भोजपुरी विशेष: जब काशी में त्रैलंग स्वामी से भइल रामकृष्ण परमहंस क भेंट

पंचगंगा घाट पर मौजूद त्रैलंग स्वामी मठ आज तीर्थ बनि गयल हौ. देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन खातिर इहां पहुंचयलन.

पंचगंगा घाट पर मौजूद त्रैलंग स्वामी मठ आज तीर्थ बनि गयल हौ. देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन खातिर इहां पहुंचयलन.

परमहंस क अध्यात्मिक योग्यता केहूं से छिपल नाही हौ. काशी क महिमा जानि के शक्ति क साधक परमहंस शिव से मिलय काशी आयल रहलन. इहां ओनकर भेंट त्रैलंग स्वामी से भयल.

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  • Last Updated: January 8, 2021, 2:23 PM IST
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काशी नगरी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकल हौ. एही बदे एके दुनिया से अलग कहल जाला. मान्यता इ भी हौ कि काशी क कंकड़ कंकड़ में शंकर क वास हौ. जे भी इहां आवयला भगवान शिव अउर शिव के जटा से निकलल गंगा के प्रति आस्था के खातिर. धरती पर जेतना भी संत महात्मा पैदा भइलन शायदय केव बचल होई जे काशी न आयल होय. अद्वैत दर्शन क विद्वान तत्व ज्ञानी रामकृष्ण परमहंस भी 1868 में काशी आयल रहलन. काशी में तीन महीना तक ओनकर ठेकाना केदार घाट पर राजा कालीनाथ बापुली के इहां रहल. रामकृष्ण परमहंस माई काली क परम भक्त रहलन. दक्षिणेश्वर मंदिर में परमहंस जब भी माई के पुकरलन, माई हाजिर भइलिन. परमहंस क अध्यात्मिक योग्यता केहूं से छिपल नाही हौ. काशी क महिमा जानि के शक्ति क साधक परमहंस शिव से मिलय काशी आयल रहलन. इहां ओनकर भेंट त्रैलंग स्वामी से भयल.

त्रैलंग स्वामी अउर रामकृष्ण परमहंस के बीच मुलाकात क कई ठे कहानी चलयला. एक कहानी में बतावल जाला कि काशी में कई दिना बितउले के बाद भी जब परमहंस के भगवान शिव क दर्शन नाही भयल तब एक दिना पंचगंगा घाट पर टहरत समय ओनके मन में विचार आयल कि लोग झूठय कहयलन कि काशी के कण कण में शंकर हयन. इहां त कत्तौ शंकर नाही देखात हयन. एही समय करिया क नंग धड़ंग एक ठे विशालकाय आदमी गंगा के अंदर से उतरायल अउर पानी के ऊपर पैदल चलत क घाटे पर परमहंस के पास पहुंचि गयल -बतावय, काहे परेशान हयन? हम आपय से मिलय आए ह. इ आदमी दूसर केव नाही, महान योगी त्रैलंग स्वामी रहलन. त्रैलंग स्वामी के काशी क चलत-फिरत बाबा विश्वनाथ कहल जाय. अउर इ उपमा ओन्हय रामकृष्ण परमहंस ही देहले रहलन. त्रैलंग स्वामी कई कई दिना गंगा में पानी के भीतर समायल रहय. कभौ पानी के ऊपर पलथी मारि के बइठल रहय. जादातर समय मौन रहय, भोजन भी यदा-कदा ही करय. लेकिन केव प्रेम से देइ देय त ढेर सारा खाना एक बार में अकेलय खाइ जाय. गर्मी के दुपहरिया में भी बालू पर लोटल रहय.

रामकृष्ण परमहंस के लेइके त्रैलंग स्वामी घाटे के ऊपर गइलन अउर एक चउतरा पर ओन्हय आसन देहलन. दूनों संतन में चर्चा शुरू भयल. धर्म, अध्यात्म, योग, रिद्धि-सिद्धि पर लंबी बहस चलल. बहस के दौरान त्रैलंग स्वामी से परमहंस एक सवाल कइलन कि ईश्वर एक हयन कि अनेक. स्वामी जी जवाब देहलन कि समाधि के अवस्था में ईश्वर एक अउर भौतिक अवस्था में अनेक. अंत में परमहंस मानि गइलन कि त्रैलंग स्वामी साधारण योगी नाही, बल्कि मनुष्य रूप में साक्षात शिव हयन, असली परमहंस हयन. ओकरे बाद परमहंस अक्सर त्रैलंग स्वामी से मिलय पहुंचि जाय. ओनके पास बइठय, बातचीत करय अउर वापल लौटि जाय.
एक दूसर कहानी में बतावल जाला कि रामकृष्ण परमहंस के अपने काशी प्रवास के दौरान एक दिना महसूस होवय लगल कि कवनों अज्ञात अध्यात्मिक शक्ति ओन्हय अपने ओर खींचत हौ. बीच दुपहरिया में उ अचानक उठलन अउर नंगे पांव चलि पड़लन. ओनके पीछे-पीछे ओनकर भक्त लोग रहलन. परमहंस दशाश्वमेध पहुंचलन अउर उहां से गंगा किनारे-किनारे पंचगंगा घाट पहुंचि गइलन. उहां त्रैलंग स्वामी अपने भक्तन के साथ बइठल रहलन. परमहंस के दूरय से देखि के उ ओनके तरफ बढ़़लन. दूनों हाथ उठाइके उ रामकृष्ण से लिपटि गइलन. कुछ समय तक दूनों संत एक-दूसरे से लिपटल रहलन. खड़य-खड़य मौन भाषा में बात कइलन. ओकरे बाद परमहंस अपने पीछे मौजूद भक्तन के देखि के कहलन कि अरे तू सब खड़ा-खड़ा देखत का हय. साक्षात बाबा विश्वनाथ सामने हयन, एनकर चरणस्पर्श करा. ओकरे बाद रामकृष्ण अक्सर पंचगंगा घाट आवय लगलन.

एक दिना परमहंस कुछ लोगन के साथ पंचगंगा घाट के तरफ जात रहलन. सबके हाथ में बरतन रहल. त्रैलंग स्वामी के पास जाइ के उ कहलन कि आज बाबा विश्वनाथ के अपने हाथे से खीर खियाइब, देखी केतना खाइ जालन. त्रैलंग स्वामी मनय मन मुस्कियात रहलन. परमहंस कटोरा में खीर उड़ेलत गइलन, त्रैलंग स्वामी खइले गइलन. कुल बीस सेर खीर एक बार क बइठल गटकि गइलन. एक बूंद खीर बचल नाही. भक्त लोग देखि के दंग रहि गइलन.

एक अउर कहानी में कहल जाला कि रामकृष्ण परमहंस एक बार दशाश्वमेध घाटे पर गंगा स्नान कइले के बाद अपने चेलन के साथ बाबा विश्वनाथ क दर्शन करय जइसय विश्वनाथ गली में घुसलन, सामने से एक नंग धड़ंग करिया क विशालकाय आदमी दूनों हाथ उठाइके ओनके तरफ बढ़ल अउर गले से लिपटि गयल. इ त्रैलंग स्वामी रहलन. परमहंस अउर त्रैलंग स्वामी कुछ समय तक सड़क पर ही बेसुध अवस्था में एक-दूसरे से लिपटल रहलन. ओकरे बाद ओही ठिअन मौन भाषा में आपस में बतियउलन. परमहंस विश्वनाथ मंदिर जाए के बदले ओही ठिअन से वापस लौटि गइलन. परमहंस क चेला लोग पूछलन कि बाबा विश्वनाथ क दर्शन न करिहय का. परमहंस जवाब देहलन कि दर्शन त होइ गयल. इ महात्मा साक्षात विश्वनाथ जी ही रहलन. परमहंस जी स्वयं कहले हउअन कि त्रैलंग स्वामी भले ही मनुष्य रूप धारण कइले हयन, लेकिन उ साक्षात शिव हयन. काशी क चलत-फिरत बाबा विश्वनाथ.

त्रैलंग स्वामी क जनम आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम जिला में होलिया गांव क जमींदार नृसिंह धर के घरे भयल रहल. नाम रखल गयल तैलंगधर. तैलंगधर के जनम तिथि के बारे में अलग-अलग राय हौ. कुछ अनुयायिन के अनुसार, त्रैलंग स्वामी क जनम सन 1529 में पौष शुक्ल एकादशी के दिन रोहिणी नक्षत्र में भयल रहल, त कुछ के अनुसार ओनकर जनम सन 1607 में भयल रहल. त्रैलंग स्वामी के भीतर बचपन से ही अलग लक्षण देखाए लगल रहल. उ अक्सर समाधिस्त होइ जाय. शुरू में माता-पिता बहुत चिंतित रहलन, लेकिन बाद में समझि गइलन कि इ कवनों सामान्य लड़िका नाही हौ. माता-पिता के देह छोड़ले के बाद तैलंगधर कुल जिम्मेदारी अपने भाई के सौंपि के घर-बार छोड़ि देहलन. दशनामी संप्रदाय क संत भगीरथ स्वामी के साथ पुष्कर गइलन अउर ओही 1679 में ओनसे गुरुमंत्र लेहलन. गुरु के देह छोड़ले के बाद बीसन साल हिमालय में बितउलन. नेपाल अउर पूरा भारत क भ्रमण करत 1733 में उ प्रयाग पहुंचलन अउर अंत में 1737 में काशी आइ गइलन. फिर अंतिम समय तक काशी में ही रहलन. काशी में शरीर रूप में उ कुल 150 साल तक रहल. कहल जाला कि त्रैलंग स्वामी अबही भी अशरीरी रूप में काशी में मौजूद हयन.



त्रैलंग स्वामी के पास अपार अध्यात्मिक शक्ति रहल. लेकिन उ अपनी शक्ति क इस्तेमाल खाली भक्तन के भलाई में कइलन. केतना मुर्दन के जियउलन, केतना रोगिन क रोग ठीक कइलन. काशी अइलन त खाली लगोट पहिनि के. बाद में लगोट भी छोड़ि देहलन. जे भी श्रद्धा से जवन अर्पित कइ देय, लेइ लेय. लेकिन अपने पास कुछ न रखय, सबके बांटि देय. स्वामी जी एक भी मठ, आश्रम नाही बनउलन. एक-एक हफ्ता तक बिना कुछ खइलय रहि जाय. भक्त लोग कुछ लियाइ के देइ देय त ग्रहण कइ लेय. बाकी बेल-पत्र पर रहय. लेकिन शरीर क वजन लगभग 140 किलोग्राम रहल. भक्तन क भीड़ बढ़य लगल त मौन धारण कइ लेहलन, अउर दशाश्वमेध घाट छोड़ि के पंचगंगा घाट रहय लगलन. त्रैलंग स्वामी 26 दिसंबर, 1887 के पौष शुक्ल एकादशी के ही दिन समाधि लेइ लेहलन. अपने समाधि क घोषणा उ एक महीना पहिलय कइ देहले रहलन.

पंचगंगा घाट पर जहां स्वामी जी साधना करय, आज उहां त्रैलंग स्वामी मठ मौजूद हौ. मठ में श्रीकृष्ण भगवान क उ विग्रह भी स्थापित हौ, जवने क पूजा त्रैलंग स्वामी करय. विग्रह के ललाट पर शिवलिंग अउर सिर पर श्रीयंत्र बनल हौ. अपने तरह क इ अद्भुत विग्रह हौ. मठ में कई कुंटल वजनी एक विशालकाय शिवलिंग स्थापित हौ. इ शिवलिंग स्वामी जी स्वयं गंगा से निकालि के लिआयल रहलन. पंचगंगा घाट पर मौजूद त्रैलंग स्वामी मठ आज तीर्थ बनि गयल हौ. देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन खातिर इहां पहुंचयलन. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
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