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भोजपुरी में जन्‍मदिन विशेष: जुबान पर चढ़े आ दिल में उतरे वाला कवि हईं कैलाश गौतम

साहित्य सेवा चलते रहे कि घूमते-फिरत, हँसी-ठिठोली करत, मंच पर खुल के ठहाका मारत आ कवि सम्मेलन करत 9 दिसम्बर 2006 के दुनिया के अलविदा कह देनी.
साहित्य सेवा चलते रहे कि घूमते-फिरत, हँसी-ठिठोली करत, मंच पर खुल के ठहाका मारत आ कवि सम्मेलन करत 9 दिसम्बर 2006 के दुनिया के अलविदा कह देनी.

दिल में सीधे उतर जाए वाला एह लोक कवि, जन कवि, गँवई संस्कृति के कवि, आम आदमी के कवि के त साजिशो क के बिसरावल नइखे जा सकत.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 8, 2021, 12:15 PM IST
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जुबान पर चढ़े आ दिल में उतरे वाला कवि हईं कैलाश गौतम. कवि रहनी हम नइखीं कहत. कवि हईं कहsतानी. एह से कि कवि त मरबे ना करे. मरियो के अमर हो जाला. भले कैलाश गौतम जी हमनी के बीच में नइखीं बाकिर 'अमौसा के मेला ', 'गुलबिया के चिठ्ठी ', 'बड़की भौजी, 'कचहरी न जाना',' गाँव गया था गाँव से भागा', 'पप्पू की दुल्हन'....के गूँज-अनुगूंज बड़ले नू बा ? दिल में सीधे उतर जाए वाला एह लोक कवि, जन कवि, गँवई संस्कृति के कवि, आम आदमी के कवि के त साजिशो क के बिसरावल नइखे जा सकत.

आज कैलाश गौतम जी के जयंती ह. उहाँ के जनम 8 जनवरी 1944 में डिग्घी गाँव, चंदौली (उत्तर प्रदेश) में भइल रहे. एम.ए., बी.एड. कइला के बाद शिक्षक बने खातिर इलाहाबाद आ गइनी बाकिर बन गइनी आल इंडिया रेडियो के आकाशवाणी इलाहाबाद केंद्र में Compere. आकाशवाणी से रिटायर भइनी त हिंदुस्तान अकादमी के अध्यक्ष बननी. साहित्य सेवा चलते रहे कि घूमते-फिरत, हँसी-ठिठोली करत, मंच पर खुल के ठहाका मारत आ कवि सम्मेलन करत 9 दिसम्बर 2006 के दुनिया के अलविदा कह देनी.



आहि दादा, अइसे केहू जाला का ? तीने दिन पहिले 6 दिसम्बर के त उहाँ से बात भइल रहे. कहनी कि ‘मनोज आइब लंदन. दू तीन साल से टरत हौ, अबकी आइब. बुझाता लंदने में तोहसे भेंट लिखल हौ.’ नगदे आधा घंटा बात भइल कैलाश गौतम जी से बाकिर हम ई का जानत रहनी कि भेंट त दूर फेर कबो बातचीत भी ना हो सकी.
तब हम इंग्लैण्ड में इंजिनियर रहनी. गीतांजलि बहुभाषीय साहित्यिक समुदाय, बर्मिंघम, यूके के कार्यक्रम में कैलाश जी के आवे के रहे. ई बात गीतांजलि के अध्यक्ष डॉ. कृष्ण कुमार जी हमरा से बतवले रहनी. हमरा ओही साल सितम्बर में कलकत्ता में कैलाश जी से भेंट होखे के रहे. ममता कालिया जी बतवले रहनी- ‘मनोज आओ. कैलाश जी भी आयेगें.’ दरअसल सितम्बर 2006 में हमरा भोजपुरी ग़ज़ल-संग्रह ‘तस्वीर जिंदगी के’ पर भारतीय भाषा परिषद सम्मान मिलल गीतकार गुलज़ार आ ठुमरी लीजेंड गिरिजा देवी जी के हाथे कलकत्ता में. ओही में आवे के रहे कैलाश जी के. ना अइनी. भेंट ना लिखल रहे. कबो ना भेंट भइल. बस बाते भइल आ बाते रह गइल आ बाते गूँजत बा.

अब देखीं कि कइसन-कइसन बात कइले बानी कैलाश गौतम जी अपना कवितन में आ कइसे कइले बानी ... सबसे पहिले चलीं बड़की भौजी के पास ...

आँगन की तुलसी को भौजी दूध चढ़ाती है
घर में कोई सौत न आए यही मनाती है ।
भइया की बातों में भौजी इतना फूल गई
दाल परोसकर बैठी रोटी देना भूल गई ।।

दरअसल कैलाश जी कविता में जीवन खोजीं, मृत्यु ना, हँसी खोजीं, दुख ना बल्कि दुःख में भी सुख के तालाश करीं कैलाश गौतम जी ...

आजी रँगावत हईं गोड़ देखा
हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखा।
घुँघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया,
गठरिया में अब का रखाई बतईहा।

उक्त पंक्ति "अमौसा क मेला" के ह. इलाहाबाद वाला कुम्भ में अमावस्या के समय सबसे बेसी  भीड़ लागेला. एही से कैलाश जी अपना कविता के शीर्षक "अमौसा क मेला "रखनी. पूरा कवितवे कमाल के बा. बुझाते नइखे कि कवन अंश उधृत कइल जाय आ कवन छोडल जाय. ई कविता हम लाइव सुनले बानी भारतीय नृत्य कला मंदिर पटना में, 1995 में. कवि सत्यनारायण जी संचालन करत रहीं. हम दर्शकदीर्घा में बइठ के खूब हँसल रहीं आ थपरी पीटले रहीं बाकिर संकोचवश कैलाश जी से मिल ना सकनी.

कुम्भ के मेला में पहुंचे से पहिले रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के भीतर के एगो दृश्य देखीं -

मचल हउवे हल्ला, चढ़ावऽ उतारऽ,
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारऽ.
एहर गुर्री-गुर्रा, ओहर लुर्री‍-लुर्रा,
आ बीचे में हउव शराफत से बोलऽ
चपायल ह केहू, दबायल ह केहू,
घंटन से उपर टँगायल ह केहू.
केहू हक्का-बक्का, केहू लाल-पियर,
केहू फनफनात हउवे कीड़ा के नियर.
बप्पा रे बप्पा, आ दईया रे दईया,
तनी हम्मे आगे बढ़े देतऽ भईया.
मगर केहू दर से टसकले ना टसके,
टसकले ना टसके, मसकले ना मसके,
छिड़ल ह हिताई-मिताई के चरचा,
पढ़ाई-लिखाई-कमाई के चरचा.
दरोगा के बदली करावत हौ केहू,
लग्गी से पानी पियावत हौ केहू.
अमौसा के मेला, अमौसा के मेला.

अइसहीं ‘’ कचहरी न जाना ’’ कैलाश गौतम जी के अद्भुत कविता बा - 

कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
यहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे
कचहरी का मारा कचहरी में भागे

कचहरी में सोये कचहरी में जागे
मर जी रहा है गवाही में ऐसे
है तांबे का हंडा सुराही में जैसे
लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे

हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है

पप्पू की दुल्हिन एगो नायाब कविता बा. बदलत ज़माना पर गजब के चुटकी लीहल गइल बा -  

पप्पू के दुल्हिन की चर्चा कालोनी के घर घर में,
पप्पू के दुल्हिन पप्पू के रखै अपने अंडर में
पप्पुवा इंटर फेल और दुलहिया बीए पास हौ भाई जी
औ पप्पू असू लद्धड़ नाही, एडवांस हौ भाई जी
कहे ससुर के पापा जी औ कहे सास के मम्मी जी
माई डियर कहे पप्पू के, पप्पू कहैं मुसम्मी जी
गाँव गया था, गाँव से भागा ... कविता के शीर्षके बेजोड़ बा आ बहुत कुछ कह देता.
गाँव से भागा
रामराज का हाल देखकर
पंचायत की चाल देखकर
आँगन में दीवाल देखकर
सिर पर आती डाल देखकर
नदी का पानी लाल देखकर
और आँख में बाल देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा।

कैलाश जी के कविता आ गीत आमजन के जुबान पर खूब चढ़ल. खड़ी बोली में आंचलिकता के दर्शन करावे वाला अइसन दोसर केहू कवि ना भइल. ‘बाबू आन्हर माई आन्हर’ जइसन गीत फकीरी आ कबीरी स्वभाव के बिना कहाँ संभव बा. बेलाग लपेट के साँच कह देवे के ताकत रहे कैलाश गौतम जी में -

सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्‍ही जी
देस बँटत हौ, जइसे हरदी धान बँटत हौ, गान्‍ही जी
बेर बिसवतै ररूवा चिरई रोज ररत हौ, गान्‍ही जी
तोहरे घर क’ रामै मालिक सबै कहत हौ, गान्‍ही जी।

व्यंग्य त कमाल के करत रहीं कैलाश जी -

बिना रीढ़ के लोग हैं शामिल, झूठी जै-जैकार में
गूंगों की फ़रियाद खड़ी है, बहरों के दरबार में
खड़े-खड़े हम रात काटते, खटमल मालिक खाट के
क्या कहने इस ठाठ के

कैलाश जी विलक्षण प्रतिभा के धनी रहनी. नवगीत से लेके जनगीत तक उहाँ के अभिव्यक्ति अद्भुत रहे. हिन्दी नवगीत के उहाँ के ग्रामीण संस्कार दिहनी. लोकभाषा में अइसन धारदार कविता लिखे वाला कहाँ केहू लउकत बा? असली सम्मान त इहे नू ह- जनता के दिल में बसल.

वइसे कैलाश जी के उत्तर प्रदेश सरकार के सर्वोच्च सम्मान यश भारती आ प्रसिद्ध ऋतुराज सम्मान के अलावा अखिल भारतीय मंचीय कवि परिषद के ओर से शारदा सम्मान, महादेवी वर्मा साहित्य सहकार न्यास के ओर से महादेवी वर्मा सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के राहुल सांकृत्यायन सम्मान, लोक भूषण सम्मान, सुमित्रानन्दन पंत सम्मान जइसन अनगिनत सम्मान से सम्मानित कइल गइल बा.

कैलाश जी के जिनगी भर के कमाई बा - 'सीली माचिस की तीलियाँ '(कविता संग्रह), जोड़ा ताल '(कविता संग्रह), 'तीन चौथाई आन्हर ' (भोजपुरी कविता संग्रह), 'सिर पर आग '(गीत संग्रह), 'तंबुओं का शहर '(उपन्यास), 'आदिम राग' (गीत-संग्रह), 'बिना कान का आदमी' (दोहा संकलन), कविता लौट पड़ी, अउर  'चिन्ता नए जूते की '(निबंध-संग्रह).

वर्ष 2017 में कैलाश गौतम जी के बेटा कवि श्लेष गौतम के संपादन में 'लोक भारती प्रकाशन' से 'कैलाश गौतम समग्र' तीन खंड में प्रकाशित हो गइल. श्रीनरेश मेहता, श्रीलाल शुक्ल, डॉ धर्मवीर भारती, प्रो दूधनाथ सिंह, प्रो सत्यप्रकाश मिश्रा आ डॉ बद्धिनाथ मिश्रा जी के भूमिका के साथ देश के नामचीन संपादक-आलोचक के लेख आ कैलाश गौतम जी के लगभग समग्र गद्द व पद्द, लगभग 1500 पृष्ठ में प्रकाशित बा.

साँच पूछीं त कैलाश गौतम जी के तमाम गीत-कविता लोग के दिमाग पर छपल बा आ जुबान पर बसल बा काहे कि ओह में आम जिंदगी के सीधा अउर सच्चा प्रतिबिंब बा. (लेखक मनोज भावुक भोजपुरी के सुप्रसिद्ध कवि हैं. )
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