भोजपुरी विशेष: इनसे बचे तो सेवे काशी

काशी में रहले  मुक्ति त मिली, लेकिन इहां के ठेली ठेला से भी बचेके ह.
काशी में रहले मुक्ति त मिली, लेकिन इहां के ठेली ठेला से भी बचेके ह.

बनारस में रस हौ, जबकि वाराणसी के वरुणा, असी में सिर्फ पानी, उ भी अब गंदा होइ गयल हौ. देश में नदिन क हालत केहू से छिपल ना हौ. फिर भी वाराणसी पर चर्चा आगे होई. अबही बनारस क रस ल.

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  • Last Updated: October 22, 2020, 10:53 AM IST
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लेखक: सरोज कुमार

राड़न क रेला, संन्यासिन क मेला, सड़क गली चैराहन पर साड़न क ठेली-ठेला. मतलब स्वर्ग क सीढ़ी काशी. भाषा में भदेस, अड़भंगी परिवेस मिलि जाय त समझ ल बनारस हौ. काशी क एक अउर नाम हौ वाराणसी. लेकिन जवन रस बनारस में हौ उ वाराणसी में नाही हौ. अब कहब कि वाराणसी ही त बिगड़ि के बनारस भयल हौ न. लेकिन बनारस में रस हौ, जबकि वाराणसी के वरुणा, असी में सिर्फ पानी, उ भी अब गंदा होइ गयल हौ. देश में नदिन क हालत केहू से छिपल ना हौ. फिर भी वाराणसी पर चर्चा आगे होई. अबही बनारस क रस ल.

बनारस मतलब जहां रस बनल रहय. यानी बिगड़ि के भी इ नगर बनारस हौ, फिर बनि के इ का होई गुरू. समझदारन के इशारै काफी हौ. जइसे बनारस बिगड़ि के बनल हौ, ओही तरे लोग भी इहां आपन बिगड़ी बनावै आवैलन. मुक्ती पावै खातिर. मुक्ति ही इहां क पहिचान हौ. लेकिन ’राड़ साड़ सीढ़ी संन्यासी, इनसे बचे ते सेवे काशी.  ’ मतलब काशी में इन चारों से मुक्ति ना मिलि सकेला. तीनो तिरलोक से न्यारी, बाबा विश्वनाथ क सबसेे प्यारी नगरी काशी में सबकर स्वागत हौ.



अब वाराणसी के बारे में. वाराणसी क आपन अर्थ हौ. शहर के उत्तर वरुणा नदी और दक्खिन में असी नदी. दूनो नदी गंगा में जाके मिल गयल हईन. असी, वरुणा और गंगा तीनों के बीच क जमीन मतलब पूरा शिवलिंग. इहे असली वाराणसी यानी काशी हौ. वरुणा-असी के बीच क दूरी ढाई मील और काशी क्षेत्र पांच कोस क. इहे पंचकोसी हौ. काशी में पंचकोसी परिक्रमा क एतना महामत हौ कि पूरी दुनिया से लोग एह खातिर काशी आवेलन. पदम पुराण में दूनोे नदी के बहुत पवित्र बतावल गयल हौ. वरुणा नदी प्रयागराज जिला में फूलपुर के ताल से निकल के बनारस में सराय मोहाना के पास गंगा में समा जाला. असी नदी के बारे में पुराण में कहल गयल हौ कि दुर्गा माता जब शुम्भा-निशुम्भा नाम के राक्षस क बध कइके आपन तलवार फेकलिन त उ काशी में गिरल. जहां तलवार गिरल ओही पानी क धारा फूट पड़ल, अउर असी नदी बहय लगल. असी जहां गंगा में मिलल हौ, उहां असी घाट हौ. बनारसी लोग एक अस्सी घाट कहिके बोलावेलन. अस्सी घाट पर ही तुलसी दास रामचरित मानस क रचना कइलन.
गंगा-वरुणा-असी के कारण ही काशी पूरी दुनिया से अलग हौ. राजा हरिश्चंद्र क कहानी त पता होबे करी. विश्वामित्र के पूरा राज-पाठ दान कइले के बाद हरिश्चंद्र के काशी में ही शरण मिलल रहल. डोमवा किहन मसान क रखवारी करे के पड़ल रहल. ओनके नाम पर एगो हरिश्चंद्र घाट भी हौ इहां.

काशी धर्म, अध्यात्म अउर महापुरुषन क धरती हौ भइया. गंगा-जमुनी संस्कृति. एक तरफ वैष्णव त दूसरी तरफ शैव. भक्ति भी त ज्ञान भी. तुलसी दास, मीरा बाई एक तरफ त दूसरी तरफ कबीर दास अउर बुद्ध. राजा हरिश्चंद्र, त भारतेंदु हरिश्चंद्र भी, अरे उहे जेके खड़ी बोली हिंदी क जनक कहल जाला. कामायनी क जयशंकर त शहनाई क बिस्मिल्ला खां, तबला क गोदई महराज, किशन महराज त ठुमरी क गिरिजा देवी. केतना नाम गिनाई, सब अपने-अपने फन क एक से बढ़ि के एक नग, केहू क कौनो जोड़ ना हौ.

कहावत हौ, काशी के कंकड़ कंकड़ में शंकर क बास होला. अब जहां शंकर, उहां ओनकर सवारी सांड़. काशी क हर सड़क, गली साड़न से अबाद हौ. मुक्ति के चक्कर में आसराहीन बूढ़ औरतन , संन्यासिन क भी भरमार हौ. पुुराण में लिखल हौ -काशी में मरले से सीधे सरग क दरवाजा खुलेला. लेकिन कबीर दास अइसन अड़भंगी कि मरे खातिर मगहर चलि गइलन, जहां मरले से सीधे नरक मिलेला. ’सकल जनम शिवपुरी गवाई, मरत बार मगहर को धाई’. कबीर दास महान ज्ञानी त रहलन, लेकिन अक्खड़ बनारसी भी. दिमाग सटकल कि इहां मरले से त सबके सरग मिलेला, फिर भगवान क कवन एहसान? पूरी जिनगी क पूजा-पाठ क का मतलब? ’जो कबिरा काशी तजै त रामै कवन निहोरा.  ’ बस टंट घंट उठइलेन, पहुचि गइलन मगहर.

लेकिन संन्यासी लोग काशी छोड़े के तइयार ना बायन. कहावत हौ, जहां शिव उहां संन्यासी. दुनिया भर क मठ और दुनिया भर क संन्यासी. भोर में गंगा किनारे पहुंच जा त गेरुवाधारी संन्यासी हर जगह मिलि जइहै. बनारस में कुल 88 घाट हयन, उ भी पक्का. एतना घाट पूरी दुनिया के कौनों शहर में ना हयन. घाटै नाहीं, मठ-मंदिर भी. हर घर में मंदिर, हर गली-कोना में मंदिर, आगे-पीछे दाए-बाए मंदिरै मंदिर. नामी मंदिरन में बाबा विश्वनाथ, संकटमोचन, दुर्गाजी, काल भैरव, संकठा जी, त्रैलंग स्वामी अउर मृत्युुंजय महादेव.

सब मंदिर एक तरफ, मुक्ति क मंदिर महाशमशान दूसरी तरफ. मनिकनिका यानी मणिकर्णिका घाट, जहां से मुक्ति क दरवाजा खुलेला. पूरी दुनिया में एकमात्र महाशमशान काशी में ही हौ. महाशमशान एह बदे कहल जाला कि इहां चिता क आग आज तक बुझल ना हौ. मनिकनिका के ही बगल में काशी करवट देखि ल. काशी करवट मंदिर देखे में करवट लगी. लेकिन असल में मंदिर अपने जगह सही हौ, पूरी काशी ही करवट होइ गयल हौ. काशी करवट क पूरी कहानी कभौ बाद में. काशी में एतना जगह, एतनी कहानी हौ कि पूरी उमर भर लिखत रहा तब्बो ना ओेराई.

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ओइसे बनारस में उमर क कौनो हिसाब-किताब ना होला. इहां जवान से लेइके बुढ़वा तक सब बनारसी हयन. बनारसी मतलब मस्ती. खान-पान, रहन-सहन, पहिनावा-ओढ़ावा, बोली-भाषा सबकुछ बनारसी. बनारसी कचैड़ी, बनारसी जलेबी, बनारसी समोसा-लवंगलता, बनारसी चाट, बनारसी घाट, बनारसी पान, बनारसी लगड़ा आम, बनारसी साड़ी, बनारसी गाली, बनारसी गली, बनारसी लस्सी, बनारसी भांग-ठंढई अउर बनारसी मस्ती क दुनिया में दूसर जोड़ ना हौ. असली बनारसी का रंग देखे के होय त पक्के महाल के गलिन में घुस जा और गंगा किनारे तक गली-गली घूमत रहा. मोदी होय चाहे ट्रंप, बनारसी सबके अपने ठेंगा पर रखेलन. दुइ रुपिया क पान मुहे में घुलल नाही कि सबकर अइसी क तइसी. अगर भांग-ठंढई होइ गयल तब का पूछेके, सबके निपटावै में बस डेढ़ मिनट.

ओइसे इहां निपटान खातिर बहरी अलंग भी हौ, गंगा ओह पार रेती क मैदान. असली बनारसी निगोटा में बहरी अलंगै जालन. बहरी अलंग क मतलब कम से कम दुइ घंटा. निपटान, फिर दंड, फिर गंगा नहान, बाबा क दर्शन-पूजन, चन्नन-चोआ, फिर गरम कचैड़ी-जलेबी अउर अंत में पान के दुकान पर पंचाइत. पान जमि गयल त ठीक नाही त थू. ’अबे छिनरौ क कवन पान लगउले ह. पड़ोसन के देखि के उठल रहले का आज.  ’ अगर पान जमि गयल तब ’वाह गुरू मजा आ गयल. आज तबियत से लगउल ह. ट्रंपवा इ पान खा लेई त व्हाइट हाउस भूल जाई.  ’

एक चेतावनी - प्यार में गाली सुने क जेकर आदत ना होय, उ बनारस अउर बनारसी गुुरू लोगन से दूरै रहय त अच्छा हौ. ओेइसे बनारसी लोग खुदे दुनिया से अपने के दूर रखेलन. न कवनो लोभ, न लालच. बस हर हर महादेव अउर दिनभर मस्ती. जेकरे पे खुश ओकेे क्षण में कपारे चढ़ाइ लिहे, दिमाग ठनकि गयल त मगहर भेजे में भी देरी नाही लगउतन. ’थोड़ै खाय बनरसै रहै’ खांटी बनारसी क जीवन-मंत्र हौ. बनारसी जल्दी बनारस ना छोड़तन. ’चना चबैना गंग जल जो पुरवै करतार, काशी कभौ न छोड़िए बाबा विश्वनाथ दरबार.’ (यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.)
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