसईं लोग कही. ओइसे नवरात्र में भय वाला माहौल के पीछे वैज्ञानिक कारण आ ओह से बचाव के जरूरत रहे. हमारा समझ से ओकरे वजह से एह के तेवहार से जोड़ि दियाइल रहे. दरअसल नवरात्र बरसात के बाद आवेला. सरदी आपन दस्तक दिहलि सुरू कइ देले. बाकिर गरमियो रहेले. एह घरी बारिस के पानी में डूबल घासि नाया सिरा से पनकत रहेले. डूबल घासि पर कइ गो बैक्टीरिया पनपि गइल रहेले. ओह के खाइ के पशुअन में खुरपका-मुंहपका रोग होत रहला. जवन अगर बढ़ल त पशु के जाने ले ली. एही तरी मौसम के सरद-गरम से बच्चन के खांसी-बोखार आ निमोनिया तक ले हो जात रहल हा. मौसम में व्याप्त बैक्टीरिया से बच्चन के डिप्थिरिया-खसरा भी हो जात रहल हा.


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लोग समझी कि ई सबके पीछे दैव के परकोप बा. कुछ नासमझी आ अनपढ़ी के वजह से मेहरारू लोग माने लागी कि ई सब जादू-टोना के असर ह. .एही वजह से काजर आ करिया धागा के चलन ढेर रहि. बाकिर सांस्कृतिक जानकार लोग मानेला कि नवरात्र में गांवा-गाईं, मंदिर-मंदिर लगातार चले वाला हवन से वातावरण शुद्ध हो जात रहल हा. हवा में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया मरि जात रहले हा स. नवरात्र में देवी के हाथे राक्षस के वध के एगो प्रतीकात्मक अर्थ ईहो बा कि पूजा-पाठ, साफ-सफाई आ हवन से रोग पैदा करे वाला बैक्टीरिया रूपी राक्षसन के संहार. बचपन में एगो अउरू नजारा भोजपुरी इलाका में खूब लउकी..अब एकरा में बढ़ंतिए भ गइल बा. तब दुर्गा सप्तशती के पाठ करे वाला पंडिजी भा श्रद्धालु लोग खाली पीयरे कपड़ा में हाथ में फुलडालि लेके एह मंदिर से ओह मंदिर जात. उहां पाठ करत लउकत रहल हा लोग..पीयर धोती, पीयर गंजी, कान्ह पर पीयर गमछा. पूरा नवरात्र पाठ करे वाला लोगन के ईहे भेस रहत रहल.


दिल्ली-मुंबई में लोग पाठ करेला. पूजो खूब करेला. बाकिर ई पीयरका रंग सायदे लउकेला. बाकिर हर साल जब-जब शारदीय नवरात्र आवेला. दसईं के दस बेटा वाला कहाउत खूब यादि आवेले. यादि आवेला दसहरा के मेला. ओह में कीनल पिपिहिरी आ तेल में छानल, गूर के रसा में पागल तेलहिया जिलेबी.

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