भोजपुरी जंक्‍शन: जनता के गीत अलग होला, चुनाव के गीत अलग

बिहार के राजनीति से संस्कृति के विदाई कब के हो चुकल बा. उहां संस्कृति अब राजनीति के हथियार-औजार बने के आपन क्षमता कब के खो चुकल बा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 20, 2020, 11:39 PM IST
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डॉ सागर के गीत 'बंबई में का बा' बिहार के चुनाव में एगो विस्तार पइले बा. बिहार में का बा, बिहार में ई बा प सोशल मीडिया आ टीवी पर मनसाइन बहस आ जंग चल रहल बा. चटखारा ले के भी आ गरिया-सरिया के भी. हालांकि ई बाउर बात बा. कलाकार के स्वतंत्रता बा कि उ अपना पसंद के गीत गाई. ओकरा ई भी स्वतंत्रता बा कि उ अपना पसंद के राजनीतिक धारा के चयन करी. कलाकार के एतना स्वतंत्रता देबहीं के चाही. रउआ नइखे पसन, रउआ ओकरा के ना सुनीं. ओकर कला के महत्व ना दिहीं, ई राउर अपना हाथ में. खैर! त बात होत रहे एगो गीत के पैरोडी बन के निकलल दु गो गीतन के जंगल के.

सोशल मीडिया प भले देख के लागत होखे कि बिहार चुनाव में धरातल प भी एह गीतन के असर बा, त रउआ भरम में बानी. ई जंग सोशले मीडिया आ टीवी प बा. बिहार के चुनाव में गीत कवनो हथियार-औजार लेखा भूमिका में नइखे. बिहार के राजनीति से संस्कृति के विदाई कब के हो चुकल बा. उहां संस्कृति अब राजनीति के हथियार-औजार बने के आपन क्षमता कब के खो चुकल बा. ओकर अनेक कारण रहल बा. उ एगो अलगा विषय हो जाई. तबो जब गीत प बात चल रहल बा त एही प कुछ बात हो जाव.

एह प कुछ बात होखे, ओकरा पहिले ई एगो बात भी हमनी के स्वीकार कर लेबे के चाहीं कि सोशल मीडिया के जमाना में एगो नवका रोग महामारिये लेखा फैलल बा. गांव में एगो कहावत कहल जात रहे कि सावन में सियार जनमले,भादो में बाढ़ आईल, आसिन में कहले कि बाप रे बाप,अईसन बाढ़ त देखलहीं ना रहीं. कवनो बात जब सोशल मीडिया के जमाना प, एह मंच प लोकप्रिय हो रहल बा, त तुरंते ईहो कहल जा रहल बा कि ई त ना भूतो-ना भविष्यति ह मामला. पहिल बार हो रहल बा. ई कहउतिया दिमाग में राखे से आगे एह विषय प बात करे में आसानी होखी.



त बात बंबई में का बा गीत के बिहार चुनाव में विस्तार प. डॉ सागर बंबई में का बा गीत बंबई में रहेवाला प्रवासी मजदूर आ कामगार लोगन के आधार बना के लिखले बाड़े. कमाल के गीत बा. बाकि ओही तर्ज आ पैटर्न के अपना के बिहार के चुनाव में ई गीत आईल. भोजपुरी गायकी के दुनिया में पिछिलका करीब दस साल में ई नवका रोग बा कि जवन गीत हिट होखत बा, ओकर तर्ज, ओकर पैटर्न पकड़ के दे दनादन गीत लिखाला-गवाला.अईसन अनेक गीतन के उदाहरण मिली. हाले में आईल दु गो गीत के देख लेबल जाव. एगो खेसारी लाल यादव के गीत रहे- ठीक है. अब ओह ठीक है प सैकड़न गीत अपना-अपना तरीका से भोजपुरी में बनली सन.
ओही तरह से भोजपुरी में एगो गीत हिट भइल-हैलो कौन. ओह पैटर्न प भी दे दनादन गीत बनल. ई दु गो त उदाहरण बा, अईसन अनेक उदाहरण हाल के बरिस में मिल जाई. ​पहिले अईसन ना होखत रहे. बलेस्सर यादव के,भरत शर्मा के, शारदा सिन्हा के, मुन्ना सिंह के अनेक गीत हिट भइली सन, जुबान प चढ़ली सन बाकि ओह पैटर्न प तुरंत गीत ना गवाये लागत रहे. ई त एगो बात भइल. अब ढेर लोग के ई लागत बा कि बाबा रे बाबा, ई पहिलका बेर हो रहल बा जब कवनो गीत चुनाव में एतना लोकप्रिय हो रहल बा. जेकरा ई लाग रहल बा, ओह लोगन के चुनावी गीतन के इतिहास जाने के चाहीं. चुनाव में गीतन के चलन के इतिहास जाने के चाहीं.

चुनाव के बेरा में भोजपुरी गीतन के एगो परंपरा रहल बा. ढेर लोग के इयाद होखी कि जब झारखंड के बंटवारा भइल रहे तब बिहार के सबसे डाउन देखावे खातिर एगो गीत आइल रहे— मिसरी मलाई खइलू,कइलू तन बुलंद,अब खइह सकरकंद, अलगा भइले झारखंड.... इहो इयाद होखी कि एगो गीत लालू प्रसाद यादव खातिर आईल रहे—-धन फुलवरिया,धन माई मरछिया, लालू भइया जिनके ललनवा, कि जानेलाल जहनवा ए रामा...अजीत अकेला गवले रहले ई गीत. ई दु गो गीतन के उदाहरण दे रहल बानी. एह गीतन के लोकप्रियता कवनो कम ना रहे.

चुनाव में गीतन के ही बात चली त मशहूर जनगीतकार बिजेंदर ​अनिल के एगो गीत के जोड़ा अब ले ना आईल. तीन—चार दशक पहिले के बात बा, जब मुखिया  के चुनाव होखे लागल त बिजेंदर अनिल गीत लिखले- आईल बा वोट के जमाना हो, पिया मुखिया अब बन जा... एह गीत में मुखिया के भ्रष्टाचार आ लूट के कथा रहे. गांव-गांव में लोकप्रिय भइल रहे. बाकि बिजेंदर अनिल के पहचान एह गीत से नइखे. उहां के मूल पहचान बा जनता के गीत लिखे खातिर, राजनीतिक गीत लिखे खातिर रहे.

उहां के एगो गीत बिहार के कालजयी राजनीतिक गीत मानल जाला- केकरा से करीं अरजिया हो, सगरे बटमार.ई गीत तो अबले बिहार के राजनीतिक आंदोलनकारियन खातिर, संघर्षरत जनता खातिर मंत्र गीत लेखा मानल जाला.गाजीपुर के रहेवाला गीतकार हईं विनय राय बाबूरंगी. उहां के एगो गीत लिखनी- माई रे माई बिहान होई कहिया, भेंड़ियन से खाली सिवान होई कहिया. ई गीत अवते के साथे जन-जन के प्रिय गीत भइल आ अब ले ओही तरह लोकप्रिय बा. ई कुछ उदाहरण देबल गईल ह.

एह कड़ी में त सबसे बड़ नाम गोरख पांडेय के बा, जिहां के लिखल भोजपुरी के नवगीत सदाबहार जनगीत मानल जाला. हिल्लेले झकझोर दुनिया...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई... एक दिन राजा मरले आसमान में उड़त मैना... जइसन गीत. एह कुल गीतन के चरचा के मकसद ई बा कि जानल जाव कि ई पहिलका बेर नइखे होखत कि राजनीति के गीत भोजपुरी में लिखाईल भा गवाईल बा. चुनाव के समय गीत आवत रहल बा. राजनीति के गीत लिखात रहल बा. हां, हमनी के फरक समझे के होखी. चुनाव के गीत अलग होला, राजनीति के गीत अलग, जनता के गीत अलग होला. चुनाव के गीत अल्पकालिक होला.

उ बहुत कम समय खातिर चाहे त ​विरोधी पार्टी के लाभ पहुंचावे खातिर भा सत्ता पक्ष के लाभ पहुंचावे खातिर लिखाला, गवाला. ओह में प्रतिध्वनित होखी कि जनता के आवाज बा, बाकि उ व्यक्ति सापेक्ष होला, एह से जनता के गीत ना होला. जनता के गीत में व्यक्ति से जादा व्यवस्था सापेक्ष गीत होला. व्यवस्था के चुनौती देबल जाला. जइसे बिजेंदर अनिल,रमताजी,विनय राय बाबुरंगी,गोरख पांडेय के गीतन में देखे के मिली.

एह से कवनो चीज प ना भूतो ना भविष्यति के प्रमाण पत्र कवनो चीज के एतना जल्दी सोशल मीडिया प कवनो चीज देख के ना देबे के चाहीं. रहल बात भोजपुरी में जनता के गीत के, शासन सत्ता के खिलाफ गीत के त आखिरी में एगो अउरी बात कहल चाहब. कबीर भोजपुरी के आदि कवि मानल जाले. कबीर त एकरे सूत्रधार रहले. उ अपना समय के धार्मिक-सामाजिक सत्ता के चुनौती दे के ही कवि बनले. उ एक साथ हिंदू,मुसलमान, दुनों के धार्मिक सत्ता के चुनौती देत रहले. एह से भोजपुरी में सामाजिक बदलाव के गीत, राजनीति के गीत,जनता के गीत के परंपरा सदियन से बा. हां, बाकि जनता के गीत,राजनीति के गीत, बदलाव के गीत अलग होला आ चुनाव के गीत अलग.
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