भोजपुरी में पढ़ें: बाराती लोगन से पहिले शास्त्रार्थ होत रहल ह

समय- समय के फेर बा, अब हर चीज खातिर पइसा लागी.

समय- समय के फेर बा, अब हर चीज खातिर पइसा लागी.

दुनिया भर में शादी बियाह के मौका पर नाच - गाना त होवे करेला, लेकिन भोजपुरी समाज में शादी के मौका पर एगो अलगे रिवाज है. इहां शादी के मौका पर बाकायदा शास्त्रार्थ होला. यही परंपरा के याद करत हवें लेखक

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 15, 2020, 12:37 PM IST
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जु के नवका पीढ़ी के मालूम नइखे. आजु से चालीस साल पहिले भोजपुरिया समाज में जब शादी होखे त बाराती में अइसन लोग जासु जे शास्त्रार्थ क सके. शास्त्रार्थ माने? पहिले जब बारात केहू किहां जाउ त द्वारपूजा का बाद, बारात ठहरे वाला जगह पर दुलहिन पक्ष के लोग आवसु आ दूल्हा पक्ष के लोगन से साहित्य, धर्मशास्त्र आदि विषय पर प्रश्न पूछसु (एकरे के शास्त्रार्थ कहाउ). एसे कि तनी देखीं त दूलहा पक्ष के लोग पढ़ल- लिखल आ विचारक बा लोग कि ना. ई बहुत पुरान परंपरा रहे. हमहूं कई गो बारात में शास्त्रार्थ कइले बानी. अचानके ई परंपरा गायब हो गइल. आ ओकर जगह जयमाल/ बरमाल ले लिहलस. जयमाल के परंपरा खर्चा बढ़ावे वाला बनि गइल. शास्त्रार्थ ठीक रहल ह. ओमें ज्ञान- विज्ञान के बात होखत रहल ह. अचानक ई परंपरा लुप्त एसे हो गइल कि लोगन के पढ़ाई आ ज्ञान वाला प्रसंग अच्छा ना लागल. तड़क- भड़क अच्छा लागल, एही से जयमाल के परंपरा शुरू भइल.

त परंपरा नया शुरू भइला में देरी ना लागेला. देखा- देखी में कौनो परंपरा स्थापित हो जाले. अब त जयमाल ना होखे तो सिकाइत होखे लागी. लोग कहे लगिहें- अरे जयमाल ना भइल ह? ई काहें? त ई हाल बा. अब सुंदर लय में गारी गावे वाली मेहरारुरुओ नइखी सन. ना त पहिले- “अगुआ के बहिनी छिनार, कइली चारि गो भतार” आ “बात बंद करो साले, सुनो अब गारी”, “देखला में भसुरा भंटा, एकदमे नाटे बा”, “रोल गोल्ड गहना ले अइल, ए भसुरा ई का तू कइल”, “हाथी, हाथी सोर कइल, गदहो ना लेअइल हो”, जइसन गारी अब नइखे सुनात. जेकरा के गारी दिहल जात रहल ह, ऊहो खुस होके सुनत रहल ह. बल्कि ऊ इंतजार करत रहल ह कि गारी गीत सुने के मिलो. अब त कौनो- कौनो गांव में भले कहीं- कहीं एकर झलक भले मिल जाता. बाकिर अब पुरनका जमाना के गारी लुप्त हो रहल बा. अइसना गारी के लोग बड़ाई करी. जे गावता ऊहो खुस, आ जेकरा के गारी दियाता, ऊहो खुस. अब त गारी के जगह पर कान फारे वाला संगीत आ गइल बा.

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एगो अउरी बात बा. पहिले बारात में धोती- कुर्ता आ पैंट- शर्ट दूनो तरह के पोसाक लउकत रहल ह. अब धोती- कुर्ता कहीं लउकते नइखे. सब पैंट- शर्ट में रहता. ई कौनो सिकाइत के बात नइखे, बदलाव के निसानी बा. पहिले गांव में घरे- घरे गाय पोसात रहली ह स. दूध- दही के कौनो कमी ना रहत रहल ह. बाकिर अब सानी- पानी के दुखे, केहू गाय नइखे राखत, कीनिए के मंगावता. आ हम त महानगर में रहतानी, एहिजा “अमूल” के आधा किलो पैकेट वाला दूध खूब मिलता. ओही से काम चलेला. टोंड दूध, माने अइसन दूध, जवना के मलाई निकालि के पैकेट में भरि दिहल जाला. हमनी के टोंड दूध किनेनी जा. त अब दूध कइसन बा ई रउवां नइखी जानत. बस कंपनी बढ़िया बिया, त दूध ठीके होई, मानि के चले के बा. महानगर में सबकरा खातिर गाय पालल भी संभव नइखे. जे तीन कमरा, भा दू कमरा के फ्लैट में रहता, ऊ खुद रही कि गाय के राखी. आ एहिजा लेहना (चारा) कहां से मिली, ईहो समस्या बा. आफिस में काम करे वाला आदमी आफिस आ घर के कामे में अझुराइल रहता त गाय कहां से पाली, खरी- खुदी कहां से ले आई. त ई कुलि देखि के पैकेट के दूध कीनल ढेर बढ़िया बा.
जब बारात के बात चलल त एगो किस्सा मन परि गइल. हमरा जिला में एक जना बाबू साहेब रहले. नांव रहे खखोरन सिंह. अब ई मत पूछीं कि खखोरन कौन नांव ह. किस्सा ई बा कि ऊ कौनो बरात में जासु त 50 गो पूड़ी के पहिले उनकर पेट ना भरे. पूरा खखोरि के खासु. त नांवे परि गइल खखोरन सिंह. उनुकर असली नांव लोग भुला गइल. इहे नांव प्रसिद्ध हो गइल. त एक बेर हमरो गांवे बरात में खखोरन सिंह अइले. पहिलहीं से हल्ला हो गइल कि खखोरन सिंह आवतारे. जेकरा घरे बरात आवत रहे ऊ खियावे के सौकीन आदमी रहले. भगवान उनुका के धन- दौलत भी देले रहले. तय भइल कि खखोरन सिंह के अलग कमरा में बइठा के पसन से खियावल जाई. बारात आइल. खखोरन सिंह तय समय पर खाये बइठले. पहिले उनुका पत्तल पर दू गो पूड़ी रखाइल तो ऊ हंसे लगले. खियावे वाला हाथ जोरि के पुछले कि कौनो गलती भइल होखे त माफ करीं. खखोरन सिंह कहले कि गलती नइखे भइल. रउवां हमरा बगल में एगो स्टूल पर पचास गो पूड़ी राखि दीं, एगो बड़का पत्तल में तरकारी, हर तरकारी खातिर अलग पत्तल. अंत में दही- बुंदिया देब. दही एक जग, आ बुंदिया एक किलो राखीं.

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ऊहे भइल. अब लोगन के उत्सुकता कि खखोरन सिंह खात कइसे बाड़े. सब देखल कि उनुकर एक कौर आधा पूड़ी के बराबर होता. हमरा जिला में हाथी के कान नियर बड़े- बड़े पूड़ी बनेली सन. त आधा कौर के अंदाज लगा लीं. सब खड़े रहे आ एक घंटा में सब पूड़ी- सब्जी खाइ के अब दही- बुंदिया पर टूटि परले. खाना से तृप्त होके जब उठि के डकार लिहले तो लोगन के खुशी भइल. चले के बेर खखोरन सिंह कहले कि शादी- बियाह में हम तनि कम खानी. ई हमार सिद्धांत ह. दुलहिन के चाचा हाथ जोड़ि के कहले कि कवनो कमी रहि गइल होखे त माफ करब. त खखोरन सिंह हंसि के कहले- एतना स्वादिष्ट खाना रहल ह कि मन खुस हो गइल. लेकिन उनुकरा एह बाति से लोग चकित हो गइल कि ऊ शादी- बियाह में कम खाले. जब कम खइला पर ई हाल. त भर पेट कतना खात होइहें. लोग चकित भइल तो होखो, खखोरन सिंह दुआर पर पान लेके बइठे वाला से पान लगववले आ मुंह में डालि के आनंद से बारात ठहरे वाली जगह पर चलि गइले.

बाकिर उनुकर पराक्रम के किस्सा भी बा. एक हाली उनुका गांव के एगो घर में चोर ढुकले सन. घर के लोग जागि गइल. चुपके से एगो घर के आदमी खखोरन सिंह के खबर कइलसि. बस खखोरन सिंह लहेटि के चोरन के ध लिहलन. दूनों हाथ से दू गो चोरन के ध  लिहले तो चोर कतनो हात छोड़ाव सन, खखोरन सिंह के हाथ लोहा नियर मजबूत रहे. चोरन के एगो खंभा में बान्हि के सबेरे के इंतजार भइल. पुलिस के बोलावल गइल आ चोर लोगन के सौंपि दिहल गइल. कतहीं शारीरिक शक्ति के जरूरत बा त खखोरन सिंह असंभव के संभव बना देत रहलन ह. अब ओइन लोग ना खाए वाला बा, ना शक्तिशाली बा. पहिले गांव में अखाड़ा रहत रहल ह. अब त गांव से अखाड़ा आ पहलवानी लुप्त हो गइल बा. छोटे- छोटे शहर में जिम खुलि गइल बा. रुपया जमा करीं आ मशीन पर व्यायाम करीं. फ्री के गांव के अखाड़ा आ कुश्ती- व्यायाम सिखावेवाला अब ना मिली केहू. पहिले के जमाना गइल. अब हर चीज खातिर पइसा लागी. समय- समय के फेर बा. हमनी के मानहीं के परी.
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