भोजपुरी में पढ़ें – हम का रहनींहाँ, का हो गइनीं आ आगा का होखे जा रहल बानीं पर विचार जरूरी

भोजपुरी में पढ़ें – हम का रहनींहाँ, का हो गइनीं आ आगा का होखे जा रहल बानीं पर विचार जरूरी
महापुरुष लोगन के बानी पर भोजपुरी समजा के विचार करेके होई.

भोजपुरिया समाज में बलिया-आरा उ इलाका ह, जहां 1947 से पहले आजादी के जोति जल गइल रहे. यही इलाका से जयप्रकाश नारायण भइलें जे क्रांति के बिगुल फुंकने. राहुल सांकृत्यान यही जगह पर मेहरारून के दुरदशा नाटक लिखने.

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  • Last Updated: September 7, 2020, 3:30 PM IST
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भोजपुरिया समाज शुरुए से कबो ना थाके वाली मेहनत, जीवटता, संघर्षशीलता आ अपना दम-खम आउर बल-बेंवत का बदउलत मन माफिक मुकाम हासिल करे खातिर जानल जाला.'कर बंहिया-बल आपनो, छाड़ि विरानी आस 'इहवां के मनई के मूल मंतर रहल बा. तबे नू, खाली देसे में ना, बलुक विदेसो में गिरमिटिया मजूर बनाके जवना लोगन के भेजल गइल, उहे लोग उहां के झाड़-झंखाड़, ऊसर-बंजर आ विरानी के खून-पसेना के गमक से, लहलहात हरियरी-खुशहाली से लबालब भरि दिहल आउर तमाम तरह के सांसत सहत ना सिरिफ आपन पहिचान बरकरार राखल, बलुक उहां के सबसे बड़ पद-पदवियो पावे में कामयाब भइल. किछु लोग इहो कहेला कि भोजपुरियन के लाठी आ लंठई मशहूर ह, बाकिर इहो सोरह आना साँच बा कि एकर इस्तेमाल ऊ दबदबा कायम करे में ना, देस आ समाज का हक में क्रांति के बिगुल बजावे बदे करत आइल बाड़न.

सबसे पहिले आजाद होखे वाला इलाका
देस के आजादी में भोजपुरियन के तेयाग, बलिदान आ सब किछु होम करे के दियानत के कइसे भुलाइल जा सकत बा! को बड़-छोट कहत अपराधू! इहे ओजह रहे जे देस के आजाद होखे का पहिलहीं आरा आ बलिया जिला आजादी के जसन मना चुकल रहे. जन-जन के जगावे आ देस-परेम के भाव भरे में रघुवीर नारायण के 'बटोहिया' गीत- 'सुन्दर सुभूमि भइया भारत के देसवा से, मोर प्रान बसे हिमखोह रे बटोहिया' अगहर आ ऐतिहासिक भूमिका निभवले रहे.दोसरकी आजादी दिअवावे में अगुवाई करे वाला जयप्रकाश नारायण के लोकनायकत्व सउँसे संसार में चरचा का केन्द्र में रहे. सबसे पहिले दलित समाज के दयनीयता के तसवीर उकेरे में हीरा डोम के कविता 'एगो अछूत के शिकायत' कबो बिसरावल ना जा सके.

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बाजारवाद का असर


बाकिर एकइसवीं सदी के एह भूमंडलीकृत बाजारवादी दौर में भोजपुरिया समाज के तेवर तब्दील हो रहल बा. सोच के दिशा, विकास के नाप-जोख के पैमाना बदल रहल बा.'हम का रहनींहाँ, का हो गइनीं आ आगा का होखे जा रहल बानीं' के सवाल आत्ममंथन खातिर अलचार करत बा. प्रश्न इहो बा, मौजूदा बदलाव कतना सकारात्मक बा आ कतना नकारात्मक? पहिले एह तथ के पड़ताल जरूरी बुझात बा कि पिछिलिका बीसवीं सदी में भोजपुरिया समाज के दशा आ दिशा का रहे?

बाबा साहेब के कसौटी
बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर के कहनाम रहे- 'हम कवनो समाज के तरक्की ओह समुदाय के औरतन के तरक्की से नापेलीं.' आईं, देखल जाउ जे ओह घरी भोजपुरिया समाज में मेहरारुन के का हाल रहे? सैंतालीस ले, ओने देस गुलामी के बेड़ी में जकड़ल रहे, एने मेहरारू पुरुष प्रधान समाज में त्रासद आ दयनीय जिनिगी जिए खातिर मज़बूर रहली. ताजिनिगी नारी के हैसियत बाजार के माल आ बेजान चीजु-बतुस से अधिका किछु ना रहे.जनमे से ओह लोग का सँगे सवतेला बेवहार कइल जात रहे.

होश सम्हारते लइकी के चूल्हा-चउका आ घरेलू काम-काज में अझुरा दिहल जात रहे. बालबियाह के रिवाज रहे आ अकसरहाँ कमसिन किशोरी के कवनो बूढ़ मरद के हाथ में सउँपि के महतारी-बाप चैन के साँस लेत रहलन. बेटी बेचिके धन कमाए के चलन रहे आ धन के बदउलत बूढ़-अपाहिज पुरुष कवनो सुकवार कनिया के अर्धांगिनी बनाके खुद के गौरवान्वित महसूसत रहलन. नतीजतन, बूढ़ मरद त किछुए दिन में परलोक सिधारि जात रहलन, बाकिर ताजिनिगी रोवल-कलपल बेचारी बेवा के नियति बनि जात रहे.

अगर विधुर के मरजी होखे, त ऊ कई बेर बियाह करि सकत रहे, बाकिर विधवा-बियाह पर सख्त पाबंदी रहे. त्रिशंकु-अस बेवा के जिनिगी ओह कुकुर नियर होत रहे, जवन ना घर के होला, ना घाट के. ना ससुरा में जगह, ना नैहरे में. बियाह-गवना कराके नवकी दुलहिन के गाँवे में छोड़िके पति रोजी-रोटी के फिकिर में नगर-महानगर में निकलि जात रहे आ कबो- कबो उहँवें दोसर बियाहो रचा लेत रहे. एह तरी जायज आ जारज दूगो बियाहता नारकीय जिनिगी जिए खातिर बेबस हो जात रहली. ओने गाँव में मरद के इंतजार करत मेहरारू बड़मुँहवा लोगन के हवस के शिकारो हो जात रहे. कुल्हि मिलाके, नारी के जीवन नरक के पर्याय बनिके रहि जात रहे.

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राहुल सांस्कृत्यायन के नाटक
ओह पर तुर्रा ई कि बेटा भइला पर खुशहाली में नाच-सोहर के इंद्रधनुषी आलम, बाकिर बेटी के जनमते विपदा के मातमी लहर. मरदन के खाए-कमाए के अनगिनत राह, बाकिर परदा में खूँटा में बन्हाइल गाय-अस स्त्री खातिर सब केवाड़ बन्न! ओही समाज के चित्रित करत भिखारी ठाकुर 'बिदेसिया' के सिरिजना कइलन आ महापंडित राहुल सांकृत्यायन 'मेहरारुन के दुरदसा' के. नाटक में राहुल बाबा के गीत हिरदया के झकझोरिके

राखि देले रहे---

'एके माई-बपवा से, एकही उदरवा से दूनों के जनमवा भइल रे पुरुखवा!

पूत के जनमवा में नाच आ सोहर होला, बेटी के जनम परे सोग रे पुरुखवा!

धनवा-धरतिया प बेटवा के हक होला, बेटिया के किछुवो ना हक रे पुरुखवा!

मरदा के खइला-कमइला के रहता बा,तिरिया के लागेला केवाड़ रे पुरुखवा!'

अशिक्षा के बोलबाला भी रहे
ओह घरी के गँवई भोजपुरिया समाज में अशिक्षा के बोलबाला रहे. शराब के, नशाखोरी के लत परिवार वालन के तबाह कके ध देले रहे. पहिले जमींदारन के, आगा चलिके सामंती दमन-चक्र आ दलित-उत्पीड़न. तीरथ-बरत, मेला, गंगा नहान में अबला के आबरू का सँगे खेलवाड़. कुल्हि मिलाके, सामाजिक कुरीति आ अंधबिसवास के शिकार भोजपुरिया समाज. आजु के समकालीन भोजपुरिया समाज में किसिम-किसिम के बदलाव नजर आवत बा. अशिक्षा आ सेहत पर किछु हद ले कामयाबी हासिल भइल बा. लइकिनियो के पढ़ाई-लिखाई पर लोग फिकिरमंद भइल बा, बाकिर तिलक-दहेज के मोट रकम उगाहे खातिर.

बेटा के बिक्री बदस्तूर जारी बा. नारी सशक्तीकरण के दिसाईं लरिकी परदा के बहरी आके आपन मुकामो हासिल करि रहल बाड़ी स, बाकिर पुरुष प्रधान समाज के नजरिया में कवनो बदलाव नजर नइखे आवत. इहे कारन बा कि भोजपुरिया समाज के अनगिनत हुनरमंद 'दामिनी' दरिंदन के सामूहिक दुष्कर्म के शिकार हो रहल बाड़ी. ना त नारी खातिर सम्मान के भाव लउकत बा, ना बड़-बुजुर्गे खातिर.  नाप-जोख के तरजूई धन-दउलत हो गइल बा आ एही 'अर्थ' खातिर मए अनर्थ हो रहल बा. सामूहिकता आ सामाजिकता के भाव खतम होत जा रहल बा आउर संयुक्त परिवार एकल परिवार में विघटित हो चुकल बा. मए सामाजिक-सांस्कृतिक-नैतिक-राजनीतिक मूल्य छरित हो रहल बाड़न स. आ ईमानदारी-सचाई नियर अच्छाइयन पर तरह-तरह के बुराई हावी हो रहल बाड़ी स. सादगी के कवनो मोल नइखे रहि गइल .

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समरथ लोग दबंगई पर उतरि आइल बा आ उदारता का जगहा सवारथ, आडंबर, देखावा जिनिगी के मकसद बनि गइल बा. तबे नू, अपना माई आ महतारी भासा खातिर ऊ नेह-छोह आ समरपन नइखे झलकत. नतीजतन, लमहर समय से भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल होखे खातिर बाट जोहे के परि रहल बा. मौजूदा भोजपुरिया समाज के बदलत तेवर कई गो सवाल खड़ा करत बा.

विकास आसमृद्धि का सँगे आखिर मानवीय चेहरा कब शामिल होई? अपना हक-समरथ का साथे सामाजिक हक-हुकूक खातिर हमनीं के कब आगा आइब जा? अपना महतारी भासा खातिर कब सही माने में नेह-छोह के भाव जागी? का भोजपुरिया बेटी दामिनी के बलिदान अकारथ जाई? आखिर नारी-शिक्षा, सशक्तीकरण का सँगहीं समाज नारी का प्रति सम्मान के भाव, समानता के भाव कब अंगीकार करी? का लोक आसामूहिकता से कटिके भोजपुरिया मनई कबो सच्चा सुख आ अमन चैन हासिल क पाई? आखिर कब भोजपुरिया समाज सामाजिक समरसता आ प्रगतिशील सोच के जियतार दरपन बनि पाई? फिलिम आ गायकी का जरिए भोजपुरी के नाँव पर भासाई घालमेल, फूहड़ता आ अश्लीलता परोसे वालन के खिलाफ भोजपुरिया समाज कब अपना सजगता के परिचय दी?

आजु भोजपुरिया समाज के एह सवालन पर, बदलाव पर बदलाव खातिर सोचे-विचारे, चिंतन, आत्ममंथन करे के समय आ गइल बा .नींन तूरीं आ एक-दोसरा के जगावे का दिसाईं रचनात्मक पहल करीं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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