भोजपुरी में पढ़ें: सद्भाव के धरती हौ भोजपुरिया माटी

भोजपुरी में पढ़ें: सद्भाव के धरती हौ भोजपुरिया माटी
कबीर भोजपुरिये माटी के सपूत रहलन आ बाबा गोरखनाथ इहाँ आके अपनही ई माटी के अपनौले रहलन.

जौन कबीर पूरी जिनगी कासी में बितवला के बाद अंतिम साँस लेवे बदे मगहर आ गइलन, खाली एह नाते कि इहाँ के बारे में एठे अंधबिस्वास मिटावल जा सके, ओही कबीर के देह के लेके दुनो लड़ि गइले.

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  • Last Updated: September 15, 2020, 11:18 AM IST
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हिंदू मूआ राम कहि, मुसलमान खुदाई।
कहै कबीर सो जीवता, जे दुहुँ के निकट न जाई।।

कबीर के पूरी जिनगी सबके इहे समझावत बीत गएल कि राम-रहीम में कौनो फरक ना हौ. ईश्वर-अल्ला दुनो दुइ ना, एक्के बाति हवें. ई मनइन के बनवल सबद हवें, बकिर अपने मूल रूप में ई चेतना एक्के हवे आ एही एक्के चेतना के अलग-अलग भाखा में अलग-अलग सबद... आ कुल जोड़ीं त खाली ईसर-अल्ला भर ना... कम से कम लाखन सबद हवें. सब बुझबो कइलस. बलुक जे तनी बुझलस तेही उनके लग्गे ले आइल, उनकर चेला बनल. बकिर तबो एह सद्गुरु के सरीर छोड़ला पर हिंदू-मुसलमान आपसे में भिड़ि गइलन. जौने कबीर साहब के पूरी जिनगी तरह-तरह से खाली करमकांड के निसारता समझौले में चलि गैल, ओही कबीर के पार्थिव देह चेला लोगन के बीचे आपन-आपन करमकांड निभौले के अहंकार आ ओकरे टकराव के सिकार हो गैल. उनके चेलन में त हिंदू-मुसलमान दूनो रहलन. जौन कबीर पूरी जिनगी कासी में बितवला के बाद अंतिम साँस लेवे बदे मगहर आ गइलन, खाली एह नाते कि इहाँ के बारे में एठे अंधबिस्वास मिटावल जा सके, ओही कबीर के देह के लेके दुनो लड़ि गइले. हिंदू कबीर के अंतिम संस्कार अपने ढंग से कइल चहले आ मुसलमान अपने ढंग से. बकिर कहल जाले कि लोग लड़ते रहल कि देही से फूल जइसन सुगंध उठे लगल आ जब लोगन चादर हटौलस त उघरला पर देह गायब मिलल. कबीर साहेब के माटी के जगहीं रहलन कुछ खिलल फूल. चेला लोगन के अपने लड़ले के फजूलपन पता त चल गैल, लेकिन तबो लोगन बनवलस उहाँ दुइए गो चीन्हा, एक्के जगहीं. मगहर में एक्के जगह के आधा हिस्सा में कबीर जी के समाधि हौ और आधे में मजार. समाधि पर आजो फूल-अगरबत्ती चढ़ेले आ मजार पर चादर. एक्के जगह पर बनल आ पूरा सांतिपूर्ण ई स्मारक अबहिनो सद्भाव के ऊ पूरी कहानी अपने आपै बखानेले जौने के सनेस अब से करीब 6 सौ साल पहिले कबीर दीहल चहले रहलन.

गोरखपुर से लखनऊ वाली सड़की पर कुल जमा 28 किलोमीटर के दूरी पर मगहर हौ. मगहर गाँव राजमार्ग से तनी हटि के हौ. ढेर नाईं, बस ई बूझीं कि करीब एक-डेढ़ मील. मगहर के सबसे बड़हन चीन्हा आज के तारीख में देखीं त कबीर साहेब से ही जानल जाले. बेसक ई कौनो मामूली यादगार ना हौ. बकिर मगहर के ऊ अंतिम सीमा ना हौ, बइसहीं जइसे मगहर कबीर साहेब के अंतिम सीमा ना हौ, बावजूद एकरे कि ऊ आपन देह वहीं छोड़ले. मगहर के जानल इतिहास चलल आवत हौ भगवान बुद्ध के समय से आ एह इतिहास के नवीनतम सोपान आवेले स्वतंत्रता संग्राम तक. आ हर बात के साखी इहाँ सांस्कृतिक भ पुरातात्विक कौनो न कौनो रूप में मौजूद जरूर हवे. भगवान बुद्ध के वैसे त पूरा जीवनचक्र जहाँ बीतल, ऊ इहे जवार हौ. एही मगहर से करीब 112 किलोमीटर के दूरी पर कपिलवस्तु हौ, जहाँ राजकुमार सिद्धार्थ के पिता सुद्धोदन जी के राजधानी रहे, जहाँ से करीब 60 किलोमीटर दूर लुम्बिनी (अब नेपाल) में उनकर जनम भइल रहल. आ एही मगहर से करीब 85 किलोमीटर के दूरी पर कुसीनगर हौ, जहाँ भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के उपलब्धि भैल. हाँ, उनकर आना-जाना इहाँ से बहुत आगे, बनारस, आज के बिहार में बैसाली आ पच्छू ओर स्रावस्ती तक करीब-करीब अनबरत रहल. अइले-गइले के एही क्रम में भगवान बुद्ध के अंगुलीमाल मिल गैल रहलन.
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रउरे पचन ठीक बूझत बानी. उहे अंगुलीमाल जौन खाली लूटबे ना करत रहलन.. आवे जाए वाले मनइन के मार के उनकर अंगुरी अपने गटई में माला बना के पहिन लेत रहलन. एही से उनकर नाम अंगुलीमाल रहल. मने ऊ जे अंगुली यानी कि अंगुरी के माला बना के पहिनत हो. वैसे अंगुलीमाल के असल काम माला पहिनल ना रहल. ई त आपन आतंक फैलौला के उनकर तरीका रहल. असली काम उनकर रहल लूटमार. मगहर तब जंगल रहल आ ओही जंगल से होके ही ओह समय के मुख्य रास्ता जात रहल. एह राही आवे-जाए वालन के अकसर अंगुलीमाल लूट लेत रहलन. जेके मालूम हो जा कि अंगुलीमाल धावा बोल देहले हवें, ऊ आपन माल-असबाब सब राही पर ध के भाग के कहीं छिप-छिपा के आपन जान बचावे. आ जेके ना मालुम हो ते बेचारू अंगुलीमाल के हाथे परि के आपन जान गंवावें. एही नाते एकर नाम रहे मार्गहर. मार्गहर यानी ऊ जगह जहाँ मार्ग अर्थात् राही में सब चीज के हरण यानी लूटमार या चोरी-छिनैती हो जासु. एही मार्गहर सबद के अपभ्रंस हौ मगहर. कहल जाला कि एही जगही पर भगवान बुद्ध के अंगुलिमाल मिलल रहले आ जब ऊ भगवान बुद्ध के लूटे अइले त भगवान उनकर मन बदल के डाकू से साधू बना लेहलन. खाली सद्भाव ना, सद्भाव के मूर्तमान असर के एसे निम्मन उदाहरन और का हो सकेले!

ऊ मार्गहर जौन भगवान बुद्ध के समय में जंगल रहल आ कबीर के समय में गाँव, अब कस्बा हौ आ नगर पंचाइत बनि गैल हौ. एकरे नगर पंचाइत बनले के भूमिका सुरू भैल स्वतंत्रता संग्राम के साथे, जब गान्ही बाबा के परभाव में इहाँ गान्ही आसरम बनल. गान्ही आसरम के अबहिनो इहाँ बहुत बड़हन कारखाना हौ आ ओह कारखाना के खासियत ई हौ कि उहाँ अबहिनो हर काम ठेठ परंपरागत तरीके से होले. कबीरदास जी के समय में मगहर के जौन छबि रहल, एकरे मूल में कारण कंचित उहे मार्गहर वाला रहल. अंगुलिमाल के पाप के असर मानल जात रहे जौने के नाते ई अंधबिस्वास रहल कि उहाँ मरे वालन के नरक जाए के परेले. वैसे एकरे अलावा भी जवारी तौर पर एके लेके कई धारणा बा.

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मगहर आमी नदी के तट पर बसल हौ. कबीर साहब के समाधि आ मजार ई दुनो आमी नदी के पच्छू हौ. पच्छुए ओर गान्ही आसरम भी हौ. ई सब मगहर कस्बा के हिस्सा हौ. बकिर एह नदी के दुसरी ओर यानी पुरुब कबीर साहब के धूनी हौ. एके कबीर धूनी मंदिर कहल जाले. आ एही ओर गुरुद्वारा भगत कबीर हौ. एह जगह के साथे भी कुछ ऐतिहासिक घटना जुड़ल हई. हालाकि ऐतिहासिक कहल जाए वाली एह घटना के ऐतिहासिक कालक्रम से जोड़ के देखल जाए लायक नाहीं बा. काहें से कि उपलब्ध इतिहास कुछ और कहाला, बकिर लोक के बिस्वास कुछ और. लोक के बिस्वास खाली एहि जे ना, कई और जगह के बारे में भी अइसने हौ. इहाँ के बारे में ई मानल जाले कि आज के कबीर धूनी ऊ जगहि हौ जहाँ कबीरदासजी और गुरु गोरखनाथजी के भेंट भइल रहल. कबीर साहेब पहिले एही जा आइल रहलन आ एहीं ऊ आपन धूनी जरा के राति बितवले. ऊ धूनी अबहिन तक जरत चलि आवत हौ. कहल इहो जाला कि एही जगह गुरु गोरखनाथ आ कबीरदास जी के बीचे में सास्त्रार्थ भइल रहल. कुछ लोग इहो बतावेलन कि एह गोस्ठी में गुरु नानकदेव जी भी रहलन.

अब अगर कालक्रम के हिसाब से जोड़ के देखल जाई त गुरु गोरखनाथ जी के जीवन के संभावित काल बड़ा लंबा बा, लेकिन तबो ऊ 12वीं सदी ईसवी के आगे ना बढ़ेले. गोरखनाथ जी के जौन उपलब्ध पद हवें उनकर भाखा ई बतावेले कि ऊ दसवीं सताब्दी से पहिलहीं रहलन आ कुछ पुरातात्विक प्रमाण उनकर जीवनकाल 11वीं सताब्दी तक भइल प्रमाणित करेलन. ऊ लोगन के बात छोड़ दिहल जा जे जौन मानाला ओही के जानल कहेला, त अबहिन तक के सोध के आधार पर उनके दैहिक अस्तित्व के 11वीं सताब्दी से आगे कौनो प्रमाण ना मिलेले. एही नाते उनके संभावित तौर पर 11वीं सताब्दी में मानल जाला. एकरे मूल में सबसे महत्वपूर्ण बा जॉर्ज वेस्टन ब्रिग्स के सोध. जौन उनके प्राथमिक स्रोत आधारित अति महत्वपूर्ण सोध प्रबंध ‘गोरखनाथ एंड कनफटा जोगीज़’ में देखल जा सकेले. बाद में रांगेय राघव, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी आ पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल जी के निष्कर्ष भी सारे सोध के बाद इहे आइल. जबकि कबीर साहब के जीवनकाल 15वीं सताब्दी में हौ. कुछ लोग इनकर जीवनकाल 1398 से 1448 ई. मानेलन, त कुछ लोग 1440 से 1518 ई.. बकिर उनकर जीवनकाल 1398 यानी चदहवीं सताब्दी के अंत से पहिले कौनो तरह से प्रमाणित न होले और न 16वीं सताब्दी के सुरुआती दुइ दसक के आगे. दुसरी ओर गुरु नानकदेव जी के सांसारिक जीवनकाल कार्तिक पूर्णिमा 1469 से लेके 22 स्तंबर 1539 तक हौ. अब एह हिसाब से अगर सांसारिक तौर पर देखीं त न त गुरु गोरखनाथ जी के कबीरदास जी से मिलले के कौनो संभावना हौ आ न कबीरदास जी के गुरु नानकदेव जी से मिलले के कौनो संभावना हौ. लेकिन एक बाति इहो हौ कि जौने उलटबाँसी के लिए खासतौर से कबीर साहेब के जानल जाला ओकर उद्गम गुरु गोरखनाथ जी हवें. आ फेर आगे चल के गुरु नानकदेव जी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में सबसे सम्मानित स्थान जेके देहले हवें ऊ कबीरदास जी हवें. एह तरह से देखीं त ई एक ठे अनवरत प्रवाह हौ, जौन भले भौतिक रूप से कहीं न मिलल हो, लेकिन आध्यात्मिक रूप से तीनो में बहुत सघन संबंध हौ.

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हालांकि तीनों लोगन के एह गोस्ठी के साथे खाली सास्त्रार्थे ना जुड़ल हौ, एहमें कई ठो चमत्कार भी जुड़ल हौ. बकिर ई कुल से ई तीनों महातमा लोगन के कौनो संबंध ना रहल. तिनहुन लोगन के मूल संदेस सहज जीवन आ सद्भाव के रहल. कौनो आडंबर ना, कौनो करमकांड ना, बस सहज सरल भक्तिभाव आ ऐसने जीवन. सहज जीवन आ सरल भक्तिभाव में चमत्कार बदे कौनो जगहिये न होले. फिर ई सब कहाँ से आ गैल? एकर जवाब हमके मिलल अक्षय कुमार बनर्जी जी के कृति ‘फिलॉसफी ऑफ गोरखनाथ’ के हिंदी अनुवाद ‘गोरख-दर्शन’ में. एकर आमुख लिखले हवें डॉ. संपूर्णानंद जी. ओही में ऊ फरियावेलन, “बहुत सी किंवदंतियां हैं, कुछ की ऐतिहासिकता संदिग्ध है, किंतु वे अब जन-साधारण की लोक-लहरी या गीतों का अंग बन गई हैं. जन-साधारण की दृष्टि में गोरखनाथ का क्या स्थान रहा है, इसका प्रमाण एक अप्रत्याशित-अचिंतनीय क्षेत्र से प्राप्त होता है. कुछ संतों के अनुयायियों ने, गोरक्ष से कई शताब्दियों बाद में पैदा हुए थे, स्पष्टतः अनुभव किया कि उनके गुरुओं की प्रसिद्धि और महत्व तब तक सुरक्षित नहीं होगा, जब तक वे उन्हें गोरक्ष से महत्वपूर्ण व्यक्ति सिद्ध न करें. इसलिए गोरक्ष तथा उनके मतों के प्रवर्तकों के बीच होने वाले विवादों की कहानियाँ गढ़ ली गईं.”

बात अगर संत लोगन के कइल जा त ई तीनो लोगन अपने पूरे जीवन भर खाली सद्भाव के संदेस देहलन. कबीर भोजपुरिये माटी के सपूत रहलन आ बाबा गोरखनाथ इहाँ आके अपनही ई माटी के अपनौले रहलन. निस्चित रूप से कौनो त बाति रहल कि एक बेर इहाँ आ गइले के बाद उ एहीं के होके रहि गइलन. ई दुनो जनी के चेलन में हिंदू-मुसलमान दूनो हवें आ बाबा नानक के साथे भी इहे बाति हौ. तीनो जने के सद्भाव के जौन सनेस हौ ओके हमन के भोजपुरिया माटी बड़े निमने बुझलस आ अपनौलस. एकर जीवंत प्रमाण हौ बमुस्किल तीन से चार किलोमीटर के दायरा में एक्के गो संत कबीर साहब के नाम से जुड़ल मंदिर, समाधि, मजार और गुरुद्वारा. देखल चाहीं त आईं न, आमी माई बोलावति हईं.
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