भोजपुरी जंक्‍शन: बंगाल में महालया आ कालरात्रि के सरधा से इंतजार

बंगाल में मां काली के पूजा बड़ा सरधा आ समर्पण से होला. एही से नवरात्रि के एहिजा लोगन के इंतजार रहेला. महालया के पहिले आईं कालरात्रि के चर्चा कइल जाउ.

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  • Last Updated: October 23, 2020, 2:05 PM IST
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बंगाल में मां काली के एक से एक उच्च कोटि के साधन रहि चुकल बा लोग. एमें प्रसिद्ध बाड़े साधक रामप्रसाद, जिनकर रामप्रसादी भजन गांव- गांव में गावल जाला. साधक वामाखेपा के नांव बंगाल में सभे जानता. खेपा माने पागल. केकरा खातिर पागल? त जबाब बा मां काली के भक्ति में पागल. अउरी के? त रामकृष्ण परमहंस के नांव दुनिया भर में फइलल बा. त बंगाल में मां काली के पूजा बड़ा सरधा आ समर्पण से होला. एही से नवरात्रि के एहिजा लोगन के इंतजार रहेला. महालया के पहिले आईं कालरात्रि के चर्चा कइल जाउ.

“शब्द कल्पद्रुम” नांव के एगो संस्कृत के शब्दकोश बा. ओमें लिखल बा कि काल: शिव: तस्य पत्नीति- काली. माने काल शिव जी के कहल जाला आ उनुका पत्नी के काली कहल जाला. त कालरात्रि केकरा के कहल जाला? नवरात्रि के सातवां रात के माता दुर्गा के कालरात्रि के रूप में पूजा कइल जाला. ई देवी मां के रौद्र रूप ह. उहां के रंग करिया होला. माता कालरात्रि के पूजा कइला पर भक्त के कौनो राक्षसी ताकत नोकसान ना पहुंचा सकेले. मां पार्वती भा काली भक्त के लगे आवे वाला हर राक्षसी हमला भा कतनो बड़ दुख- परेशानी कालरात्रि रूप धई के तुरंते, ओही छन में नष्ट क दिहें.

काल, समय के भी कहल जाला. त शिव जी काल के मालिक हउवन. ठीक कब का होखे के चाहीं उनुका मालूम बा. ओकरे अनुसार मां काली आपन काम करेली. एही से भगवान शिव के अर्द्ध नारीश्वर के रूप में भी देखावल जाला. शिव आ पार्वती, शिव आ काली अभेद बा लोग. त काल के ऊपर ओह लोगन के आधिपत्य बा. कहां केकर संहार करेके बा, ओ लोगन के ठीक मालूम बा. शिव जी कालातीत हउवन आ उनुकर पत्नी काली रूप में प्रकृति में सक्रिय रहे वाली शक्ति हई. बंगला भाषा में काली माने स्याही होला. माने करिया. ई करिया मां काली के प्रतीक ह. जहां भी मां काली के मूर्ति बा ओकर रंग काला भा करिया बा.



साधक लोग कहेले कि मां जदि दिव्य प्रकाश हई त ऊहे अंधकारो हई. एकर का माने? एकर माने ई कि साधक या भक्त के जीवन में जब भी अंधकार महसूस होखे त ओकरा घबड़ाए के ना चाहीं. ओह अंधकार में मां काली के आशीरबाद  मिल रहल बा. ऊ प्रकाश में बाड़ी त अंधकारो में बाड़ी- सर्वव्यापी. त करिया रंग के व्याख्या सुनि के संतोष होला. शैव विद्वान कहे ला लोग कि शिव जी पूरा ब्रह्मांड के पिता आ पार्वती जी पूरा ब्रह्मांड के माता हई. त ई सुनि के निमने लागे ला.
चंड- मुंड, रक्तबीज, शुंभ- निशुंभ, महिषासुर आ अइसने जबर कई गो राक्षसन के मारे- मुआवे खातिर माता पार्वती नया- नया रूप धइली. चंड- मुंड के मुअवली त उनुकर नांव चामुंडा परि गइल. आ रक्तबीज आ अइसने खतरनाक राक्षसन के मुअवली त कालरात्रि कहइली. अब रात्रि तीन प्रकार के होखेले- महारात्रि त शिवरात्रि के कहल जाला, मोहरात्रि एसे नांव परल कि माता के कृपा सिद्धि खातिर राति के जब भक्त एकांत साधना करे लागेला त ओकरा आधा से लेके एक किलोमीटर के दूरी तक एगो वाइब्रेशन माने स्पंदन पैदा क देली ताकि केहू बायबी आदमी साधक के डिसटर्ब ना करे.

कई गो विद्वान कृष्ण जन्माष्टमी के भी मोहरात्रि कहेला लोग. त ई मोहरात्रि भइल. कुछु विद्वान मोहरात्रि के एगो अउरी व्याख्या कइले बा लोग. ओह लोगन के अनुसार माता के भक्त कौनो खतरा में परे वाला रहेला त माता मोहाविष्ट कइके ओकर रास्ता बदल देली आ ओकर रक्षा हो जाला. अगर ओकरा पर कौनो दुख- परेशानी आवे वाला बा त माता ओ दुख- परेशानी के कारण के नष्ट क देली. एही से मोहरात्रि नांव परल. मोह पैदा कके रक्षा कइल. आ तिसरका ह कालरात्रि. ई रात तंत्र साधना करे वाला लोगन खातिर बड़ा महातम वाला होला. मां काली के साधना रात में कालरात्रि के रूप में कइल जाला.

एगो संस्कृत श्लोक में त ब्रह्मा जी कहतारे- “प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्व गुणात्रयविभाविनी. कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहारात्रिश्च दारूणा॥” माने हे माता रउवे तीन गुण (सत्व, रज आ तमोगुण) उत्पन्न करे वाली प्रकृति हईं. भयंकर कालरात्रि, महारात्रि आ मोहरात्रि रउवे हईं. एगो दोसरा श्लोक में ब्रह्मा जी कहतारे कि महाविद्या, महामाया आ महामेधा रउवे हईं. “देवी महात्म्य” में मेघा ऋषि कहले बाड़े- “भगवान के क्रियाशील शक्ति से परे महामाया हई जवन सगरे संसार के जोड़ि के रखले बाड़ी  सगरे सृष्टि के संचालित आ नियंत्रित करतारी. सब जीव-जन्तु उनहीं के प्रेरणा से काम करतारे सन.”

माता के कालरात्रि रूप बड़ा भयंकर ह. मुंह में खून लागल बा. रक्तबीज के जब गरदन काटल जाउ त ओमें से खून गिरे आ ओह खून के एगो बूंद से नया रक्तबीज पैदा होके लड़े लागे. एही से ओकर नांव भइल रक्तबीज- माने रक्त से पैदा हो जाए वाला. बस मां काली आपन जीभ बड़हन चुके कइके आ जवन खून जमीन पर गिरे वाला रहे, ओके जीभ पर ले लेसु. अब माता के जीभ पर त ऊ पैदा होई ना. माता त खुदे कालरात्रि रूप धारण कइले बाड़ी. उनुकरा के एही से तंत्रपूजा में महत्व दिहल जाला कि उनुका के सिद्ध कइला का बाद काल भा खतरा से हमेसा रक्षा मिली. केहू बाल बांका ना क पाई.

माता कालरात्रि के जीभ बाहर निकलल बा, गरदन में मुंडमाला, एक हाथ में खून से भरल बरतन, एक हाथ में राक्षस के काटल मूड़ी, बाकी हाथन में अस्त्र- शस्त्र. त बड़ा भयानक रूप ह कालरात्रि माता के. कालरात्रि के समय अंतिम सीढ़ी पार करे वाला कई गो तांत्रिक सिद्धि पा लेला लोग. माता के वाहन गधा ह. माने पशु भाव पर माता के कंट्रोल बा. माता के लाल रंग पसंद ह. उनुका के पान के भोग लागेला. उनुका कृपा से कुल डर-भय आ बड़का से बड़का बाधा जरि के राख हो जाले सन. अब आईं महालया के बारे में जानल जाउ. महा माने महान, आ आलया माने आगमन. माने महान माता के आगमन.

पितृ पक्ष के अगिला दिन से महालया शुरू हो जाला. वैज्ञानिक रूप से देखल जाउ त ओह दिन से मातृ शक्ति के वाइब्रेशन भा स्पंदन ऊंचा स्तर के रहेला. हर साल आश्विन महीना जवना के हमनी का ‘कुआर’ कहेनी जा के अमवसा भा अमावस्या तिथि के दिने महालया मनावल जाला. बंगाल में लोग महालया के बड़ा इंतजार करेले. एइजा ई बहुते शुभ दिन मनाला. महालया माने पितृपक्ष के समापन आ दुर्गापूजा के शुरूआत. इहो मान्यता बा कि देवी दुर्गा पाप आ घनघोर पाप कर्म करे वाला के नास करे खातिर महालया के दिने जनम लेले रहली. बाकिर एह साल यानी सन 2020 में मलमास यानी अधिक मास के कारन महालया पितृपक्ष के अगिला दिने ना सुरू भइल.

मलमास के एक महीना गैप देके तब महालया आइल ह. त महालया नवरात भा नवरात्रि के प्रारंभ करावे खातिर आवेला. एह नव दिन में मां दुर्गा के नौ रूप- शैलपुत्री (पहाड़ के पुत्री यानी चट्टान जइसन दृढ़ता), ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा (चंद्रमा जइसन चमक वाली), कुष्मांडा (पूरा जगत जिनका पैर में बा), स्कंदमाता (पार्वती पुत्र कार्तिक के एगो नांव स्कंद भी ह, स्कंद जी महावीर सेनापति कहल जालन), कात्यायनी (सुखद वैवाहिक जीवन खातिर आसिरबाद देबे वाली), कालरात्रि (काल के नाश करे वाली), महागौरी (ईश्वरीय अनुभूति करा वाली पवित्र सफेद रंग वाली मां), सिद्धिदात्री (सर्व सिद्धि देबे वाली माता) के पूजा होला.

नवमी का दिने जब मां दुर्गा के प्रतिमा के भसान होखे लागेला त एइजा के मेहरारू सिंदूरखेला करेली सन. सिंदूर मां के चढ़ावल जाला आ मेहरारू ओह सिंदूर के एक दूसरा के मांग में लगा देली सन आ एकरा के बड़ा शुभ  मानल जाला. काहें कि अइसन सिंदूर जीवन में हर घरी रक्षा करी आ ओह मेहरारू के पति के दीर्घायु करी. जब मां दुर्गा के प्रतिमा के भसान होखे लागेला- त भक्त लोग रोवे लागेला आ कहेला- “आस्छे बछर, आबार होबे” (अगिला साले फेर पूजा होई), आ “आबार एसो मां” (फेर अइह मां). मां त सब समय बाड़ी बाकिर भक्त लोगन के कहे के मतलब कि नवरात्रि नियर हाई वाइब्रेशन वाला समय- काल लेके फेरू आव मां.

आ भसान गाजा- बाजा, नृत्य करत होला. बंगाल के नवरात के उत्सव एक दिन ना तृतीया से ही शुरू हो जाला आ दसमी तक चलेला. दूनो बेरा ढाक बाजेला. ढाक का ह. ढोलक के बहुत बड़ रूप के कल्पना करीं. कुछ- कुछ ओइसने रूप होला ढाक के. एगो खास छोट छड़ी से ढाक के पीट के बजावल जाला. ओकरा लय पर बहुत लोग नाचेला. बजावे वालन के ढाकिया कहल जाला. देश के कवनो प्रांत में शायदे एतना दिन दुर्गापूजा लगातार चलत होई आ मेला के माहौल रहत होई. कोरोना के कारन ए कुल में फरक जरूर परी. ढेर लोग वर्चुअल पूजा परिक्रमा करी.
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