भोजपुरी में पढ़ें - लोक आस्था के महापर्व ह छठ

लोक में सूर्य पूजा के पर्व के उमंग देखे लायक होला.
लोक में सूर्य पूजा के पर्व के उमंग देखे लायक होला.

बाकी देवता लो के लड्डू-पेड़ा चढ़ेला आ छठी मइया के? दूघ, फल, घी, ऊंख, गागल नींबू, काँच हरदी, अमरख, आँवला, सुथनी, सिंघाड़ा.इहे सब नू चढ़ेला जी ? बाकी देवी-देवता लो घर में पूजाला, भा मंदिर में आ छठी मइया? नदी आ पोखरा में.

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  • Last Updated: November 17, 2020, 12:46 PM IST
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चनेसर चाचा खरना के दिन दूध ले जइहs, हमार गाय दूनू बेरा लागsतिया. ए महादेव बाबा, नहा खा के दिन खातिर लउका ले जा, हमरा छान्ही पर खूब फरल बा. ए रामधनी बो भउजी, अबकी ऊंख हमरा घर से रही, दियरा में खूब लागल बा. ए कलक्टर भईया दिल्ली से गाँवे जा तारs त हई ल पइसा हमरो तरफ से छठी माई के परसादी चढ़ा दिहs, हमरा कारखाना से छुट्टी नइखे मिळत. कहे के मतलब कि जे बा से पूछ-पूछ के बाँटे में लागल बा, समर्पण में लागल बा. सब केहू के लागेला कि हमरा तरफ से बरत में कुछउ लाग जाए त छठी मइया के कृपा बनल रही। लोग के एह तरह के आस्था, एह तरह के सामूहिक समर्पण दोसरा कवनो परब भा पूजा में देखे के ना मिलेला. एही से छठ पूजा के लोक आस्था के महापर्व कहल जाला.

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भारा भखाला त लोग घर से घाट ले लेट-लेट पेटकुनिये जाला. छठ घाट पर आँचर फइला के भा हाथ फइला के परसादी भीख माँगे में लाज ना लागे बल्कि गर्व के अनुभव होला, उत्साह दिखेला. काहे कि एह घाट पर सब अहंकार नष्ट हो जाला. केहू केहू के दउरा उठा देला. केहू केहू के आगे हाथ फइला देला. इहाँ कवनो जाति-पाँत, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब के भेद ना होला. ई कइसन घाट बनवलू ए छठी मइया. काश! पूरा दुनिया अइसने एगो घाट बन जाइत.



लोक से एतना जुड़ल कवनो देवी नइखीं अउर कवनो देवी से एतना जुडल लोक नइखे. लोक के सब सिम्पटम्स एह परब में लउकेला. त लोक के खाँटी देवी माने छठी मइया. एही से इनकर पुजवो-पाठ लोके भाषा में होला. छठियो मइया के लोक भाषा के गीत-संगीत बहुत पसंद बा. उ हर अरज गीतवे में सुनबे करेली. घर से घाटे निकले से लेके, घाट पर भर पूजा चाहे घाट से लौट के कोशी भरे भा फेर भोरे अरघ देवे तक उहे–तिले-तिले गीत. गायको लोग ई बात बुझ गइल बा. दे दनादन गीत. गीत के एतना प्रोडक्शन त अउर कबो ना होला. त छठी मइया के भाषा गद्य ना पद्य ह. पद्य में भी लोकगीत.लोकभाषा में.बिहार के भाषा में, भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका आ बज्जिका में. बा नू ? त ई कन्फर्म हो गइल कि छठी मइया बिहारी हई.बिहार के हई.लोक के हई.एह से छठ पूजा लोकपर्व ह.लोक के आस्था के महापर्व ह. एही से ऊ लोकभाषा में बतियावेली. गा-गा के बतियावेली. काहे कि लोक के बोले में भी एगो लय होला, लहरा होला, राग होला आ भाषा सरल-सहज होला, सोझ होला। लपिटाह ना होला, क्लिष्ट ना होला, संस्कृतनिष्ट ना होला.
जब संस्कृतनिष्ट ना होला त एह पूजा मे पंडीजी के कवनो जरुरत ना होला. अरघ कवनो छोट लइको दे देला. बाकी कूल्हि मंतर त मेहरारु खुदे गीत गा-गा के पढ़ देली सन. सस्ता पूजा बा. पंडीजी के फीस त देवे के नइखे. कवनो महंग फल-फूल के दरकार नइखे. अनाज आ सीजनल फल से काम चल जाला.

बाकी देवता लो के लड्डू-पेड़ा चढ़ेला आ छठी मइया के? दूघ, फल, घी, ऊंख, गागल नींबू, काँच हरदी, अमरख, आँवला, सुथनी, सिंघाड़ा.इहे सब नू चढ़ेला जी ? बाकी देवी-देवता लो घर में पूजाला, भा मंदिर में आ छठी मइया? नदी, पोखरा, झील, बीच, आइसलैंड, पैडलिंग पूल, स्वीमिंग पुल आ कहीं-कहीं त बाथटब में भी.

केतना एडजस्टेबल आ एक्सेप्टेबल बाड़ी छठी मइया. एक्सेप्टेबल त एतना कि ग्लोबल हो गइल बाड़ी. आरा से अमेरिका पहुँच गइल बाड़ी. बरवा तर के पोखरवा से सिलिकॉन वैली के क्वेरी झील पहुँच गइल बाड़ी. बाकी अंगरेज नइखी भइल. अपना मूल स्वरुप में बाड़ी. अमेरिको में घाट प रउरा ठेकुआ, नरियर, केरा, सूप, कलसूप, डलिया, दउरी-दउरा, दिया-दियरी, सेनुर-पियरी अइसे लउकी जइसे अमेरिका में बिहार समाइल बा.आ सुरुज भगवान त सबकर एक्के बाड़े कतहीं अरघ दीं. धरती नू बँटाइल बाड़ी, आदमी बँटाइल बा, ब्रम्हांड त एक्के बा, परमात्मा एक्के बाड़न. ..छठियो मइया इहे बतावेली.बड़का-छोटका, अमीरी-गरीबी, ऊँच-नीच के भेद मिटा के सबका के एक्के घाट बरोबरी प बइठावेली आ कहेली कि रे कथी बँटाइल बा, काहे खातिर लड़त बाड़न स. लेकिन लोग त गावे में बा, गाना के मरम बूझे में थोड़हीं बा? छठी मइया किहाँ त डूबत आ उगत सूरूज के भी भेद ना होला. दूनू पुजालें. एह बात के मरम बूझल आ ओकरा के जिनगी में उतारले छठ पूजा ह. देवता लोग दुख के थोड़े मार दी लोग. हाँ, दुख सहे आ झेले भा सुख-दुख में समभाव रहे के ताकत जरुरे दे दीही लोग. दुख ख़तम होखे वाला रहित त देवता लोग प दुख कइसे आइत?

चूँकी छठ सूर्य उपासना के महापर्व हs, त सुरुजे भगवान प आपन एगो शेर से सुनावत बानी –
सूरज से ताकतवाला के बाटे दुनिया में बाकिर

धुंध, कुहासा, बदरी, गरहन उनको ऊपर आवेला

दुखओ में इन्सान बनल रहीं. सुखओ में इन्सान बनल रहीं. इहे कहेली छठी मइया.

सब दुख मिटइहें छठी मइया. दुनिया कोरोना से त्रस्त बा. लोग सफाई से रहे के बात करsता त छठी मइया त सदियन से ई बात कहत बाड़ी. एह परब में तन आ मन दूनो के सफाई आ शुद्धता के बहुते महातम बा.

कोरोना आइल त लोग के प्रकृति के कीमत कुछ बेसी बुझाये लागल. लोग प्रकृति से प्रेम आ पूजा के बात करsता. त छठ पूजा त इहे नू ह. प्रकृतिये के पूजा ह. मौसमी फल आ अनाज इहे परसादी ह. छठ मइया खातिर परसादी के जवन दउरवा सजाला, ओह में का रहेला ? गेहूँ से बनल खजूर, ठेकुआ, पूड़ी आ आउर सभ पकवान, एही सङे फल में जट्टा-नरियर, केरा, नेमू, संतरा, पानीफल-सिंघाड़ा, आउर सभ मौसमी फल, काँच हरदी, ओह ऋतुअन के आउर कोन-कंद आ फसल में ऊँख आदी बन्हाला. बात बस बूझे के बा भाई.

हमनी के सब परब त्यौहार विज्ञान के कसौटी प कसल बा. परब भा व्रत के फ़ॉर्मेट में बान्ह देला से आस्था बढ़ जाला, तर्क के गुंजाइश ना रहे, उत्सव के रूप ले लेला आ अनपढ़ से लेके पढुआ-लिखुआ, जज-कलेक्टर सभे माने लागेला, एगो सिस्टम बन जाला, एगो सिलसिला बन जाला .

बात ढेर बुझे के बा, भाई हो. एह सिस्टम पर, एह सिलसिला पर बाज़ार के भी नज़र बा. हमनी के बाज़ार पर नज़र रखे के बा कि उ एह परब के नाशे मत.

त लौकी भा कदुआ के तरकारी खाईं, रसियाव खाईं, भर-भर प्लेट ठेकुआ आ परसादी खाईं, तृप्त होखीं, स्वाद लीं बाकिर साथे-साथ एह महान पर्व के तह तक जाईं, उहाँ रोशनी बा, उजाला बा, जिंदगी बा. ऑफ्टर ऑल इ ह त सुरुजे भगवान के उपासना के नू परब जेकरा से जिंदगी बा, रोशनी बा, कायनात बा.

जै छठी मइया, जै सुरुज भगवान

( मनोज भावुक सुप्रसिद्ध भोजपुरी लेखक और गजलकार हैं.)
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