नवरात्रि 2020, भोजपुरी में पढ़ें: निमिया के डाढ़ मइया

लोकपरंपरा आ लोकगीत देवी-देवता के देवत्व के परिधि से निकाल के सामान्यीकरण करेला. लोक परंपरा में देवी-देवता के चमत्कार भा ताकत के पूजा ना होला बलुक अपनापा के रिश्ता जोड़ के, घर-परिवार के सदस्य बना मान देबल जाला.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 17, 2020, 1:55 PM IST
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शारदीय नवरात्रा शुरू हो रहल बा. कोरोना काल बा, एह से सार्वजनिक रूप से दुर्गा पूजा के उत्सव त ओह लेखा ना होई, जइसन कि हर साल होखत रहे बाकि तबो लोग के उत्साह-उमंग त ओही लेखा बा. सार्वजनिक रूप से दुर्गा पूजा में भले कमी होखो बाकि घर-घर में होखेवाला देवी पूजा के ले के त उत्साह-उमंग-आस्था-श्रद्धा में त कवनो कमी नइखे. कवनो वजह भी नइखे कमी होखे के. बलुक ई कहल जा सकत बा कि ई कोरोना काल के जल्दी खतम होखे के आस में, एकरा से निजात पावे खातिर श्रद्धा-भाव आउरी बढ़ल ही बा. जब नवरात्रा शुरू होखी त मूल त सभे जानत बा कि घरे-घरे पूजा-पाठ होखी. कलश के स्थापना होखी. देवी-दुर्गा के पाठ होखी. बाकि ई कुल के मूल में एगो अउरी चीज रही, देवी गीतन के गवनई शुरू होखी. देवी भजन, देवी गीत आ पचरा गीतन के गवनई शुरू होखी. हमनी के आज के बतकही इहे देवी गीतन के ही दुनिया प ही होखी. पारंपरिक देवी गीतन के दुनिया से गुजर के जब एह नवरात्रा के समझे के कोशिश करब भा एकरा के देखब तक एगो नया आयाम देखे के मिली.

रउआ अबकी के नवरात्र में जब सार्वजनिक दुर्गा पूजा में, मेला आदि में नइखे जाये के त घरे रह के देवी-दुर्गा के गीतन के दुनिया समझे के कोशिश करीं. देखब कि जब शास्त्रीय तरीका से, मने संस्कृत वाला श्लोक आदि से देवी-दुर्गा के पाठ होला, अराधना होला, त ओकरा में देवी-दुर्गा के रूप कईसन रहेला. देवी शक्तिशाली रहेली,चमत्कार के भी कथा-कहानी रहेला. देवी इंसानी दुनिया से अलग विशेष परिवार के सदस्य नजर अइहें. देवता परिवार के. दुश्मनन के मारत, संहार करत, कई गो चमत्कार करत. बहुत सावधान रहे के पड़ी कि कवनो गलती ना हो जाव देवी के अराधना में भा पूजा में. अब एही संगे रउआ देवी के गीतन के दुनिया से देवी के पूजा भा देवी आ भक्त के रिश्ता के स्वरूप समझे के कोशिश करीं. कवनो एगो पारंपरिक गीत उठा के देख सकत बानी. उदाहरण के रूप में भोजपुरी इलाका में सबसे लोकप्रिय पारंपरिक गीत निमिया के डाढ़ मइया के ही सुनीं. एह गीत के सुनब त एगो कहानी लेखा अहसास होखी. नीम के डाढ़ प देवी झुलुआ खेल रहल बाड़ी. उनका पियास लागत बा. उ उहां से चलत बाड़ी.

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मालिन के घरे पहुंचत बाड़ी. पूछत बाड़ी कि सुतल बाडू कि जागल बाड़ू मालिनत्र. बड़ा तेज पियास लागल बा. हमरा के एक बुंद पानी देतू. मालिन देखत बिया कि देवी सामने आईल बाड़ी बाकि उ हड़बड़ात नइखे, चकित नइखे होखत देवी के अपना दुआरी देख के. उ आपन बच्चा के गोदी में खेला रहल बिया तब. उ देवी के संवाद कर रहल बिया. कहत बिया कि राउरे कृपा से प्राप्त भइल बच्चा गोद में बा, आवत बानी सूता के, त पानी पियावत बानी. मालिन आराम से बच्चा के ले के जात बिया, आवत बिया त पानी पिया रहल बिया देवी के. पानी पी लेला के बाद मालिन के आशिर्वाद दे रहल बाड़ी. अब एही गीत से रउआ लोक परंपरा में देवी के पूजा-पाठ भा देवी आ भक्त के रिश्ता-नाता समझे के कोशिश करीं. ई खाली एगो गीत त उदाहरण में बा. असल में जेतना भी पारंपरिक देवी गीत बा भा पचरा गीत बा, ओकरा से एह रिश्ता के समझे के कोशिश करब त मोटा-मोटी एक ही लेखा भाव आई. उ भाव ई रही कि लोक परंपरा आ लोकगीत कवनो देवी-देवता के सामान्यीकरण करेला.
उ देवी-देवता के देवत्व के परिधि से निकाल के सामान्य इंसान के करीब लावेला. देवी-देवता के इंसानी दुनिया से अपनापा के रिश्ता जोड़ेला. घर-परिवार के सदस्य लेखा बनावेला. घर-परिवार के सदस्य लेखा मान के मान-आदर देला. चमत्कार आ ताकत के पूजा ना करेला बलुक श्रद्धा के अलगा भाव राखेला. फेरू इहो बात समझ में आई कि लोक परंपरा में देवी-देवता भी इंसानी दुनिया से बहुत सहज रिश्ता राखेला. अगर देवी के पियास लागी त देवी खुदे पानी मांगे जइहें, अगर भक्त सहज भाव से कहलस कि तनिका इंतजार करीं त इंतजार करिहें. ई खूबसूरती लोकगीतन में ही मिली. ई त एगो देवी गीतन के उदाहरण देबल गइल बा. नवरात्रा के खतम भइला प दशहरा भी आवेला. राम के पूजा के पर्व. राम के भी लोकगीतन के दुनिया से देखब त अइसने भाव नजर आई. लोकगीत त राम के भी देवता के परिधि से निकाल के आपन करीब लावेला, आपन बनावेला.

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 त, अबकी कोरोना काल में जब आराम से घरे रहि के नवरात्रा आ दशहरा मनावे के संयोग जुटल बा त एह दुनिया के समझे के कोशिश करे के काम बा. जे लोकगीतन के दुनिया से, लोकपरंपरा से देवी—देवता से इंसानी दुनिया के रिश्ता समझ ली, उ जीवन में कबो धरम के ले के उन्मादी नइखे हो सकत. उ कब्बो अंधविश्वासी नइखे हो सकत.

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