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    भोजपुरी जंक्‍शन: वाह पढ़ाई! आह पढ़ाई!

    ऑनलाइन पढ़ावे के नया तरीका इजाद कइल गइल बा, बाकिर मए लरिकन का लगे ना त स्मार्ट फोन बा आ ना ऑनलाइन पढ़ाई के अंगीकार करेके सूझ बूझे विकसित भइल बा.

    • News18Hindi
    • Last Updated: October 22, 2020, 1:01 AM IST
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    कोरोना के एह संकट काल में सभसे अधिका नुकसान पढ़निहार लरिकन के हो रहल बा.घर में बइठल-बइठल ऊ अवसाद के शिकार हो रहल बाड़न स.लरिकन के स्कूल भेजे के नांवें पर अभिभावक कांपि उठत बाड़न.ऑनलाइन पढ़ावे के नया तरीका इजाद कइल गइल बा, बाकिर मए लरिकन का लगे ना त स्मार्ट फोन बा आ ना ऑनलाइन पढ़ाई के अंगीकार करेके सूझ बूझे विकसित भइल बा.ढेर लोग के इहे कहनाम बा कि ई अभिभावकन से धन उगाहे के, ठगी के एगो अउर जरिया बा.


    सउँसे देश में कुकुरमुत्ता-अस फइलल-पसरल शिक्षा के दोकान.कतना सज-धज आ चमक-दमक से भरल-पुरल बाड़ी स ई बहुरंगी दोकान !'ऊंची दूकान फीका पकवान ' के कहाउत इहवां सटीक बइठेला.'पंप एण्ड शो ' एह संस्थानन के खासियत होला.पढ़ाई का अलावा इहां सभ किछु होला.नांव बा पब्लिक स्कूल, बाकिर आम पब्लिक नदारद बा.बस अलग-अलग तबका के खास आ खासमखास लोगन के लरिका-लरिकी सजि-संवरिके मउज-मस्ती करेलन स इहां.


    देखादेखी किछु गरीबो गुरबा अपना लरिकन के भविस बनावे का ललसा से इन्हनीं के मायाजाल में अझुराके रहि जालन.अंगरेजी आ अंगरेजियत के एह बनावटी माहौल में नवनिहालन के ना त अंगरेजी के सुबहित ज्ञान हो पावेला, ना हिन्दिए के.नतीजा होला--धोबी के कुकुर, ना घर के, ना घाट के!बस्ता के भारी-भरकम बोझा आउर कई किसिम के सांसत झेलत बचवा अपना सहज लरिकाईं से हाथ धो बइठेलन स.पढ़ाई के नांव पर बस उहे ढाक के तीन पात.


    तबे नू पहिले के 'वाह पढ़ाई' अब 'आह पढ़ाई ' बनिके रहि गइल बा.पब्लिक स्कूल के मास्टर भलहीं बेहाल होखसु, बाकिर प्रबंधन आ मलिकार के त दूनों हाथ में लड्डू रहेला.अइसहीं सरकारी स्कूल के चानी काटेवाला मास्टर बाड़न मालामाल, बाकिर शिक्षा के हाल बा बदहाल-खस्ताहाल.एक ओरि शिक्षा माफिया के बोलबाला बा, त दोसरका ओरि प्रयोग पर प्रयोग के उतजोग हो रहल बा.बाकिर सभ काहें हो जात बा टांय-टांय फिस्स?


    बहुत पहिले सभ केहू सरकारिए स्कूल में पढ़त रहे.का छोट का बऽड़।का धनी, का गरीब.तब पब्लिक स्कूल के नांवों-निशान ना रहे आ टिउशन-कोचिंग का जगहा मास्टरो लोग खाली स्कूली पढ़ाई पर धेयान देत रहे.ओह घरी कम-से-कम तनखाह पावेवाला अध्यापको के जवन इज्जत-शोहरत समाज में रहे, तवन आजु के प्रोफेसरो लोग के नसीब ना होई.ओइसने दूगो पंडीजी हमरा मानसपटल प आजुओ नाचत रहेलन.


    पहिलका पंडीजी रहनीं--हेडमास्टर पं राम प्रसाद पाण्डेय, जेकराके हमनीं के बड़का पंडीजी कहत रहलीं जा.दलछपरा गांव के प्राइमरी पाठशाला में उहांके प्रधानाध्यापक रहनीं आ ताजिनिगी ओही स्कूल में रहि गइनीं.रेवती कस्बा से एक कोस रोज पैदल चलिके उहांके ओह गांव में पढ़ावे आईं आ नियम से सांझि ढलला के बेरा लवटीं.स्कूल खुलते मए लरिका एने-ओने से बनकट काटिके ओही से झारि-बहारिके स्कूल परिसर के साफ-चिक्कन कऽ दऽ स.


    बड़का पंडीजी हरेक विषय मातृभाषा भोजपुरी में पढ़ाईं आ अइसना तरीका से साफ-साफ समुझाईं कि ऊ सबक फेरु कबो भोर ना परत रहे.प्राइमरिए पाठशाला में उहांके मिडिल स्कूल तक के किताब ले आके पढ़ा-लिखा देत रहनीं.जदी कोर्स पूरा ना होखे, त छुट्टियो के दिन बोलाके पढ़ावे लागत रहनीं.जब ले उहांके रहनीं, हर साल कवनो-ना-कवनो लरिका के वजीफा जरूर मिलत रहे.पढ़ावे में उहांके तनिको कोताही ना करीं.तेजस्वी लरिका अउर तेज हो जा स आ मंदोबुद्धि वालन में




    पढ़ाई खातिर रुचि जागि जात रहे.लरिकन का संगें-संगें बड़को पंडीजी इचिकियो कोताही ना करीं आ पढ़ावे खातिर दिन-रात एक कऽ देत रहनीं.फेरु त स्कॉलरशिप मिलहीं के रहे. पढ़ाई का संगें-संगें खेलकूद, बागवानी, सांस्कृतिक कार्यक्रम, नाटक, कविताई-- सभे हलका में उहां के मजबूत पकड़ रहे.


    एकरे नतीजा रहे कि उहांके हरदम ई कोशिश करीं, जवना से लरिकन के सर्वांगीण विकास होखे.एकरा खातिर उहांके जीवन मूल्य से जुड़िके शिक्षा देत रहनीं.कई-कई परिवार के त तीन-तीन पीढ़ियन के उहांके पढ़वले रहनीं.अनुशासन के ममिला में उहांके अतना कड़इल रहनीं कि मनबढ़ू लरिकन के पहिले पोल्हाके आ ना मनला पर बेंत बरिसाके बस में कऽ लिहल उहांके बायां हाथ के खेल रहे.बाकिर केहू के का मजाल जे अपना लरिका के पिटइला के शिकाइत करो.उहांके गांव भरि के लोग-लुगाई के दिल जीति लेले रहनीं.


    अइसने एगो अउर पंडीजी भेंटइनीं मिडिल स्कूल में.नांव रहे पं जगन्नाथ पाण्डेय.उहांके जूनियर हाई स्कूल, रेवती में अंगरेजी के अध्यापक रहनीं.उहांके जब अंगरेजी के पाठ पढ़ाईं, त ओह पाठ से मेल खात कवनो लोककथा पहिले भोजपुरी में सुना दीं.फेरु त ओह सबक के समुझे में इचिकियो दिक्कत ना होत रहे.अंगरेजी के शब्द, मुहावरा के भोजपुरी अंचल के शब्द, मुहावरन से मिलावत उहांके सबक कंठस्थ करा देत रहनीं.किस्सा-कहानी गढ़े में त उहांके महारत हासिल रहे.कबो अइसन बुझइबे ना करे कि उहांके विदेशी भाषा पढ़ावत बानीं.


    ओह घरी ई बात समुझ ना आवत रहे कि उहांके अइसन काहें करत बानीं.बाकिर आजु जब भाषा वैज्ञानिक लोग ई सिद्ध करि चुकल बा कि मातृभाषा के मार्फत दियाइल शिक्षा सभसे अधिका कारगर होई, तब ओह पढ़ाई के मोल समुझ में आ रहल बा.ओह घरी 'हमारे पूर्वज ' किताब का जरिए भारतीय संस्कृति आ सुसंस्कार के सीख खेल-खेल में दिया जात रहे.तब मूलभूत शिक्षा के ना सिरिफ किताबी ज्ञान दिहल जात रहे, बलुक रोजमर्रा के जिनिगी में ओकर बेवहारिक इस्तेमालो बुझावल जात रहे.


    तब 'हाय-हलो','गुड मॉर्निंग ','गुड नाइट ' आउर 'नमस्ते अंकल 'के ना, गोड़ छूके प्रणाम करेके सबक लरिकाइएं में दिया जात रहे, जवना में दिल, माथ आ हाथ--तीनों एके साथे सरधा से झुकि जात रहे.ओह घरी दिमाग में सूचना के भंडार भरिके पढ़निहारन के कामयाब रोबोट बनावे के ना, एगो बेहतर इंसान बनावे के मकसद होत रहे. आजु शिक्षा के बैपारी टीचरन, शिक्षा माफियन के कारगुजारी देखि-सुनिके आ बस्ता के बोझा तरे दबाइल तनावग्रस्त बुतरुन के बिलात बचपन के खोजि-खोजि के हलकान होत,जबान पर अनसोहाते ई बात आ जाला---'वाह पढ़ाई! आह पढ़ाई!'

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