भोजपुरी विशेष : शीलहरन के सिलसिला- समाज में कब ले बनल रही ई दिमागी विकृत सोच?

दरिंदगी के एगो आउर घिनावन दास्तान. एगो आउर 'निर्भया' हैवानियत के शिकार होके आखिरकार दम तूरि दिहलस.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 5, 2020, 9:16 AM IST
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हाथरस में कबो काका हाथरसी आ निर्भय हाथरसी नियर हास्यावतारन के हास-परिहास से भरल चुटीली कविताई गूंजत रहे, उहवां एगो अबला निर्भया का संगें अइसन हैवानियत! खेत में काम करेवाली मेहनतकश बेटी के बाजरा के खेत में ले जाके सामूहिक दुष्करम का बाद रीढ़ के हड्डी तूरल आ जीभि काटल पशुता ना, त आउर का कहाई! पुलिस-प्रशासन आ चिकित्सको के भूमिका नकारे वाला. तका एह समाज से संवेदनशीलता के एकदमे लोप हो गइल बा?


 ई अंतहीन सिलसिला नया-नया इतिहास रचि रहल बा. कवनो दिन अइसन बांव नइखे जात, जवना रोज शीलहरन के जघन्य वारदात ना छपल होखे अखबारन में. परिवार आ समाज के मान-मरजाद का चलते अइसन ढेर खबर ना त पत्र-पत्रिकन में छपि पावेली स, ना मीडिया का सोझा आवेली स. थाना पुलिस आ कोट-कचहरी में त पहुंचे के सवाले नइखे. जहवां हिफाजते करेवाला बटमार होखसु, उहवां फरियाद का करे के बा!जब रक्षके भक्षक होइहें, त इंसाफ मिले के उमेदिए का कइल जा सकेला! कोट-कचहरी के रवैया प चेतावत कैलाश गौतम जी ठीके कहले बाड़न—




'कचहरी तो बेवा का तन देखती है,
किधर से खुलेगा बटन, देखती है,
भले जैसे तैसे गिरस्ती चलाना,


मगर मेरे भाई, कचहरी न जाना. '



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ढेर दिन भइल, एगो मज़बूर मजूर महिला के अपहरन आ बलातकार के एगो ममिला अदालत में पहुंचल रहे. वकील साहब बेरि-बेरि तूरि-मरोरिके सवालन के झड़ी लगावते रहि गइल रहलन कि अपहरन करत खा ऊ भगली काहें ना भा चिचिअइली काहें ना?एकर माने ई कि उन्हुको रजामंदी रहल होई--उहो जरूर आनंद लेले होइहें--वगैरह वगैरह!अइसन बेशरम सवालन के भरल अदालत में सुनिके ऊ अनपढ़ मजूर औरत के जबान पर शरम आ तिरमिरी से चुप्पी के ताला लागि गइल रहे. नतीजा ई भइल कि अपराधियन के वरी क दिहल गइल आ ओह विवाहिता के मरदो चरित्रहीनता के लांछन लगाके घर से बेघर कऽ दिहलस.


वाह रे हमनीं के भारतीय समाज!
जवना घरी भोजपुरिया समाज के निर्भया का संगें अइसने हादसा भइल रहे, त सउँसे देश के खून खउलि उठल रहे आ गुनहगारन के फांसी देबे के समवेत सुर बुलंद भइल रहे. ओह समय अइसन लागल रहे कि एह किसिम के कुकरम करेवाला अब अपना हरकत से बाज अइहन स. बाकिर फैसला आवे में सात साल लागि गइल रहे आ गुनहगारन के फांसी दिहला के बावजूद एह तरह के अपराधन में कवनो कमी ना आइल आ लगातार एह में इजाफा होत चलि गइल रहे.


राजस्थान विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र के प्राध्यापक के एगो शोध रपट के मुताबिक, बलातकार पीड़ित बेयालिस महिला से बतकही आउर दस्तावेज के छानबीन के बाद एह तथ के तह ले पहुंचे में कामयाबी मिलल रहे कि ओहमें अठाइस गो कुंआरी, तेरह गो बियहल आउर एगो विधवा रहली. पच्चीस गो के उमिर अठाइस साल ले रहे, जबकि सतरह महिला अठारह से तीस बरिस का बीच के रहली.


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उन्हन लोग में तैंतीस जानी शहर के रहली आ नौ गो गांव के. दूगो स्नातक, आठ गो हाई स्कूल पास, दस गो प्राइमरी स्कूल पास आ बाइस गो निरक्षर. डॉ सीमा साखरे के एगो दोसर रिपोट के मोताबिक, दुष्करम के चार सौ ममिला में 302केस गरीब आउर गरीबी रेखा से नीचे के रहे. 54महिला निम्न मध्यवर्ग से जुड़ल रहली, 32मध्यवर्ग के रहली आउर 12गो उच्च वर्गीय परिवार से. सैंतालीस गो लरिकी त एक से पनरह बरिस के उमिर के रहली स, जिन्हनी का संगें अइसन जघन्य अपराध कइल गइल रहे.


आंकड़ा बतावत बा बलातकार के शिकार नारी में खास बाड़ी--सोरह बरिस से पच्चीस बरिस के महिला, दैनिक मजूरी करेवाली मजूर औरत, अनुसूचित जाति-जनजाति के महिला, घरेलू काम में लागल दाई, खेत मजूरिन, अकसरुआ जातरा करेवाली जुवती, बसअड्डा पर ठाढ़ भा सिनेमाहाल से बेवक्त लवटत स्त्री.


बाकिर घरो में का नारी के हिफाजत बा?
जदी इहे रहित, त एगो नाना नेह-नाता के तार-तार करत अपना नातिनिए का संगें दुष्करम काहें करित, जवना के ओकर कामकाजी विधवा बेटी अपना कमसिन किशोरी लरिकी के हिफाजत खातिर रखले रहे? अइसहीं एगो वेभिचारी अपना दोस्त के मुअला का हमदरदी जतावत परिवार से घुलि-मिलि गइल आ अबोध लरिकी के प्यारा अंकल बनिके ओकराके घुमावे-फिरावे ले जाए लागल. रिश्ता अइसन प्रगाढ़ बनि गइल कि ओकरा पर सभके भरोसा हो गइल आ फेरु मोका पाके लरिकी के अपना रूम में ले जाके मुंह करिया कइलस.


 एक ओरि नारी के पूजा, देवी के खिताब
'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता 'के आवाहन, उहवें परदा का पाछा मरदानगी का नांव पर पशुता के दुराचार. सांच त ई बा कि हमार पुरुष परधान समाज नारी के अब ले भोग्ये मानत आ रहल बा. ओकरा के व्यक्ति का रूप में ना,बस चीज बतुस माल नियर इस्तेमाल कइल जात रहल बा. खुद के सबल आ स्त्री के अबला माने के मनोवृत्तिए से मरद में दंभ आउर पशुता भरत चलि गइल आ एह अहंकारी पशुप्रवृतिए से पौरुषमानसिकता के बलातकार जइसन घिनावन, मानसिक विकृति के जनम भइल. इहे कारन बा कि मरद के अहं, कुंठा आउर कमजोरी के शिकार ई स्त्रिए बनत आ रहल बिया.


नीमन संस्कार के ना मिलल आ सेक्स संबंधी स्वस्थ नजरिया के अभाव एह विकृति के बढ़ावा दे रहल बा. एह में कामोत्तेजक फिलिम, अपराध कथा, दूरदर्शनी पोर्न साइट, अश्लील नाटक वगैरह के योगदान कम नइखे. विजय तेंदुलकर के कई गो मराठी नाटकन में जानि-बूझिके बलातकार के दृश्य डालल जात रहल बा, जवना के मंचन का खिलाफ आवाज बुलंद करेके परल रहे. विज्ञापन में नारी देह के मानसिक विकृति का हद ले देखावे के सिलसिला आजुओ जारी बा. ओइसे त भारतीय दंड संहिता के धारा 375आ376के तहत स्त्री के अनिच्छा के बावजूद आउर ओकर बेगर रजामंदी के कइल जाए वाला संभोगे बलातकार का श्रेणी में आवेला आ एह अपराध खातिर सजाइओ के सख्त बनावल गइल बा।


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 बाकिर अकसर होला ई कि स्त्री केहू ना केहू पुरुष का संरक्षण में रहेले, फेरु त वेभिचारी संरक्षक आपन मुंह करिया कइला का बाद उलटे ओह स्त्रिए के नैतिक आचरण पर दोषारोपण कइ बइठेला. दोसरा तरफ, थाना कचहरी में, पुलिस हिरासत में, अस्पताल में भा पागलखाना में जदी औरत के आबरू से खिलवाड़ होखे, त का अइसनो जगहा पर ओकर सहमति मानि लिहल जाउ?हालांकि बलातकार कानून में कड़ा संशोधन हो चुकल बा, बाकिर खाली शाब्दिक संशोधन से का एह आपराधिक लत के रोकल जा सकेला?आम तौर पर, पुरुष पुलिस, पुरुष चिकित्सक, पुरुष अधिवक्ता आ पुरुष जज से नारी के न्याय कहवां मिलि पावेला!


तबे नू बाबा राहुल सांकृत्यायन 'मेहरारुन के दुरदसा 'नाटक लिखलन आ भिखारी ठाकुर 'गंगा नहान ' में गंवई स्त्री के आबरू लुटाए के दास्तन के चित्र उकेरत आगाह कइलन. बाकिर आखिर हमनीं के कब संस्कारित होखबि जा आ नवकी पीढ़ी में सुसंस्कार भरेके उतजोग करबि जा?एह मुद्दा पर कबले सियासत होत रही आ मेहरारू के मोहरा बनाके आपन गोटी लाल कइल जात रही?आईं, स्त्री के हर दिसाईं शिक्षित, मजबूत आ जागरूक करीं आ आधी आबादी खातिर संवेदनशील बनीं.

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