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    भोजपुरी जंक्‍शन में पढ़ें: शिव के काशी में अइसे चढ़ल राम क रंग

    शिव के नगरी में राम क रंग आखिर कइसे चढ़ल? एकर जवाब इतिहास में नाही हौ, लेकिन काशी के लोकमत में मौजूद हौ. काशी में राम के जमावै क श्रेय दुइ मनइन के जाला.

    • News18Hindi
    • Last Updated: October 30, 2020, 8:28 AM IST
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    काशी शिव क नगरी हौ, बाबा विश्वनाथ क पीठ हौ. लेकिन इहां शिवलीला नाही, रामलीला क जोर हौ. काशी में एतना रामलीला होला कि ओतना राम क नगरी अयोध्या में भी नाही होत. एकर ठीक उलटा मथुरा-वृंदावन में कृष्णलीला क बोलबाला हौ. शिव के नाम पर शिवरात्रि क शिव बरात अउर सावन क मेला बस. एकरे अलावा बाबा के जीवन पर कौनो लीला क मंचन नाही होत. लेकिन काशी में रामलीला क मंचन कुआर महीना यानी अश्विन मास से लेइके आधे कातिक तक चारो तरफ देखल जाइ सकेला. इ अलग बात हौ कि एह साल कोरोना के कारण कु ठप्प हौ. शिव के नगरी में राम क रंग आखिर कइसे चढ़ल? एकर जवाब इतिहास में नाही हौ, लेकिन काशी के लोकमत में मौजूद हौ. काशी में राम के जमावै क श्रेय दुइ मनइन के जाला. एक गोस्वामी तुलसीदास, अउर दूसर मेघा भगत. लेकिन असली मास्टरमाइंड तुलसी दासै रहलन.


    काशी क रामलीला, खासतौर से रामनगर क रामलीला पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हौ. काशी नरेश गंगा के किनारे रामनगर क किला में आज भी रहयलन. काशी क रामलीला, रामनगर क किला देखे दुनिया भर से लोग आवैलन. काशी में रामलीला कब से शुरू भयल, इतिहास में एकर कौनो प्रमाण नाही हौ, लेकिन लोकमत के अनुसार काशी में रामलीला क शुुरुआत मेघा भगत कइले रहलन.


    मेघा भगत के बारे में भी कई कहानी प्रचलित हौ. एक कहानी में मेघा भगत के तुलसी दास क मित्र बतावल जाला, त दूसरी कहानी में तुलसी दास क चेला. एक कहानी ई हौ कि गोस्वामी तुलसी दास जब 1577 में अवधी भाषा में रामचरित मानस लिखलन तब ओन्है अपने किताबी क प्रचार-प्रसार क जरूरत पड़ल. तुलसी दास रामचरित मानस के समाज में फइलावै चाहत रहलन, जइसे आज भी लेखक लोग अपने किताबी क प्रचार-प्रसार चाहैलन. लेकिन तुलसीदास के सामने दिक्कत ई रहल कि किताबी के मान्यता कइसे मिलै. मान्यता तबै मिलत जब विद्वान लोग ओके स्वीकरतन. लेकिन काशी क विद्वान तुलसी दास के फूटल आंख नाही देखै चाहत रहलन, मान्यता देवै क बात त बहुत दूर रहल. आज की नाही तब मीडिया रहल नाही कि विज्ञापन देके प्रचार कइ लेतन. छपाईखाना तक नाहीं रहल तब. किताब हाथै से लिखाय अउर अलग-अलग प्रति बनाइके बंटाय-बिचाय. मेघा भगत संस्कृत क विद्वान रहलन, संस्कृत पढ़ावै भी. मनोरंजन बदे बाल्मीकि रामायण के अधार पर रामलीला क मंचन भी विद्यार्थिन से करावै.


    तुलसी दास के दिमाग में सुझल कि अगर मेघा भगत रामचरित मानस के अधार पर रामलीला करावै लगय त मामला जमि जाई. एक त किताब के एतनेे बड़े विद्वान से मान्यता मिलि जाई दूसरे प्रचार भी होइ जाई. तुलसी दास मेघा भगत से दोस्ती गठलन अउर धीरे-धीरे ओन्है रामचरित मानस के अधार पर रामलीला करै बदे राजी कइ लेहलन. मेघा भगत अब बाल्मीकि रामायण के बदले रामचरित मानस क मंचन करावै लगलन. अब रामलीला में भीड़ भी जुटय लगल. पहिले संस्कृत में संवाद होवै के नाते बहुत कम लोग रामलीला देखै आवै. एह तरह से आज के चार सौ साल पहिले काशी में रामचरित मानस के अधार पर रामलीला क मंचन शुरू भयल रहल. मेघा भगत क शुरू कयल इ रामलीला आज भी लाट भैरव क रामलीला के नाम से हर साल होला. कहे क मतलब लाट भैरव क रामलीला सबसे पुरानी हौ. एके आदि रामलीला भी कहल जाला.


    लाट भैरव क रामलीला अश्विन कृष्ण अष्टमी के मुकुट पूजा से शुरू होला, अउर कार्तिक पंचमी के कोट बिदाई के साथ संपन्न होला. काशी में जेतना रामलीला होला, सब तिथि के अनुसार होला, लेकिन लाट भैरव के रामलीला में तिथि के साथ नक्षत्र क भी ध्यान रखल जाला. राम के 14 साल के बनबास क प्रसंग 14 दिन में तिथि के अनुसार ही पूरा कयल जाला. लाट भैरव क रामलीला क मंचन अलग-अलग प्रसंग के अनुसार शहर भर में अलग-अलग स्थान पर होला. दूसरे रामलीला के तुलना में एह रामलीला क दउड़ जादा हौ.


    मेेघा भगत क एक दूसर कहानी भी हौ. इ कहानी में मेघा भगत के तुलसी दास क चेला बतावल गयल हौ. तुलसी दास के देह छोड़ले के बाद मेघा भगत बहुत दुखी भइलन अउर राम के खोजय पैदलै निकलि पड़लन. कई दिन पैदल चलत चलत अयोध्या पहुंचलन. बिना खाये-पीये सरयू किनारे राम-राम करत रहलन. कई दिन बाद दुइ ठे बालक धनुस के साथ ओनके पास अइलन. दूनो धनुस मेघा भगत के देइ के चलि गइलन. ’बाबा इ धनुस संभालि के रखले रह, थोड़े समय बाद आइके लेइ जाइब.’ मेघा भगत धनुस लइके दूनो बालकन क इंतजार करत रहि गइलन, लेकिन दूनो लौटलन नाही. कई दिन बीति गयल मेघा भगत परेशान. एक दिन रात में सपना में उहै दूनो बालक अइलन अउर ओनसे कहलन कि धनुस लेइके वापस काशी जा, उहां चित्रकूट नामक जगह पर रामलीला शुरू करावा, ओहि ठिअन राम क दरसन होई. मेघा भगत धनुस लेइके काशी अइलन अउर रामलीला शुरू करइलन. इ रामलीला चित्रकूट क रामलीला के नाम से प्रसिद्ध हौ. मान्यता हौ कि दूनो बालक बालरूप में राम-लखन ही रहलन अउर ओनकर देहल धनुष आज भी चित्रकूट रामलीला समिति के पास मौजूद हौ. हर साल रामलीला शुरू भइले के 19वें दिन आत्मविश्वेश्वर मंदिर में इ धनुष क दर्शन होला. रामलीला क शुरुआत अश्विन मास के कृष्ण नवमी के मुकुट पूजा के साथ शुरू होला अउर अश्विन शुक्ल पूर्णिमा के दशावतार क झांकी के साथ संपन्न होइ जाला.


    चित्रकूट क रामलीला क भी अलग-अलग प्रसंग क मंचन अलग-अलग जगह होला. हर जगह क निर्धारण मेघा भगत खुद कइले हएन. रामलीला के 18वें दिन भरत मिलाप क लीला होला. नाटी इमली क भरत मिलाप के नाम से प्रसिद्ध इ लीला के देखै बदे देश-विदेश से लोगन क भारी भीड़ जमा होला. काशी नरेश भी इ आयोजन में शामिल होलन. आयोजन में एतनी भीड़ जुटैला कि इ लख्खा मेला के नाम से प्रसिद्ध हौ.




    चित्रकूट क रामलीला से जुड़ल एक अउर कहानी हौ. सन 1868 में रामलीला क मंचन होत रहल. रामलीला में जे हनुमान बनल रहल, ओसे मैकफर्सन नामक एक पादरी कहलस कि हनुमान त 100 जोजन क समुद्र लांघि गयल रहलन, तू वरुणा नदी लांघि के देखावा त जानी. अगर न लांघि पइब त लीला बंद कराइ देब. पंडित टेकराम भट्ट हनुमान क पाठ करत रहलन अउर पादरी क इ बात ओनके करेजा में धंसि गयल. उ राम से अनुमति लेहलन अउर एक छलांग में वरुणा नदी पार कइ गइलन. हालांकि वरुणा पार कइले के बाद उ असली राम के पास चलि गइलन. लेकिन ओनकर मुखौटा आज भी वरुणा किनारे हनुमान मंदिर में रखल हौ.


    काशी में तुलसी घाट क रामलीला भी बहुत पुरानी हौ. मान्यता हौ कि इ रामलीला क शुआत रामचरित मानस लिखले के बाद तुलसी दास खुद करउले रहलन. रामलीला के शुरुआत क समय 1580 के आसपास बतावल जाला. अखाड़ा तुलसीदास आज भी हर साल रामलीला क आयोजन करावैला. लीला क शुरुआत अश्विन कृष्ण नवमी के मुकुट पूजा के साथ होला अउर कार्तिक एकादशी के दशावतार क झांकी के साथ संपन्न होइ जाला. इ रामलीला क मंचन भी शहर में अलग-अलग स्थान पर होला.


    तुलसी घाट क रामलीला से जुड़ल एक प्रचलित कहानी हौ. कहल जाला कि एही कहानी से रामनगर के रामलीला क शुरुआत भयल हौ. लोकमत हौ कि काशी नरेश उदित नारायण सिंह हर रोज तुलसी घाट क रामलीला देखै आवै. रामलीला के दौरान एक दिन ओनके पुत्र युवराज ईश्वरीनारायण सिंह क तबियत बहुत खराब होइ गयल. काशी नरेश फिर भी रामलीला में अइलन, लेकिन देरी से. रामलीला क राम काशीराज के उदास अउर दुखी देखलन त कारण पूछलन. रामलीला खतम भइले के बाद काशीराज जब वापस घरे जाए लगलन तब राम ओन्है तुलसी दल देहलन अउर कहलन कि युवराज के खिआइ दिहैं. काशी नरेश घरे जाइके तुलसी दल युवराज के खिअउलन अउर युवराज रातभर में ही ठीक होइ गइलन. ओही समय काशीराज निश्चय कइलन कि अब रामनगर में भी रामलीला होई.


    काशी नरेश लीला क अइसन आयोजन बनउलन कि रामनगर क रामलीला आज पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हौ अउर नंबर एक हौ. रामनगर क रामलीला पूरी तरह से रामचरित मानस के अधार पर होला, एक शब्द भी इधर-उधर नाही. अलग-अलग दृश्य क मंचन अलग-अलग स्थान पर होला, अउर हर स्थान क प्रसंग के अनुसार ही नामकरण कयल गयल हौ. आज के आधुनिक जुग में भी रामलीला में लाउडस्पीकर अउर बिजली क रोशनी क इस्तेमाल नाही होत. पंचलाइट के रोशनी में पूरी रामलीला होला. रामलीला क पात्र ऊंचे स्वर में संवाद बोलैलन अउर शांति एतनी कि संवाद सुनल जाइ सकैला. रामलीला क्षेत्र में काशी नरेश के पहुंचले के बाद ब्यासजी जोर से चिल्लइहै सावधान, अउर पूरे परिसर में शांति होइ जाई. रामचरित मानस के चैपाई के साथ रामलीला शुरू होइ जाई.


    रामनगर क रामलीला सन 1830 के आसपास शुरू भयल रहल. रामलीला क तइयारी हर साल सावन कृष्ण चतुर्थी के गणेश पूजन के बाद पांचों स्वरूप (राम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुघ्न) क चयन अउर नामकरण के साथ शुरू होइ जाला. भादो शुक्ल चतुर्दशी के फिर से गणेश पूजा होला अउर रावण जनम सेरामलीला क मंचन शुरू होइ जाला. एकरे बाद अश्विन शुक्ल पूर्णिमा के राम उपवन विहार, सनकादिक मिलन के साथ रामलीला समाप्त होला. कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा के रामनगर क किला में कोट बिदाई क अनोखा कार्यक्रम होला. काशी नरेश दक्षिणा देइके रामलीला के प्रमुख पात्रन क बिदाई करैलन. रामलीला क संवाद सैकड़ों साल पहिले काष्ठजिह्वा स्वामी अउर महराज रघुराज लिखले रहलन. आजतक ओम्मन कौनो बदलाव नाही कयल गयल हौ. लीला क आयोजन काशीराज धर्मार्थ ट्रस्ट करैला. राज्य सरकार भी योगदान देला.


    काशी में चेतगंज क रामलीला भी बहुत प्रसिद्ध हौ. बाबा फतेराम 1888 में चेतगंज रामलीला समिति क स्थापना कइलेन अउर रामलीला शुरू भयल. रामलीला अश्विन अमावस्या के मुकुुट पूजा के साथ शुरू होला अउर कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी यानी धनतेरस के दशावतार क झांकी के साथ समाप्त होइ जाला. इहा के रामलीला में कार्तिक कृष्ण चतुर्थी यानी करवा चउथ के दिन सुपुनखा क नाक कटैला. चेतगंज क नक्कटैया बहुत मशहूर हौ. नक्कटैया देखै देश-विदेश से लोग आवैलन. चेतगंज क नक्कटैया भी नाटी इमली के भरतमिलाप की नाही काशी क लख्खा मेला में गिनल जाला. नक्कटैया में सैकड़न लाग निकालल जालन. एक से बढ़ि के एक झांकी. मेला पूरी रात चलैला.


    एकरे अलावा भी काशी में कई रामलीला क आयोजन होला. खोजवा क रामलीला, औरंगाबाद, काशीपुरा, गायघाट, नदेसर, आशापुर, लल्लापुरा, लोहता, लहरतारा, चिरईगांव, दारानगर, लक्सा, पांडेयपुर, मनिकनिकाघाट, शिवपुर, रोहनिया, फुलवरिया के साथ ही काशी के केद्रीय कारागार में भी रामलीला क आयोजन होला. कहै क मतलब कुआर अउर कातिक इ दुइ महीना शिव क पूरी काशी राममय रहैला. लेकिन एह साल राम क अइसन कोप भयल, कोरोना क अइसन आफत आइल कि एक्को रामलीला नाही होत हौ. अबतक क इतिहास में पहिली बार अइसन होत हौ. खाली रामचरित मानस क पाठ कइके रामलीला क खानापुरती कयल जात हौ.

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