भोजपुरी में पढ़ें: जब नाति खातिर एगो बूढ़ि गांधी से मंगलसि आसीरवाद

गांधी जी के जयंती भले बीत गइल बा. बाकिर अक्टूबर के महीना एक लेखा पर गांधीए जी के नाम पर यादि रहेला. एही संदर्भ में गांधी जी के बलिया से जुड़ल एगो किस्सा प्रस्तुत बा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 8, 2020, 5:08 PM IST
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बिहार के दरभंगा के बेटा रामनंदन जी पढ़ते खानी गांधीजी के असर में आ गइले. पटना में गांधीजी के भेंट के बाद उनुकरो मन गांधीए जी में लागे लागल. चूंकि गांधी जी के सलाह रहे कि सोलह साल से नीचे उमिर वाला लोग पढ़ाई आ घर ना छोड़ी. एह वजह से रामनंदन जी सोलह साल के उमिर पूरा होखे के बाट जोहत रहले. जइसइहें सोलहवां साल लागल. ऊ घर से भागि गइले. गांधीजी परदा के रेवाज के विरोधी रहले. एह वजह से बिहार में 1928 में रामनंदन जी परदा के विरोध में आंदोलन चलवले. जवना संबंध में गांधी जी 28 जून 1928 के यंग इँडिया के अंक में संपादकीय लिखले. गांधी जी के बेटा के रूप में रामनंदन जी मसहूर रहले. बाकिर इतिहास उनुका के एक तरह से अनदेखा कइ देले बा. बहरहाल रामनंदन जी गांधी जी से जुड़ल बलिया के एगो खिस्सा आपन किताब ‘संस्मरण’ में लिखले बाड़े. शायद 1928 के साल रहे.

गांधी जी बिहार के आपन यात्रा खतम कइ के संयुक्त प्रांत खातिर रेल से चलि दिहले. ओह घरी उत्तर प्रदेश के संयुक्ते प्रांत नाम रहे. गांधी जी के ई सफर छपरा स्टेशन से शुरू भइल. रामनंदन जी के मोताबिक, छपरा से संयुक्त प्रांत के गांधी जी यात्रा के इंचार्ज जवाहर लाल नेहरू इलाहाबाद से आके बनि गइले. गांधी जी तब रेल के तीसरा दर्जा में सफर करत रहले. ओह घरी रेल के अफसर लोग गांधी जी खातिर पूरा एगो डिब्बा रिजर्व कइ देत रहले. गांधी जी के एगो सीट पर बिस्तरा बिछि जात रहे. रामनंदन जी लिखले बाड़े कि ओह यात्रा में गांधी जी संगे जवाहरलाल नेहरू, पूर्णिया के जीमूतवाहन, रामनंदन जी आउर पांच-छह लोग रहे. गांधी जी के छपरा के बाद पहिलका कार्यक्रम बलिया में रहे. ओह घरी अखबार-रेडियो ना रहे. तबो लोगन के पता लागि गइल रहे कि गांधी जी रेल से बनारस के ओरि जा तारे.

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लोगन के भीड़ स्टेशन पर जुटि जात रहे. रामनंदन जी के मुताबिक, ओह यात्रा में गांधी जी स्टेशन पर आइल भीड़ से हरिजन सेवा खातिर पइसा मांगे लागत रहले. गांधीजी के अइसन असर रहे कि जेकरा पाले जेतना पइसा रहत रहे. ऊ गांधी जी के हाथ पर धइ देत रहे. रामनंदन जी के जिम्मेदारी रहे कि अगिला स्टेशन आवे से पहिले सब पइसा के गिनि के ओकरा के एगो बही में लिख ल. फेरू सब बटोराइल पइसा के अगिला पड़ाव पर ड्राफ्ट बनवा के दिल्ली स्थित हरिजन सेवक संघ के कार्यालय पर भेजवावे के रहे. छपरा से बनारस के ओरि जात खानी बलिया जिला में ओह घरी सुरेमनपुर स्टेशन पहिलका स्टेशन रहे. अब सुरेमनपुर बलिया में दूसरका स्टेशन बा. पहिलका स्टेशन बा जयप्रकाश नगर. जयप्रकाश जी के नाम पर एकर नाव रखाइल बा. कुछु साल पहिले ले एह स्टेशन के नाम बकुल्हा रहे. गांधी जी तब ले महात्मा नाम से मसहूर हो गइल रहले.
गांव-देहात में महात्मा खातिर काताना सारधा होला. . ई गांव-देहातिए में जाके देखल जा सकेला. त करीब एक सौ दस साल पहिले के असर के अंदाजे लगावल जा सकेला. सुरेमनोपुर स्टेशन पर गांधी जी से मिले खातिर भारी भीड़ जुटल. ओह में एगो परिवार रहे. जवना में एगो बूढ़ी माई रहलि. उनुकर बेटा आउर पतोहि रहे. .  ऊ लोग एगो बोका लेले रहे. ओह बोका के माथ पर सेनुर के टीका लगावल रहे. ऊ बूढ़ी माई महात्मा जी के सामने रेल के खिड़की के पास पहुंचि गइली. संगे घूघ कढ़ले उनुकर पतोहि रहलि. रामनंदन जी लिखले बाड़े, जवना के भोजपुरी अनुवाद इहां दियाता. रामनंदन जी के मोताबिक, “ऊ बूढ़ी माई अपना पतोहि के हाथ में ओह बोका के रसरी पकड़ा दिहली. फेरू गांधी जी से निहोरा कइलि. ए बाबा, हामारा पतोहिया के बेटा नइखे होत. एकरा माथा पर आप हाथ रखि के आसीरवाद द.”

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एह घटना के बाद ओह परिवार के लोग ओह बकरा के गांधी जी के डिब्बा में घुसा दिहले. बहरहाल एह घटना से गांधी जी समेत उनुका संगे रहल सब लोग अचकचा गइल. बाद में बकरा के उतारल गइल.  रामनंदन जी लिखले बाड़े कि एह घटना के बाद जब सुरेमनपुर स्टेशन से रेलगाड़ी चलि दिहलसि त एह घटना के यादि कइ के गांधी जी आउर जवाहरलाल समेत सभ लोग ठहाका मारि के हंसे लागल.
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